सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी। जिसमें टीवीके विधायक श्रीनिवास सेतुपति को फ्लोर टेस्ट के दौरान मतदान करने से रोका गया था।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और विजय बिश्नोई की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश को “अत्याचारपूर्ण” करार दिया क्योंकि यह आदेश सेतुपति के विरोधी उम्मीदवार द्वारा दायर अनुच्छेद 226 की याचिका पर पारित किया गया था, न कि कानून के तहत अनिवार्य रूप से चुनाव याचिका पर। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कहना गलत नहीं होगा कि यह अत्यंद निंदनीय है।
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि हमने दोनों पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं की बात सुन ली है। प्रतिवादी के अधिवक्ता को दो सप्ताह का समय दिया जाता है। इस बीच, आदेश पर रोक जारी रहेगी। हाई कोर्ट के समक्ष आगे की कार्यवाही भी स्थगित कर दी गई है। टॉप कोर्ट सेतुपति द्वारा हाई कोर्ट के आदेश के विरुद्ध दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था।
सेतुपति ने हालिया विधानसभा चुनाव में शिवगंगई जिले के नंबर 185 तिरुप्पत्तूर निर्वाचन क्षेत्र से डीएमके उम्मीदवार पेरियाकरुप्पन के खिलाफ एक वोट के अंतर से जीत हासिल की थी।
इसके बाद पेरियाकरुप्पन ने मतगणना प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मद्रास उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की थी। पेरियाकरुप्पन यह भी दावा किया था कि एक डाक मतपत्र गलत निर्वाचन क्षेत्र में भेजे जाने के कारण उसकी गिनती नहीं की गई।
उन्होंने बताया कि तिरुप्पत्तूर विधानसभा क्षेत्र संख्या 185 के लिए भेजा जाने वाला डाक मतपत्र गलती से तिरुप्पत्तूर जिले के 50 विधानसभा क्षेत्र में भेज दिया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि मतपत्र को खारिज करने के बजाय उसे सही रिटर्निंग ऑफिसर के पास भेजा जाना चाहिए था।
पेरियाकरुप्पन ने ईवीएम के वोट आंकड़ों में विसंगतियों का भी आरोप लगाया था। उन्होंने दावा किया कि समेकित मतगणना सारांश और चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों में 18 वोटों का अंतर था।
जिसके बाद मंगलवार को हाई कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए सेतुपति को अगले आदेश तक विधानसभा की कार्यवाही में भाग लेने से रोक दिया था। न्यायालय ने सेतुपति को मतदान करने या किसी भी प्रकार के सदन परीक्षण में भाग लेने से प्रतिबंधित कर दिया है, जिसमें विश्वास प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, विश्वास मत या तमिलनाडु विधानसभा में सदन की संख्यात्मक क्षमता का परीक्षण करने वाली कोई भी मतदान प्रक्रिया शामिल है।
हालांकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतरिम आदेश सेतुपति के चुनाव को रद्द नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि इस आदेश से पेरियाकरुप्पन को निर्वाचित घोषित होने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता। इसी के चलते सेतुपति ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की थी।
जब इस मामले पर सुनवाई शुरू हुई, तो न्यायालय ने सबसे पहले पूछा कि पेरियाकरुप्पन ने चुनाव याचिका के बजाय चुनाव परिणामों को चुनौती देने वाली अनुच्छेद 226 याचिका कैसे दायर की होगी। न्यायालय ने पूछा कि धारा 226 की याचिका कैसे दायर की जाती है? क्या ईसीआई याचिकाकर्ता या प्रतिवादी का समर्थन कर रहा है? सेतुपति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि चुनाव आयोग ने सेतुपति के पक्ष में परिणाम घोषित किया है। स
पेरियाकरुप्पन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने मामले के तथ्यों को उजागर करने की मांग की। रोहतगी ने कहा कि कृपया मुझे तथ्य बताने की अनुमति दें। यह निर्वाचन क्षेत्र 185 है, इसी नाम का एक और निर्वाचन क्षेत्र है। पता चला कि एक डाक मतपत्र निर्वाचन क्षेत्र 50 तक पहुंच गया। यदि वह सही डाक पते पर पहुंच जाता, तो परिणाम बराबरी का होता। मतदान आयोग ने अपनी गिनती में कहा है कि इसका कोई प्रावधान नहीं है! धारा 100 के तहत अधिकारी के समक्ष वोटों की गिनती का प्रावधान है। सुनवाई के बाद न्यायालय ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी।
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तमिलनाडु विधानसभा में बुधवार को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा पेश किया गया विश्वासमत प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया। टीवीके चीफ ने बड़े आराम से फ्लोर टेस्ट पास कर लिया। उन्हें कुल 144 विधायकों ने समर्थन दिया, जो 234 सदस्यीय विधानसभा के बहुमत के आंकड़े 118 से अधिक है। पढ़ें पूरी खबर।
