इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक और पुलिस शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि अधिकारियों को यह समझना चाहिए कि उनकी निष्ठा संविधान के प्रति है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति, जबकि उनकी ईमानदारी और निष्पक्षता उन नागरिकों के प्रति होनी चाहिए, जिनकी वे सेवा करते हैं और जो लोकतंत्र में वास्तविक मालिक हैं।
हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक 25 वर्षीय आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई निरोधात्मक कार्रवाई को रद्द करते हुए राज्य की कार्रवाई पर तीखी टिप्पणी की। अदालत ने चेतावनी दी कि अगर उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी अपनी शक्तियों का इसी तरह अनियंत्रित और मनमाना इस्तेमाल करते रहे, तो राज्य के ‘ऑरवेलियन डिस्टोपिया’ में बदलने का खतरा है।
मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मामला नोएडा में फैक्ट्री मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़ा है। अधिकारियों ने प्रदर्शन पर कार्रवाई करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) जैसे कड़े कानून का इस्तेमाल किया, जिसके तहत किसी व्यक्ति को लंबे समय तक बिना मुकदमे के हिरासत में रखा जा सकता है।
आकृति चौधरी को नोएडा में हुए मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था। यह प्रदर्शन मामले की सुनवाई से करीब पांच महीने पहले हुआ था। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने 2 सितंबर को उनकी निरोधात्मक हिरासत को रद्द कर दिया था।
15 पन्नों के इस आदेश में अदालत ने कहा कि जब नौकरशाही और पुलिस अधिकारी अपनी शपथ के अनुरूप काम करते हैं तो राज्य के नागरिक उन्हें अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और उचित रूप से उन्हें ऐसी प्रतिष्ठा तक पहुंचाते हैं, जिससे देवता भी ईर्ष्या कर सकते हैं।
लेकिन जब अधिकारी अपनी उस पवित्र शपथ को नजरअंदाज कर उसके विपरीत काम करते हैं, तो नागरिक उन्हें ब्रिटिश शासन की एक दमनकारी विरासत के रूप में देखने लगते हैं। इससे अधिकारियों के प्रति गुस्सा और नफरत पैदा होती है और सामाजिक अशांति का वातावरण बनता है।
अदालत ने चेतावनी दी कि जब नागरिकों की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर बिना पर्याप्त कारण तथा कानून द्वारा निर्धारित उचित प्रक्रिया के बिना हमला किया जाता है, तो अदालत ऐसे मामलों में कड़े आदेश देकर गलत तरीके से पीड़ित नागरिक को मुआवजा दे सकती है और अधिकारियों के निरंकुश आचरण को रिकॉर्ड पर ला सकती है। अन्यथा, अदालत के शब्दों में, इसमें ज्यादा समय नहीं लगेगा जब नौकरशाही के गलत आचरण वाले अधिकारी उत्तर प्रदेश को ‘ऑरवेलियन डिस्टोपिया’ में बदल दें।
प्रदर्शन के बाद हुई पुलिस कार्रवाई
प्रदर्शन और उसके बाद हुई हिंसा के चलते पुलिस ने कार्रवाई की। इस दौरान 15 FIR दर्ज की गईं, जिनमें सैकड़ों लोगों को आरोपी बनाया गया और कम से कम 60 लोगों को जेल भेजा गया। इसके एक महीने बाद भी आरोपियों के परिवारों का कहना था कि वे आगे की कार्रवाई को लेकर स्पष्टता का इंतजार कर रहे हैं।इन आरोपियों में एक राजमिस्त्री से लेकर इतिहास विषय के छात्र तक, NIT से पढ़े व्यक्ति से लेकर निजी कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी तक शामिल थे।
जिला मजिस्ट्रेट के आचरण पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पारित निरोध आदेश के तरीके पर अदालत ने विशेष रूप से नाराजगी जताई। कोर्ट ने उनके आचरण को ‘उपहास के योग्य’ तक बताया। अदालत ने कहा कि पुलिस की रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों के अलावा कोई विश्वसनीय सामग्री नहीं थी। ऐसे मामले में जिला मजिस्ट्रेट से अपेक्षा थी कि वह सतर्क रहते, पूरे रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करते और यह पता लगाते कि आरोपों के समर्थन में वास्तव में कोई सामग्री मौजूद है या नहीं।
