इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक संस्थान के हेडमास्टर का निलंबन पर रोक लगा दी, जिसे गैस सिलेंडर की कमी के कारण चूल्हे पर मिड-डे मील पकाने के कारण निलंबित कर दिया गया था।
जस्टिस मंजू रानी चौहान ने आदेश दिया कि हेडमास्टर के खिलाफ विभागीय जांच पूरी होने तक निलंबन आदेश पर रोक रहेगी।
निलंबन आदेश पर लगी रोक
कोर्ट ने कहा, “जांच पूरी होने तक 19 मार्च के विवादित निलंबन आदेश का प्रभाव और उसका क्रियान्वयन स्थगित रहेगा और यह जांच के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगा।”
याचिकाकर्ता ने वाराणसी के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के 19 मार्च 2026 के आदेश को चुनौती दिया था, जिसके तहत उसके निलंबित किया गया था।
उसने तर्क दिया कि उन्होंने न तो कथित गैस की कमी के बारे में मीडिया में कोई बयान दिया और न ही वैधानिक प्रावधानों का कोई उल्लंघन किया था। साथ ही दलील दी कि उन्होंने गैस की कमी के बारे में किसी को सूचित नहीं किया था, जिस कारण मिड-डे मील लकड़ी के चूल्हे पर पकाना पड़ा।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उनकी ओर से कोई भी गैर-कानूनी कार्य नहीं किया गया, वे सिर्फ संस्था के हेडमास्टर के रूप में अपने कर्तव्य का पालन कर रहे थे।
वकील ने कहा कि निलंबन का आदेश अस्पष्ट था और ऐसे तथ्यों पर आधारित था जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं। यहाँ तक कि अगर इन आरोपों को सच भी माना जाए, तो भी वह अनुपातहीन था।
उन्होंने कहा कि अगर निलंबन आदेश में लगाए गए आरोपों को सच भी माना जाए तो वे किसी बड़े जुर्माने को लगाए जाने का औचित्य साबित नहीं करते।
कराए गए थे दो सिलेंडर उपलब्ध
दूसरी ओर सरकारी वकील ने कहा कि उन्हें दो सिलेंडर उपलब्ध कराए गए थे, फिर भी दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हुए मिड-डे मील चूल्हे पर पकाया गया। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि गैस सिलेंडरों की वास्तव में किल्लत थी, जिसके कारण हेडमास्टर के पास सीमित विकल्प रह गए थे।
सरकारी वकील ने कहा याचिकाकर्ता को आरोप पत्र एक सप्ताह के भीतर मिल जाएंगे और विभागीय जांच जल्द पूरी हो जाएगी।
कोर्ट ने दिया आदेश
इसके बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर आरोप पत्र उपलब्ध कराए जाएं और आदेश जारी होने के तारीख से दो माह के भीतर जांच पूरी की जाए।
कोर्ट ने कहा, “इस याचिका का निपटारा इस आदेश के साथ किया जाता है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जाए और कानून के मुताबिक, जल्द से जल्द इस आदेश की प्रमाणित प्रति पेश किए जाने की तारीख से दो माह के भीतर तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए। साथ ही आरोप पत्र आज से एक सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को दिया जाए और आरोप पत्र मिलने पर याचिकाकर्ता अपना जवाब पेश करे।”
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी आदेश दिया कि जांच प्रक्रिया में वह सहयोग करेंगे।
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