भारत-बांग्लादेश बॉर्डर से सटे नौ जिलों में जमीन के कुछ हिस्से पर फेंसिंग (बाड़) लगाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया। इसे लेकर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और ममता सरकार का कड़ी फटकार लगाई। साथ ही कोर्ट ने सरकार के एक अधिकारी पर 25,000 का जुर्माना भी लगाया है।

चीफ जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की बेंच ने यह पाया कि पहले से ही अधिग्रहित 127.327 किमी जमीन राज्य सरकार को केंद्र से मुआवजा मिल चुका है। इस साल 27 साल जनवरी को दिए गए निर्देश के बाद से अब तक केवल 8 किमी का हिस्सा ही हिस्सी ही सौपा गया है।

अधूरी और टालमटोल वाली रिपोर्ट दाखिल- हाईकोर्ट

कलकत्ता हाई कोर्ट ने 22 अप्रैल को इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा था कि “सबसे हैरानी की बात यह है कि राष्ट्रीय महत्व के इस मामले में, प्रतिवादी राज्य ने हमारे निर्देशों के पालन पर शपथ पत्र के साथ अपनी रिपोर्ट दाखिल करना उचित नहीं समझा। इसके बजाय उन्होंने एक अधूरी और टालमटोल वाली रिपोर्ट दाखिल की है, जिसमें तारीख और जगह के हिसाब से यह नहीं बताया गया है कि इस कोर्ट का आदेश पारित होने के बाद जमीन सौंपने के लिए क्या कार्रवाई की गई है।”

जमीन को तीन कैटेगरी में बांटा गया

इससे पहले 27 जनवरी के अपने अंतरिम आदेश सेना के पूर्व उप प्रमुख सुब्रत साहा द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर आया था। आदेश में सीमा पर बाड़ लगाने के लिए जमीन को तीन कैटेगरी में बांटा गया। पहली कैटेगरी- वह जमीन जो पहले की अधिग्रहित की जा चुकी है और जिसके लिए राज्य सरकार को केंद्र सरकार से मुआवजा मिल चुका है, लेकिन कुछ हिस्सा ही बीएसएफ को सौंपा गया है। दूसरी कैटेगरी- वह जमीन जिसके अधिग्रहण की प्रक्रिया सीधी खरीद नीति के तहत शुरू तो हुई लेकिन पूरी नहीं हो पाई और कई चरणों में अटकी हुई है, जिसमें वह भी चरण शामिल जहां राज्य सरकार की मंजूरी लंबित है और तीसरी कैटेगरी वह जमीन जिसके अधिग्रहण/खरीद की प्रक्रिया अभी शुरू होना बाकी है।

कई जिलों की जमीन दी जानी है

पहली कैटेगरी में हाईकोर्ट ने पाया था कि इसमें से केवल 70.925 किमी जमीन ही सौंपी गई है। इसके बाद कोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया कि वह शेष 127.327 किमी जमीन 31 मार्च से पहले सौंप दें। पहली कैटेगरी में 24 परगना (उत्तर), नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, दक्षिण दिनाजपुर, उत्तर दिनाजपुर, दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूच बिहार जिलों की कुल 198.252 जमीन शामिल है।

राज्य ने कोर्ट को अन्य बातों के अलावा, “जरूरी जमीनें हासिल करने में देरी की वजह यह बताई थी कि उसके राजस्व अधिकारी वोटर लिस्ट के एसआईआर के काम में लगे हुए थे। हालांकि कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस कैटेगरी के लिए अन्य कोई भी कारण मान्य नहीं होगा। इस कैटेगरी की जमीन जल्द से जल्द बीएसएफ को सौंप दी जानी चाहिए। हमारी राय में एसआईआर की प्रक्रिया इस काम में तेजी लाने और 9 जिलों में ये जमीनें सौंपने में कोई रुकावट नहीं बन सकती है।”

केंद्र तब यह अनुरोध किया था कि राज्य को जमीन जल्द से जल्द देने का निर्देश दिया जाए ताकि सीमा पार आतंकवाद, घुसपैठ आदि को रोकने के लिए बाड़ लगाई जा सके। राज्य ने भी इस बात पर सहमति जताई कि बाड़ लगाना राष्ट्रीय हित में है और देश की रक्षा के लिए जरूरी है।”

बची हुई जमीन को सौंपने का आदेश देते हुए कोर्ट ने राज्य से हलफनामे पर एक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था। हालांकि राज्य सरकार ने 25 मार्च को रिपोर्ट दाखिल कर दी थी, लेकिन वह हलफनामे पर नहीं थी।

केवल 8 किमी जमीन ही सौंपी गई

कोर्ट ने यह पाया कि “रिपोर्ट से पता चलता है कि 27 जनवरी के आदेश के बाद शेष 127.327 किमी में से राज्य द्वारा पहली कैटेगरी के तहत बीएसएफ को केवल करीब 8 किमी जमीन सौंपी गई है।”

रिपोर्ट को हलफनामे पर पेश न किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए, कोर्ट ने 22 अप्रैल के आदेश में कहा, “इस रिपोर्ट का कवरिंग लेटर पश्चिम बंगाल सरकार के विशेष सचिव द्वारा हस्ताक्षरित है। इसमें भूमि और भूमि सुधार तथा शरणार्थी राहत और पुनर्वास के संयुक्त निदेशक अनुपम मित्रा को इस संबंध में हलफनामा प्रस्तुत/दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि संयुक्त निदेशक 25 मार्च 2026 को दाखिल की गई रिपोर्ट हलफनामे पर आधारित नहीं है।”

कोर्ट ने कहा, राज्य को मांगी गई समय-सीमा से कहीं अधिक समय दिया गया था, लेकिन इस बात का कोई भी कारण नहीं बताया गया है कि कोर्ट के आदेश का पालन क्यों नहीं किया गया।”

13 मई को होगी अगली सुनवाई

कोर्ट ने अगली सुनवाई 13 मई को तय करते हुए राज्य से कहा, “वह 27 जनवरी के आदेश के पालन में जिला-वार और रोजाना के आधार पर उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए एक विस्तृत हलफनामा दायर करे।”

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कलकत्ता हाई कोर्ट ने रिटायर्ड कर्मचारियों द्वारा सरकारी क्वार्टर पर बिना इजाजत कब्जा करने के खिलाफ एक कड़ा फ़ैसला सुनाया। कलकत्ता हाई कोर्ट ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के तहत सक्षम प्राधिकरण द्वारा पास किए गए ऑर्डर को चुनौती दी गई थी। इस मामले में कर्मचारी को ग्रेच्युटी देने का आदेश दिया गया था। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें