जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें सशस्त्र बलों के एक पूर्व सैनिक को शिजोफ्रेनिया (Schizophrenia) जैसी मानसिक बीमारी के कारण मिली दिव्यांगता पेंशन के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस मामले की सुनवाई न्यायमंडल के जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच कर रही थी। केंद्र सरकार ने सशस्त्र बलों के ट्रिब्यूनल (Armed Forces Tribunal – AFT) के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें पूर्व सैनिक को दिव्यांगता पेंशन देने का आदेश दिया गया था।

न्यायालय ने 13 फरवरी को सुनवाई के दौरान कहा कि यह विवादित नहीं है कि जब यह सैनिक सेवा में भर्ती हुआ था, तब उसे शारीरिक और मानसिक रूप से फिट पाया गया था। यानी, जिस समय उसे सेवा से सेवानिवृत्त किया गया, उस समय वह शिजोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारी से पीड़ित था। इसका मतलब यह हुआ कि यह बीमारी सेवा के दौरान उत्पन्न हुई थी।

अदालत ने यह भी कहा कि यह साबित करने की जिम्मेदारी सेना पर है कि दिव्यांगता और उनकी सेवा के बीच कोई संबंध नहीं है। यानी अगर सेना यह साबित करना चाहती है कि बीमारी और सेवा का कोई संबंध नहीं था, तो यह प्रमाण पेश करना उनका कर्तव्य है।

इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि अगर कोई सैनिक सेवा के दौरान शारीरिक या मानसिक बीमारी से प्रभावित होता है, तो उसे उसके लिए मिलने वाली पेंशन और लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह माना कि सेवा के दौरान उत्पन्न किसी भी बीमारी या दिव्यांगता को सम्मानजनक तरीके से देखा जाना चाहिए और इसके लिए उचित लाभ मिलना चाहिए।

सशस्त्र बलों के ट्रिब्यूनल के फैसले का उद्देश्य यही था कि सैनिकों को उनकी सेवा के दौरान हुई बीमारियों या चोटों के लिए न्याय मिले। यह निर्णय पूर्व सैनिकों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में भी महत्वपूर्ण है। अदालत का यह रुख यह सुनिश्चित करता है कि मानसिक स्वास्थ्य को भी उतना ही महत्व दिया जाए जितना कि शारीरिक स्वास्थ्य को।

इस तरह, जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज कर, पूर्व सैनिक को शिज़ोफ्रेनिया के कारण दिव्यांगता पेंशन देने के AFT के आदेश को सही ठहराया।

‘शिजोफ्रेनिया’ का मामला – मुख्य बिंदु

  1. सेना में भर्ती और डिस्चार्ज
  • पूर्व सैनिक जुलाई 2001 में इंडियन आर्मी में पूरी तरह फिट होकर भर्ती हुआ।
  • जुलाई 2018 में उसे सेवा से डिस्चार्ज कर दिया गया।
  1. डिस्चार्ज से पहले मेडिकल रिपोर्ट
  • रिलीज़ मेडिकल बोर्ड (RMB) ने उसे शिजोफ्रेनिया से पीड़ित पाया।
  • इस बीमारी के कारण उसे जीवन भर के लिए 40% डिसेबिलिटी बताया गया।
  1. आरंभिक पेंशन निर्णय
  • RMB ने यह निष्कर्ष निकाला कि यह बीमारी सेना की सेवा के कारण नहीं हुई और न ही उससे बढ़ी।
  • इसके कारण उसकी दिव्यांगता पेंशन की मांग रिजेक्ट कर दी गई।
  1. AFT का फैसला
  • 2022 में सशस्त्र बलों का ट्रिब्यूनल (AFT) ने RMB के फैसले को पलट दिया।
  • सैनिक को 50% डिसेबिलिटी पेंशन देने का आदेश दिया।
  1. केंद्र सरकार और यूनियन की चुनौती
  • यूनियन ऑफ़ इंडिया और अन्य पक्षों ने उच्च न्यायालय में AFT के आदेश को चुनौती दी।
  • उनका दावा था कि “मेडिकल राय अस्पष्ट और रहस्यमयी है।”
  1. राज्य/सेना का तर्क
  • राज्य को यह साबित करना था कि डिसेबिलिटी (शिजोफ्रेनिया),
  • भले ही सेवा के दौरान हुई हो,
  • सेना की सेवा के कारण नहीं हुई और न ही उससे बढ़ी।
  • सेना ने दावा किया कि यह बीमारी शांति वाले इलाके डलहौजी (HP) में शुरू हुई थी।
  1. अदालत का निष्कर्ष
  • अधिकारी यह साबित करने में असफल रहे कि दिव्यांगता और सेना सेवा का कोई संबंध नहीं है।
  • मेडिकल राय अस्पष्ट और रहस्यमयी थी।
  • इसलिए, ऐसी अस्पष्टता का फायदा सैनिक को दिया जाना चाहिए।

शिजोफ्रेनिया क्या है?

  • शिजोफ्रेनिया एक मानसिक बीमारी है जिसमें व्यक्ति में अत्यधिक शक, अविश्वास या यह विश्वास होता है कि लोग उसके खिलाफ साजिश कर रहे हैं, उसे परेशान कर रहे हैं या उसे नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।
  • यह बीमारी अलग-अलग मानसिक स्वास्थ्य विकारों में दिखाई दे सकती है, जैसे: पैरानॉइड शिजोफ्रेनिया
  • भ्रम संबंधी विकार (Persecutory type)
  • पैरानॉइड पर्सनैलिटी डिसऑर्डर
  • शिजोफ्रेनिया के होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं:
  • जैविक और आनुवंशिक कारण (Genetic and biological vulnerability)
  • मस्तिष्क की संरचना या कामकाज में समस्या
  • मानसिक या भावनात्मक आघात (trauma)
  • पर्यावरणीय कारण, जैसे तनावपूर्ण परिस्थितियां या अलगाव

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