सेना ने एक जवान को सिज़ोफ्रेनिया के कारण सेवामुक्त कर दिया था और उनकी मौत के बाद पत्नी को विकलांगता पेंशन देने से भी इनकार कर दिया। चार दशकों तक केस लड़ने के बाद अब केरल हाई कोर्ट ने जवान की विधवा के पक्ष में फैसला सुनाया है। केरल उच्च न्यायालय ने इस मामले में केंद्र की याचिका को खारिज कर दिया और सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) के उस आदेश को बरकरार रखा है जिसमें 1979 में सिजोफ्रेनिया के कारण सेवामुक्त हुए एक दिवंगत सैन्यकर्मी की विधवा को विकलांगता पेंशन प्रदान की गई थी।

जस्टिस के नटराजन और जॉनसन जॉन की खंडपीठ केंद्र की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें एएफटी के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि विकलांगता न तो सैन्य सेवा के कारण थी और न ही सैन्य सेवा से बढ़ी थी।

केरल हाई कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?

केरल हाई कोर्ट ने 26 मई को कहा, “यह सर्वविदित है कि जब सामाजिक सुरक्षा कानून की व्याख्या की जा रही हो तो हमेशा उदारतापूर्वक और लाभकारी अर्थ में इसकी व्याख्या की जानी चाहिए। कानून में अगर किसी शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं, एक जो लाभों को संरक्षित करता है और दूसरा जो नहीं करता है तो पहले वाले अर्थ को अपनाया जाना चाहिए।”

अदालत के आदेश में इस बात पर जोर दिया गया कि विकलांगता पेंशन प्रदान करने के प्रावधान एक लाभकारी योजना की तरह हैं। इस मामले में सैनिक ने सिजोफ्रेनिया होने के कारण सेवा से बाहर होने का विकल्प नहीं चुना था। आदेश में आगे कहा गया, “चिकित्सा बोर्ड की राय प्राप्त करने के बाद प्राधिकरण द्वारा उन्हें सेना सेवा से अयोग्य घोषित कर दिया गया था। ऐसी स्थिति में, विकलांगता साबित करने और विकलांगता पेंशन से इनकार करने के आधार साबित करने का भार प्राधिकरण पर भारी पड़ेगा।”

सशस्त्र बलों के लिए चिकित्सा सेवाओं के विनियम, 1983 के विनियमन 423(C) में अन्य बातों के अलावा यह प्रावधान है कि किसी व्यक्ति की सेवामुक्ति या मृत्यु का कारण बनने वाली बीमारी को सशस्त्र बलों में सेवा के लिए व्यक्ति की स्वीकृति के समय इसका कोई उल्लेख नहीं किया गया था तो इसे सामान्यतः सेवा में उत्पन्न हुई बीमारी माना जाएगा। हालांकि, अगर चिकित्सकीय राय यह मानती है कि सेवा में शामिल होने से पहले मेडिकल टेस्ट के दौरान बीमारी का पता नहीं लगाया जा सकता था तो बीमारी को सेवा के दौरान उत्पन्न हुई नहीं माना जाएगा। वर्तमान मामले में, चिकित्सा बोर्ड ने इस निष्कर्ष के लिए कोई कारण नहीं बताया है कि यह बीमारी जन्मजात है।

जवान की विधवा की कानूनी लड़ाई

यह याचिका भारत सरकार द्वारा दायर की गई थी जिसमें एएफटी के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसके तहत मृतक पेंशनभोगी को विधवा के आवेदन पर विकलांगता पेंशन प्रदान की गई थी। महिला के पति को अगस्त 1973 में भारतीय सेना में भर्ती किया गया था और जुलाई 1979 में सिज़ोफ्रेनिया के कारण उन्हें सेना से छुट्टी दे दी गई थी। जवान का निधन 1994 में हुआ। उनका विकलांगता पेंशन का दावा खारिज कर दिया गया और बाद में रक्षा मंत्रालय में उनकी अपील भी खारिज कर दी गई। हालांकि, न्यायाधिकरण ने पाया कि चिकित्सा बोर्ड का यह निष्कर्ष कि विकलांगता सिज़ोफ्रेनिया जन्मजात है, किसी भी तर्क से समर्थित नहीं है और इसलिए पेंशनभोगी दो वर्षों के लिए 60 प्रतिशत की दर से विकलांगता पेंशन प्राप्त करने का हकदार है।

इससे पहले, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने भारत सरकार द्वारा दायर एक याचिका को खारिज करते हुए फैसला सुनाया था कि विकलांगता के कारण सैन्य सेवा से मुक्त हुए सशस्त्र बलों के कर्मियों को उनकी विकलांगता पेंशन का हकदार माना जाएगा, भले ही उन्होंने 15 वर्ष की न्यूनतम सेवा अवधि पूरी न की हो।

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