जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने उत्तरी कश्मीर के एक स्कॉलर के खिलाफ सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (Public Safety Act-PSA) के तहत लगाए गए आरोपों को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के पास ऐसी किताबें मिलना, जिनके शीर्षक निराशाजनक या आपत्तिजनक नजर आते हों, अपने आप में उसे अपराधी साबित नहीं करता। यह टिप्पणी जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा कश्मीर के इतिहास पर आधारित 25 पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाने के एक साल बाद आई है।
कुपवाड़ा के स्कॉलर शफत मकबूल वानी को पिछले साल सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था। हिरासत आदेश में उनके पिता के पूर्व उग्रवादी संबंधों, अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलनों में उनके निमंत्रण, उनके पास से बरामद पुस्तकों और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के एक मामले का हवाला दिया गया था, जिसमें उन्हें जमानत मिल गई थी।
जस्टिस मोक्षा खजुरिया काज़मी ने पिछले सप्ताह अपने आदेश में कहा, “यहां इस बात पर भी जोर देना जरूरी है कि प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता के नाम पर कोई विध्वंसक गतिविधि नहीं दिखाई है, जिसके कारण उन्हें निवारक हिरासत (Preventive Detention) का सहारा लेना पड़ा हो।”
अदालत ने अपने आदेश में कहा गया है कि याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर हिरासत को चुनौती दी है कि यूएपीए मामले को छोड़कर हिरासत में लेने वाले अधिकारी ने ऐसी किसी विशिष्ट गतिविधि का उल्लेख नहीं किया है, जो राज्य के लिए हानिकारक हो।
आदेश में आगे कहा कि अधिकारियों को यह पता था कि आरोपी/बंदी को जमानत मिल चुकी है, क्योंकि इसका उल्लेख उनके जवाब और हिरासत के आधार में किया गया था। लेकिन इसके बावजूद हिरासत में लेने वाले अधिकारी ने यह तय करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किया कि जमानत पर बाहर रहने के दौरान उसकी गतिविधियां वास्तव में ऐसी थीं या नहीं, जिनसे उसे दोबारा नुकसानदायक गतिविधियों में शामिल होने की आशंका बनती है। इसी वजह से कोर्ट ने माना कि बंदी को हिरासत में लेने के फैसले में अधिकारियों ने अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया। इसलिए याचिकाकर्ता के वकील की यह दलील सही है कि हिरासत का आदेश उचित तरीके से विचार करने के बाद नहीं बनाया गया था।
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने एहतियाती हिरासत के कारणों में वानी के पिता की अलगाववादी विचारधारा और अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलनों में उनके निमंत्रण का हवाला दिया था। पुलिस ने अपने हिरासत आदेश में कहा, “(वह) एक अलगाववादी विचारधारा वाले परिवार में पले-बढ़े हैं और इसी वजह से बचपन से ही उनमें भारत-विरोधी और अलगाववादी भावनाएं घर कर गई हैं। उनके पिता अल-बर्क नामक आतंकवादी संगठन से जुड़े एक पूर्व उग्रवादी थे, जिन्होंने 1990 में आत्मसमर्पण कर दिया था।”
हिरासत में रखने के आधारों में यह भी बताया गया है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में शामिल होने के लिए कई निमंत्रण मिले थे, जैसे कि कोलंबिया यूनिवर्सिटी में ‘मिडिल ईस्टर्न, साउथ एशियन और अफ्रीकन स्टडीज़ ग्रेजुएट स्टूडेंट्स कॉन्फ्रेंस’ और डबलिन सिटी यूनिवर्सिटी में ‘आठवां सालाना साउथ एशिया कॉन्फ्रेंस’।
गिरफ्तारी के कारणों में आगे कहा गया है कि वानी के कब्जे से “राष्ट्र-विरोधी” साहित्य जब्त किया गया था, जिसमें याचिकाकर्ता द्वारा लिखित एक पुस्तक भी शामिल थी।
अदालत ने कहा, “हिरासत में लिए गए व्यक्ति से जब्त किए गए कथित राष्ट्रविरोधी साहित्य ने संभवतः प्रतिवादियों को उसे राष्ट्रविरोधी करार देने में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि, उक्त साहित्य को गलत तरीके से हिरासत में लिए गए व्यक्ति द्वारा रचित बताया गया है।” अदालत ने आगे कहा, “याचिकाकर्ता के वकील का यह तर्क बिल्कुल सही है कि याचिकाकर्ता, एक स्कॉलर होने के नाते, विभिन्न प्रकार के साहित्यिक साधनों का संग्रह रखने के लिए बाध्य है। इसलिए, केवल निराशाजनक शीर्षकों वाली पुस्तकों का होना ही याचिकाकर्ता/हिरासत में लिए गए व्यक्ति को स्वतः अपराधी नहीं बना देता, जिसके विरुद्ध निवारक हिरासत लागू की जानी आवश्यक हो।”
पिछले साल अगस्त में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने अलगाववादी भावना और झूठे कथनों को बढ़ावा देने वाली 25 पुस्तकों पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस साल, सरकार ने सभी सरकारी और निजी स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, कोचिंग केंद्रों और सार्वजनिक पुस्तकालयों को सभी पुस्तकों और पत्रिकाओं की अनुचित या आपत्तिजनक सामग्री के लिए जांच करने का निर्देश दिया है।
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