कलकत्ता हाई कोर्ट ने पेंशन को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि पेंशन कोई उपहार या मुफ्त भुगतान नहीं है। कोर्ट ने एक मेडिकल ऑफिसर की विधवा को पेंशन लाभ देने से इनकार करने वाले राज्य के आदेश को रद्द कर दिया। विधवा ने अपने दिवंगत पति की 22 वर्षों की नौकरी से संबंधित पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों की मांग की थी। इसी संबंध में याचिका लगाई गई थी, जिसपर जस्टिस गौरांग कांत सुनवाई कर रहे थे।
पेंशन वैधानिक और संवैधानिक अधिकार- कोर्ट
कोर्ट ने 5 फरवरी को कहा कि पेंशन वैधानिक और संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट के आदेश में आगे कहा गया कि राज्य और उसके संस्थानों ने याचिकाकर्ता को नियमित कर्मचारी के रूप में प्रस्तुत किया था और उसकी सेवाओं से लाभ प्राप्त किया था और इसलिए रिटायरमेंट के फेस में वे पीछे नहीं हट सकते।
याचिकाकर्ता महिला के पति की नियुक्ति मार्च 1994 में दमदम नगर निगम विशेष अस्पताल में आवासीय चिकित्सा अधिकारी (RMO) के पद पर हुई थी। उन्होंने जुलाई 2016 में अपनी मृत्यु तक निरंतर और बेदाग सेवा की। उनके निधन के बाद याचिकाकर्ता ने पेंशन लाभ के लिए आवेदन किया, जिसे स्थानीय निकाय निदेशक ने 2024 में इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि डॉ. बिस्वास की नियुक्ति स्वीकृत पद के विरुद्ध नहीं थी और राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति का अभाव था।
‘पति 20 वर्षों से अधिक समय तक सेवा में थे’
महिला की ओर से पेश हुए अधिवक्ता सप्तर्षि रॉय ने कहा कि याचिकाकर्ता के पति 20 वर्षों से अधिक समय तक सेवा में थे और राज्य ने उन्हें सरकारी कर्मचारी को मिलने वाले सभी लाभ प्रदान किए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि उनके सभी समकक्षों और समान परिस्थितियों वाले लोगों को पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ मिल रहे हैं, इसलिए उनके पद की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।
राज्य और नगरपालिका की ओर से पेश हुए अधिवक्ता सत्यजीत महाता ने तर्क दिया कि 1994 में केवल दो पद सृजित किए गए थे, जबकि चार चिकित्सा अधिकारियों की नियुक्ति की गई थी, जिससे उनकी नियुक्ति अनियमित हो जाती है।
कोर्ट ने क्या कहा?
इसके बाद कोर्ट ने कहा, “अदालत इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि याचिकाकर्ता के दिवंगत पति ने नगरपालिका के अधीन दो दशकों से अधिक समय तक निर्बाध सेवा की है। अपने पूरे सेवाकाल में उन्हें नियमित कर्मचारी माना गया, सार्वजनिक निधि से वेतन दिया गया और लागू सरकारी मानदंडों के अनुसार सभी सेवा लाभ प्रदान किए गए। उनके सेवाकाल के दौरान किसी भी समय उनकी नियुक्ति की वैधता या औचित्य पर सवाल नहीं उठाया गया।याचिकाकर्ता को बीस वर्ष से अधिक की सेवा के बाद पेंशन लाभ से वंचित करना पूर्णतः अन्यायपूर्ण, अनुचित और मनमाना है, जो निष्पक्षता, सद्भावना और न्यायसंगत के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ता को सेवा में बनाए रखने के प्रतिवादियों के निरंतर आचरण से यह वैध अपेक्षा उत्पन्न हुई थी कि उसे उसके समान स्थिति वाले समकक्षों के समान सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएंगे, जिसे अब तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। ऐसी परिस्थितियों में पेंशन से वंचित करना स्पष्ट रूप से मनमाना है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन है, क्योंकि पेंशन गरिमापूर्ण आजीविका के अधिकार का अभिन्न अंग है।” पढ़ें कोर्ट का सख्त आदेश
