पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महिला के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। महिला पर आरोप था कि उसने जन्माष्टमी के मौके पर अपने पालतू कुत्ते को भगवान कृष्ण के रूप में तैयार किया और उसकी तस्वीर अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर लगाई, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।

जस्टिस सुभाष मेहला के 1 जुलाई के आदेश में कहा गया, “याचिकाकर्ता ने अपने पालतू जानवर को जन्माष्टमी के पारंपरिक कपड़ों में तैयार करके जो किया, वह नेक नीयत से और बिना किसी बुरी भावना के किया गया लगता है। व्हाट्सऐप पर फोटो पोस्ट करने के पीछे प्यार और अपना स्नेह दिखाने की मंशा लगती है। दूसरों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और भगवान कृष्ण का अपमान करने का सवाल मुख्य रूप से एक संकीर्ण सोच के कारण उठता है, जो ‘कुत्ते’ को ‘भगवान’ की एक अपवित्र रचना के रूप में देखती है।”

अपने ही समुदाय को ठेस पहुंचाने की नहीं थी याचिकाकर्ता की मंशा

याचिकाकर्ता हिंदू है और यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी मंशा अपने ही समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की थी। इसके अलावा, कोर्ट ने गौर किया कि वह एक निसंतान महिला है जो अपने पालतू कुत्ते को अपने बच्चे की तरह मानती है। उसका काम केवल जन्माष्टमी के मौके पर होने वाला एक सामान्य उत्सव था, यानी अपने बच्चे को भगवान कृष्ण के रूप में तैयार करना। हालांकि, इसे गलत समझा गया और इसे आपराधिक रंग देने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया।

महिला ने अपने पालतू कुत्ते को भगवान कृष्ण के रूप में तैयार किया था और उसकी तस्वीरें अपने व्हाट्ऐप स्टेटस पर पोस्ट की थीं। कोर्ट ने बताया कि शिकायत एक व्यक्ति ने दर्ज कराई थी जो शिवसेना का युवा नेता है। उसने आरोप लगाया था कि महिला ने अपने कुत्ते को भगवान कृष्ण के रूप में तैयार करके हिंदू समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है।

महिला के अनुसार, जन्माष्टमी के त्योहार से दो-तीन दिन पहले, उसने अपने पालतू कुत्ते को श्री कृष्ण का मुकुट पहनाया और अपने मोबाइल फोन से उसकी फोटो खींची। उसने आगे बताया कि जन्माष्टमी के मौके पर, उसने अपने मोबाइल फोन से कुत्ते की वह फोटो अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर लगाई और उसे यह नहीं पता था कि ऐसा करने से किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी।

काल भैरव की सवारी के तौर पर कुत्ते को मिली खास जगह

दिलचस्प बात यह है कि आदेश में यह भी कहा गया है कि हिंदू कला और पौराणिक कथाओं में, कुत्ते को भगवान शिव के रूप ‘काल भैरव’ की सवारी के तौर पर खास जगह मिली है। इसमें कहा गया है कि कई संप्रदायों, खासकर तांत्रिक परंपराओं में, काले कुत्ते पर सवार भैरव की मूर्तियों की पूजा की जाती है।

आदेश में कहा गया, “यहां इस बात पर जोर दिया गया है कि कुत्ता वफादारी, दया, सतर्कता और सुरक्षा का प्रतीक है और इसलिए दैवीय शक्ति का एक बेहतरीन साथी है। भगवान दत्तात्रेय को भी अक्सर उनके चारों ओर चार कुत्तों के साथ दिखाया जाता है। ये कुत्ते चार वेदों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि पवित्र ज्ञान उन चीजों में भी मौजूद होता है जिन्हें समाज गलत तरीके से ‘नीच’ या ‘तुच्छ’ मानता है।”

अदालत ने कहा कि मौजूदा एफआईआर शिकायतकर्ता ने धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामले को उठाकर राजनीतिक फायदा उठाने के अपने निजी मकसद को पूरा करने के लिए दर्ज कराई थी, क्योंकि वह खुद को एक राजनीतिक दल का युवा नेता बताता है।

कोर्ट ने कहा, “मौजूदा मामले के तथ्यों पर आते हुए और यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता के काम का समाज की संवेदनाओं पर क्या असर पड़ता है, यह समझना जरूरी है कि आधुनिक समाज की सामूहिक सोच सौंदर्यबोध और नैतिकता से तय होती है। अक्सर देखा जाता है कि लोगों के एक समूह की ‘सौंदर्यबोध’ की समझ का उनकी नैतिकता की समझ पर काफी असर पड़ता है।”

कोर्ट ने आगे कहा, “उदाहरण के लिए, बाघ को ताकत और बहादुरी के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है और जानवरों की दुनिया में उसे बहुत सम्मान दिया जाता है, जबकि चूहे को एक छोटा, गंदा और डरा हुआ जीव माना जाता है जिसे साफ-सफाई और सेहत के लिए खत्म कर देना चाहिए। अदालत ने कहा कि यह सिर्फ इंसानों को होने वाले संभावित नुकसान का फर्क नहीं है, बल्कि उनके रूप-रंग का फर्क भी है जो उनके प्रति हमारी सोच को प्रभावित करता है।”

कोर्ट ने रामचरितमानस की एक मशहूर लाइन कोट की

कोर्ट ने कहा कि नदियों, पेड़ों, पहाड़ों, सूरज, चांद, जानवरों और पक्षियों में भगवान हैं। जस्टिस मेहला ने आगे रामचरितमानस की एक बहुत मशहूर लाइन कोट की, “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।“ उन्होंने समझाया कि यह बात बताती है कि कोई इंसान अपनी अंदर की भावनाओं, इरादों और सोच के आधार पर भगवान को महसूस करता है और यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की अपनी बात उसे सिर्फ इसलिए अपराधी नहीं माना जा सकता क्योंकि वह दूसरों की भावनाओं से मेल नहीं खाती।

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पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक लिव इन कपल को पुलिस सुरक्षा देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जहां भारतीय समाज का एक हिस्सा लिव-इन रिलेशनशिप को मॉडर्न लाइफस्टाइल के तौर पर तेज़ी से अपना रहा है, वहीं घर से भागे बच्चे अपने परिवार का नाम खराब कर सकते हैं और अपने माता-पिता की इज्ज़त और सम्मान पर असर डाल सकते हैं। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…