इसके बाद उन्हें यह भी देखना चाहिए था कि याचिकाकर्ता के खिलाफ NSA जैसे दमनकारी कानून के इस्तेमाल की जरूरत वास्तव में थी या नहीं। अदालत ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट को यह भी देखना चाहिए था कि सामान्य कानून एक ऐसी महिला छात्र कार्यकर्ता के मामले में अपर्याप्त क्यों था, जिसका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और जो मजदूरों के अधिकारों के लिए आंदोलन कर रही थी।
रिकॉर्ड में ऐसा भी कोई तथ्य नहीं था जिससे पता चलता हो कि उसने किसी तरह हिंसा भड़काई थी। कोर्ट के अनुसार, उपलब्ध सामग्री से यह प्रतीत होता है कि जिला मजिस्ट्रेट याचिकाकर्ता को एक उदाहरण बनाने और अन्य लोगों को मजदूरों के समर्थन में सार्वजनिक स्थानों पर अपने अभिव्यक्ति के अधिकार का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए कार्रवाई करना चाहते थे।
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट ने अपनी निष्ठा की शपथ का उल्लंघन किया है और यह ऐसा मामला है जिसमें याचिकाकर्ता को मुआवजा दिया जाना चाहिए।
5 लाख रुपये मुआवजे का आदेश
अदालत ने राज्य की ओर से जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से किए गए ‘कैजुअल एंड कैवेलियर एक्सरसाइज ऑफ अथॉरिटी’, यानी अधिकार के लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना इस्तेमाल की आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि इस कार्रवाई ने याचिकाकर्ता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया। इसके लिए अदालत ने उसे 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट के वेतन से वसूल की जाए, क्योंकि उन्होंने बिना दिमाग लगाए निरोध आदेश पारित किया था। इसके अलावा इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले अन्य अधिकारियों से भी राशि वसूल की जाए और इसकी जिम्मेदारी SHO तक तय की जाए।
IAS और IPS अधिकारियों को संविधान की याद दिलाई
हाईकोर्ट ने IAS और IPS अधिकारियों तथा उत्तर प्रदेश के नागरिकों के बीच संबंध पर भी विस्तार से बात की। अदालत ने कहा कि यही संबंध इस बात को परिभाषित करता है कि राज्य में कानून का शासन मौजूद है या नहीं।
अदालत ने कहा कि अधिकारियों को कानून के तहत व्यापक शक्तियां इसलिए दी गई हैं क्योंकि उन पर नागरिकों की स्थिति सुधारने की जिम्मेदारी होती है। उन्हें नागरिकों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों, सम्मान, गरिमा और कल्याण की रक्षा करते हुए सुशासन सुनिश्चित करना होता है। साथ ही उन्हें राज्य की स्थिरता और देश की एकता तथा अखंडता को भी बनाए रखना होता है।
लेकिन अदालत ने कहा कि “महान शक्तियों के साथ बड़ी जिम्मेदारी आती है।” इसलिए नौकरशाही को आत्ममंथन करना चाहिए कि वह अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किस सीमा तक और किस तरीके से कर रही है।
‘पावर विदाउट रिस्पॉन्सिबिलिटी’ का जिक्र
अदालत ने रुडयार्ड किपलिंग के उस प्रसिद्ध कथन का भी उल्लेख किया, जिसे सार्वजनिक रूप से स्टेनली बाल्डविन ने कहा था, “पावर विदाउट रिस्पॉन्सिबिलिटी – द प्रिरॉगेटिव ऑफ द हार्लट थ्रूआउट द एजेज”। यानी जिम्मेदारी के बिना शक्ति का इस्तेमाल हमेशा से निरंकुशता और मनमानी को जन्म देता है।
कोर्ट ने कहा कि जब नौकरशाही मानवीय संवेदनशीलता से रहित और लापरवाह तरीके से अपनी शक्ति का इस्तेमाल करती है और उसके परिणाम नागरिकों के लिए नुकसानदेह होते हैं, तब यह कथन सही साबित होता है।
