दिल्ली के चर्चित आबकारी नीति मामले में अब कानूनी लड़ाई एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने दिल्ली हाई कोर्ट में दायर अपने जवाब में साफ कहा है कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ लगाए गए ‘पक्षपात’ के आरोप न तो कानूनी कसौटी पर खरे उतरते हैं और न ही तथ्यों पर आधारित हैं।

यह मामला अब सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा बल्कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और सीमाओं पर भी बड़ा सवाल बनता जा रहा है।

क्या है पूरा मामला?

दिल्ली की कथित आबकारी नीति घोटाले मामले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत कई आरोपियों ने रिक्यूज़ल की मांग की है। आरोपियों की मांग जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा खुद को इस केस की सुनवाई से अलग करें।

इन आरोपियों को कहना है कि जज स्वर्णकांता एक सेमिनार में शामिल हुई थीं जिससे उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

CBI का जवाब

सीबीआई ने अपने हलफनामे में इस दलील को सिरे से खारिज किया। जांच एजेंसी ने अपने हलफनामे में कहा कि किसी कानूनी संगठन के कार्यक्रम में जाना जज के पेशेवर जीवन का हिस्सा है। इसे राजनीतिक या वैचारिक झुकाव से जोड़ना गलत और भ्रामक है। जज का अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के किसी सेमिनार में हिस्सा लेने से उनके किसी भी तरह से वैचारिक झुकाव का प्रमाण नहीं मिलता। बता दें कि यह वकीलों से जुड़ी एक निजी संस्था है जो वैचारिक तौर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का ही हिस्सा है।

‘कई जजों को हटना पड़ेगा’

एजेंसी का कहना है कि जज और वकील समय-समय पर कानूनी सेमिनार और कार्यक्रमों में हिस्सा लेते रहते हैं। सीबीआई ने एक महत्वपूर्ण तर्क रखते हुए कहा कि किसी भी राजनीतिक या वैचारिक पक्ष से जोड़ना इसे सही नहीं है, अगर ऐसा होता तो बड़ी संख्या में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों को राजनीति से जुड़ी शख्सियतों के मामलों से हटना पड़ता। सीबीआई ने कहा कि ये आरोप सिर्फ अनुमान पर आधारित हैं।

अदालत की अवमानना जैसी स्थिति

CBI ने कोर्ट को याद दिलाया कि किसी जज पर पक्षपात का आरोप लगाने के लिए केवल संदेह काफी नहीं है। सीबीआई ने हाई कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में कहा कि बिना ठोस आधार के किसी जज पर पक्षपात का आरोप लगाना न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के समान है। एजेंसी के मुताबिक, ऐसी स्थिति अदालत की अवमानना तक पहुंच सकती है क्योंकि इससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता और साख पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

बायस साबित करने के लिए जरूरी है ठोस आधार

सीबीआई ने साफ किया कि किसी जज पर पक्षपात का आरोप लगाने के लिए ठोस तथ्य और स्पष्ट परिस्थितियां होना अनिवार्य है। केवल आशंका या संदेह के आधार पर रिक्यूजल की मांग नहीं की जा सकती। एजेंसी के मुताबिक, कानून में ‘उचित आशंका’ का अर्थ महज शक नहीं होता बल्कि ऐसा ठोस आधार होना चाहिए जिससे निष्पक्षता पर वास्तविक और तार्किक सवाल खड़ा हो सके।

सुनवाई की रफ्तार पर भी CBI का जवाब

याचिकाकर्ताओं ने यह आरोप लगाया कि जज मामले की सुनवाई असामान्य रूप से तेज कर रही हैं। इस पर सीबीआई ने स्पष्ट किया कि यह आरोप बेबुनियाद है।

एजेंसी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही निर्देश दे चुका है कि जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर तेजी से की जानी चाहिए। ऐसे में इस केस में तेजी से सुनवाई करना पूरी तरह नियमों और स्थापित प्रक्रिया के अनुरूप है, इसे किसी भी तरह से पक्षपात नहीं कहा जा सकता।

लालू यादव के मामले का जिक्र

सीबीआई ने अपने हलफनामे में लालू प्रसाद यादव से जुड़े एक मामले का भी उदाहरण दिया। एजेंसी के मुताबिक, उस केस में भी जस्टिस शर्मा की अदालत ने कम समय में कई सुनवाई की थीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मामलों की तेज सुनवाई कोई असामान्य बात नहीं बल्कि अदालत की सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा है।

बायस का दावा गलत

सीबीआई ने अपने जवाब में कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने इस मामले में कई मौकों पर आरोपियों के पक्ष में भी आदेश दिए हैं। ऐसे में यह दावा करना कि जज किसी एक पक्ष के प्रति झुकी हुई हैं। यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।

एजेंसी ने यह भी कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाने का फैसला पूरी तरह वैध है। सीबीआई के मुताबिक, हाई कोर्ट को ऐसा करने का अधिकार प्राप्त है और इसमें किसी प्रकार की कानूनी गलती नहीं है।

इस बीच, अरविंद केजरीवाल खुद अदालत में पेश होकर अपनी बात रख चुके हैं। उन्होंने अदालत से अनुमति मांगी है कि वे अपनी रिक्यूजल याचिका पर खुद बहस करेंगे।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को दिल्ली हाई कोर्ट में तय है। इस दिन अदालत को यह फैसला करना है कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा इस केस की सुनवाई जारी रखेंगी या खुद को इससे अलग करेंगी।