Assam High Court: असम में फॉरनर्स ट्रिब्यूनल और पुलिस की जल्दबाजी के कारण 43 वर्षीय मुमताज बेगम को बिना पूरा कानूनी मौका दिए बांग्लादेश डिपोर्ट कर दिया गया था। इस पूरे घटनाक्रम पर गुवाहाटी हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए असम सरकार और राज्य की मशीनरी पर सवाल उठाए हैं। हाई कोर्ट ने पाया कि राज्य मशीनरी ने मिलकर काम किया, ताकि महिला कानून का सहारा न ले सके।
हाई कोर्ट ने मुमताज बेगम को वापस भारत लाने के लिए विदेश मंत्रालय (MEA) को निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही, कोर्ट ने असम सरकार को निर्देश दिया कि मुमताज के पति मुजम्मेल हक को 2 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा दिया जाए। कोर्ट ने इसे ‘कानूनी दुर्भावना’ (Malice in Law) करार देते हुए मामले की विस्तृत जांच के आदेश भी दिए हैं।
परिवार की बेबसी: ‘बांग्लादेश में हमारा कोई नहीं’
मुमताज बेगम का परिवार इस वक्त बेहद डरा हुआ और असहाय महसूस कर रहा है। उनके 26 वर्षीय बड़े बेटे माजिदुल इस्लाम ने बताया कि बांग्लादेश में उनका कोई रिश्तेदार या परिचित नहीं है। उन्हें नहीं पता कि उनकी मां किस हाल में हैं और कहां हैं। माजिदुल नगांव जिले के जुरिया में रेहड़ी-पटरी लगाकर अपना और अपने पांच भाई-बहनों का गुजारा करते हैं।
30 सालों से जारी नागरिकता की लंबी लड़ाई
मुमताज बेगम की नागरिकता से जुड़ी समस्या साल 1998 में शुरू हुई थी, जब पुलिस ने उनके खिलाफ एक रेफरेंस दर्ज किया था। मुमताज ने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कई दस्तावेज पेश किए थे। इनमें 1965 और 1970 की वोटर लिस्ट में उनके दादा का नाम, 1977 की वोटर लिस्ट में उनके पिता का नाम, स्कूल ट्रांसफर सर्टिफिकेट और पंचायत सर्टिफिकेट शामिल थे।
ट्रिब्यूनल का फैसला और हाई कोर्ट की राहत
इन सभी पुख्ता दस्तावेजों के बावजूद, जून 2019 में फॉरनर्स ट्रिब्यूनल ने उन्हें विदेशी घोषित कर दिया। इसके बाद परिवार ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अप्रैल 2026 में हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को खारिज कर दिया और कहा कि ट्रिब्यूनल ने पेश किए गए सबूतों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया। हाई कोर्ट ने मुमताज को दोबारा ट्रिब्यूनल के सामने पेश होने का निर्देश दिया।
ट्रिब्यूनल में धोखे से गिरफ्तारी और नया आदेश
30 मई को मुमताज अपने बेटे के साथ हाई कोर्ट के आदेश की कॉपी लेकर नगांव फॉरनर्स ट्रिब्यूनल पहुंचीं। उन्हें उम्मीद थी कि यह एक सामान्य सुनवाई होगी, लेकिन ट्रिब्यूनल में याचिका देखने के कुछ ही देर बाद वकील ने बताया कि उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है। ट्रिब्यूनल ने उसी दिन नया आदेश जारी कर उन्हें फिर से विदेशी घोषित कर दिया और हिरासत में ले लिया।
सर्टिफाइड कॉपी देने में जानबूझकर देरी
परिवार का आरोप है कि जब उन्होंने ट्रिब्यूनल के नए आदेश की कॉपी मांगी, तो उन्हें 2 जून के बजाय 5 जून को कॉपी दी गई। हाई कोर्ट ने भी इस बात को नोट किया कि ट्रिब्यूनल के अधिकारियों ने जानबूझकर आदेश की कॉपी देने में देरी की, ताकि परिवार के पास हाई कोर्ट में अपील करने का समय न बचे और महिला को जिले से बाहर भेजा जा सके।
डिटेंशन सेंटर से बॉर्डर तक: ऐसे घटित हुआ पूरा घटनाक्रम
30 मई को गिरफ्तारी के बाद मुमताज को नगांव सदर पुलिस स्टेशन रखा गया। 1 जून को उन्हें गोलपारा के मटिया डिटेंशन कैंप शिफ्ट कर दिया गया। नगांव के जिला आयुक्त ने आदेश जारी किया कि उन्हें 24 घंटे के भीतर देश से बाहर निकाला जाए। 3 जून को उन्हें 400 किमी दूर श्रीभूमि जिले के एरालीगूल होल्डिंग सेंटर भेजा गया और 13 जून की देर रात उन्हें बॉर्डर पार धकेल दिया गया।
आधी रात को सीमा पार ‘पुश-बैक’
अदालत के रिकॉर्ड और सीमा सुरक्षा बल (BSF) के हलफनामे से खुलासा हुआ कि 13 जून की रात 12:30 बजे से 2:30 बजे के बीच मुमताज को कछार जिले के कलाएंछेरा सेक्टर से भारत-बांग्लादेश सीमा पार करा दी गई। जब उनका परिवार डिटेंशन कैंप में उनसे मिलने पहुंचा, तो उन्हें सिर्फ इतना बताया गया कि मुमताज अब वहां नहीं हैं।
अदालत ने खारिज किया सरकार का पक्ष
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि एक बार जब किसी व्यक्ति को ‘घोषित विदेशी’ मान लिया जाता है, तो कानून के तहत उसे जल्द से जल्द बाहर निकालना जरूरी होता है ताकि वह गायब न हो जाए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्य के अपने 2025 के नियमों के अनुसार, किसी व्यक्ति को तभी निकाला जा सकता है जब वह सभी संवैधानिक अदालतों के कानूनी रास्तों का इस्तेमाल कर चुका हो।
अनुच्छेद 21 और मानवाधिकारों का उल्लंघन
हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) सिर्फ भारतीय नागरिकों के लिए ही नहीं, बल्कि विदेशियों के लिए भी लागू होता है। किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और उसे देश से निकालने से पहले उसके कानूनी अधिकारों का सम्मान करना अनिवार्य है।
अब सिर्फ अदालतों पर ही भरोसा
असम सरकार द्वारा जारी की जाने वाली 2 लाख रुपये की अंतरिम राहत के बावजूद परिवार को सिर्फ मुमताज की सही सलामत वापसी का इंतजार है। उनके बेटे माजिदुल का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि उनकी मां किस स्थिति में जीवित हैं या नहीं, लेकिन अब वे पूरी तरह से न्यायपालिका के आदेश और कोशिशों पर ही टिके हुए हैं।
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