अदालत ने यह भी कहा कि IAS और IPS देश के युवाओं में से सबसे प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित करते हैं। इन पदों पर पहुंचने के लिए उम्मीदवारों को तीन चरणों वाली कठिन चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है और चयनित अधिकारियों को देश की ओर से उपलब्ध ‘बेस्ट ऑफ द बेस्ट’ प्रतिभाओं में माना जाता है।
अधिकारियों की शपथ का भी उल्लेख
सक्रिय सेवा में आने से पहले अधिकारी ऐसी शपथ लेते हैं जिसमें वे भारत और संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा रखने, देश की संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखने तथा अपने पद के कर्तव्यों को निष्ठा, ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ निभाने का संकल्प लेते हैं।
इसी संदर्भ में अदालत ने कहा कि अधिकारियों को यह समझना चाहिए कि उनकी निष्ठा संविधान के प्रति है, राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं। उनकी ईमानदारी और निष्पक्षता उन लोगों के प्रति होनी चाहिए, जिनकी वे सेवा करते हैं। लोकतंत्र में अधिकारी जनता के सेवक हैं और जनता ही उनकी वास्तविक मालिक है।
प्रदर्शन लोकतंत्र का ‘सेफ्टी वाल्व’
अदालत ने सरकार को यह भी समझने की सलाह दी कि हर समाज में तनाव और सरकार के काम करने के तरीके को लेकर असहमति होती है। कोर्ट ने कहा कि आंदोलन और प्रदर्शन प्रेशर कुकर के सेफ्टी वाल्व की तरह होते हैं। इनके जरिए समाज में जमा असंतोष और दबाव बाहर निकलता है।
यदि ऐसे प्रदर्शनों को रोक दिया जाए और लोगों की भावनाओं को लगातार दबाया जाए, तो स्थिति उस बिंदु तक पहुंच सकती है जहां लोग सड़कों पर उतरते हैं और हिंसा को नियंत्रित करना कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है।
मजदूरों की मांग थी ज्यादा वेतन और मानवीय काम के घंटे
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए वीडियो फुटेज का भी सहारा लिया था। इन वीडियो में बड़ी संख्या में लोग दिखाई दे रहे थे। इनमें पुरुष और महिलाएं पारंपरिक ग्रामीण पोशाक में थे और एक व्यक्ति भीड़ को संबोधित करता हुआ नजर आ रहा था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पुलिस की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि किसी भी वीडियो में यह नहीं दिखता कि भीड़ उत्तेजित या हथियारबंद थी। लोगों के पास लाठी, पत्थर या हिंसा में इस्तेमाल किए जा सकने वाले अन्य हथियार भी दिखाई नहीं दे रहे थे। इसके उलट, कोर्ट के अनुसार, लोग अपने संवैधानिक अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते हुए अधिक वेतन और मानवीय कार्य घंटों की मांग को लेकर आंदोलन करते दिखाई दे रहे थे।
NSA के तहत हिरासत अपवाद है, सामान्य नियम नहीं
हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत के इस्तेमाल को लेकर भी महत्वपूर्ण स्पष्टता दी। अदालत ने कहा कि NSA के तहत हिरासत एक अपवाद है और इसका इस्तेमाल सामान्य कानून के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति को उसके मामले के गुण-दोष के आधार पर सामान्य कानून के तहत जमानत मिल सकती है, तो उसे जेल में बनाए रखने के लिए राज्य NSA के तहत ‘गढ़े हुए कारण’ नहीं बना सकता।
अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट द्वारा हिरासत के लिए दिए गए आधारों को ‘दोहरावपूर्ण, अटकलों पर आधारित और महज राय पर आधारित’ बताया। कोर्ट ने कहा कि इन आधारों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य या सामग्री नहीं दिखाई गई थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि हिरासत के आधार केवल आरोपों और अधिकारी की व्यक्तिगत राय तक सीमित नहीं हो सकते। आरोपों से पैदा हुई किसी सब्जेक्टिव ओपिनियन को ठोस सामग्री के संदर्भ से समर्थन मिलना जरूरी है। ऐसा न होने पर हिरासत का आदेश मनमाना माना जा सकता है।
आर्टिकल 21 के अधिकारों को हल्के में नहीं लिया जा सकता
कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले अधिकारों का सीधा उल्लंघन करने वाली शक्ति का इस्तेमाल हल्के ढंग से नहीं किया जा सकता। केवल अनुमान, पूर्वाग्रह, अटकलों और राय के आधार पर किसी व्यक्ति को हिरासत में रखना उचित नहीं है।
अदालत ने कहा कि संविधान की अदालत जब हिरासत के आधारों की समीक्षा करे तो उसे यह संतुष्ट होना चाहिए कि जिला मजिस्ट्रेट की सब्जेक्टिव सेटिस्फेक्शन केवल अनुमान और अटकलों पर आधारित नहीं है, बल्कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री पर उचित रूप से आधारित है।
साथ ही अदालत को यह भी संतुष्ट होना चाहिए कि यदि व्यक्ति को तुरंत हिरासत में नहीं लिया गया, तो बहुत अधिक संभावना है कि सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होगी या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नुकसानदेह कोई कृत्य हो सकता है। यदि ऐसी सामग्री मौजूद नहीं है, तो हिरासत के आधार और निरोध आदेश उचित नहीं माने जा सकते और उन्हें रद्द किया जाना चाहिए।
आकृति चौधरी की भूमिका क्या थी?
अदालत के अनुसार, आकृति चौधरी ने नागरिकों को मजदूरों के समर्थन में आने और उनके अधिकारों के लिए आंदोलन करने का आह्वान किया था। लेकिन अदालत को ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला जिससे यह संकेत मिले कि उनका आंदोलन हिंसक होने वाला था या वह राज्य के अधिकार को चुनौती देने वाला था।
कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता का अधिकार सड़कों पर निकलकर किसी मुद्दे के लिए आवाज उठाने और बिना हथियार शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने तक विस्तृत है, बशर्ते इससे सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा न हो।
शांतिपूर्ण भीड़ में बाहरी तत्व हिंसा फैला सकते हैं
अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि शांतिपूर्ण आंदोलन में ऐसे शरारती या दुर्भावनापूर्ण तत्व भेजे जा सकते हैं, जिनका उद्देश्य प्रदर्शन को विफल करना हो। ऐसे लोग हिंसा कर सकते हैं और बाद में उस हिंसा की जिम्मेदारी पूरी भीड़ पर डाल दी जा सकती है। अदालत ने इसे स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण बताया।
‘एक की गलती के कारण पूरे आंदोलन को मत कुचलो’
अदालत ने कहा कि केवल शांति भंग होने की आशंका के आधार पर लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर एकत्र होने या अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करने से रोकना ऐसा होगा जैसे “बाथरूम के पानी के साथ बच्चे को भी बाहर फेंक देना”, यानी कुछ संभावित गलत तत्वों के कारण पूरे शांतिपूर्ण समूह के अधिकार को खत्म कर देना।
अगर राज्य इस तरह का नजरिया अपनाता है और अदालतें भी इसे मंजूरी देती हैं, तो सार्वजनिक स्थानों पर सामूहिक रूप से अपनी राय व्यक्त करने की प्रक्रिया ही खत्म हो जाएगी। संविधान ऐसे सामूहिक अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा करता है और राज्य की व्यक्तिपरक राय के आधार पर इसे खत्म नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि राज्य के पास एक मजबूत और शक्तिशाली पुलिस बल है। पुलिस को बड़ी संख्या में लोगों के जमावड़े में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। साथ ही ऐसे प्रदर्शनों की वीडियोग्राफी भी की जानी चाहिए, ताकि यदि हिंसा होती है तो जिम्मेदारी तय की जा सके और जवाबदेही सुनिश्चित हो।
यह भी पढ़ें: ‘सरकार जिम्मेदारी से नहीं बच सकती’, सत्य निकेतन हादसे पर दिल्ली हाईकोर्ट ने लगाई फटकार
दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में बहुमंजिला पेइंग गेस्ट (PG) इमारत के ढहने की घटना को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को दिल्ली सरकार और संबंधित अधिकारियों पर कड़ी नाराजगी जताई। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
