Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दहेज से संबंधित उत्पीड़न के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ससुराल में फांसी लगाकर आत्महत्या करने वाली एक महिला के मामले की सुनवाई कर रहा था। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने मामले में दखल देने से इनकार करते हुए पति के परिवार के आचरण की बार-बार आलोचना की। कोर्ट ने सख्त मैजेस देने की जरूरत पर जोर दिया।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “लड़के लड़कियों से शादी करके उनका और उनके परिवार का अपमान क्यों करते हैं? उन्हें यह संदेश जाना चाहिए कि वे दुल्हन और उसके परिवार का अपमान करना जारी नहीं रख सकते।”
क्या था पूरा मामला?
अब पूरे मामले की बात करें तो यह साल 2010 में छत्तीसगढ़ में हुई एक घटना से जुड़ा हुआ है। यहां पर एक महिला ने शादी के तीन साल के अंदर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि पति और उसके परिवार द्वारा लगातार उत्पीड़न और दहेज की मांग की गई थी। इसमें नकद भुगतान और एक कार शामिल थी।
निचली अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि शादी के सात साल के अंदर अप्राकृतिक परिस्थितियों में मृत्यु हुई। महिला के परिवार द्वारा दिए गए सबूतों से पता चलता है कि उसकी मृत्यु से कुछ समय पहले उससे बार-बार आर्थिक मांगें की गईं और उसके साथ क्रूरता की गई। हालांकि मेडिकल सबूतों से यह पुष्टि हुई कि मौत फांसी लगाने के कारण दम घुटने से हुई थी, लेकिन अदालतों ने माना कि आसपास की परिस्थितियां, जैसे कि लगातार दहेज की मांग, घटना से कुछ समय पहले किए गए भुगतान और निरंतर उत्पीड़न, क्रूरता और मौत के बीच एक सीधा संबंध स्थापित करते हैं।
पति के परिवार के कई सदस्यों को धारा 304बी, 306 और 498ए सहित कई प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया गया। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह याचिका मृतक के पति के छोटे साले द्वारा दायर की गई थी। इसमें आईपीसी की धारा 498A (क्रूरता और उत्पीड़न) के तहत दोषसिद्धि से राहत की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल पर केवल आईपीसी की धारा 498A के तहत आरोप लगाया गया था और यह अपराध बनता ही नहीं था। हालांकि, कोर्ट इस बात से सहमत नहीं हुआ। जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की, “आपको तो खुश होना चाहिए कि यह सिर्फ 498A है और सजा भी सिर्फ तीन साल की है।”
वकील को लगाई फटकार
रिकॉर्ड में दर्ज आरोपों का हवाला देते हुए न्यायाधीश ने आगे कहा, “लड़के के परिवार ने आखिर कहा क्या? उन्होंने कहा, ‘तुम लोग भिखारी हो; तुम पैसे नहीं दे सकते।’ लड़की का परिवार अपनी बेटी को बचाने की गुहार लगा रहा था और उन्हें भिखारी कहा जा रहा था।” जब वकील ने जवाब देने का प्रयास किया, तो न्यायाधीश ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा, “तुम्हें चुप रहना चाहिए था। दुल्हन के पिता ने कहा कि वे 60,000 रुपये दे सकते हैं और तुम उन्हें भिखारी कह रहे हो?”
उन्होंने वैवाहिक घरों में आर्थिक दबाव डालने के चलन पर भी रोशनी डाली। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “मकसद तो दुल्हन और उसके परिवार को निचोड़ना होता है।” याचिकाकर्ता के वकील ने एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी की ओर भी इशारा किया, लेकिन कोर्ट को इस दलील में कोई दम नहीं लगा। कोर्ट ने कहा, “यह संदेश जाना चाहिए। दुल्हनों के साथ ऐसा ही बर्ताव किया जाता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG प्रश्नपत्र लीक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि देश के युवाओं का भरोसा बनाए रखना बेहद जरूरी है। सर्वोच्च अदालत ने कहा, ”हमें अपने युवाओं को निराश नहीं करना चाहिए।” सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सर्वोच्च अदालत से कहा कि प्रधानमंत्री खुद नीट एग्जाम को मॉनीटर कर रहे हैं। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…
