इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक अहम मामले में किन्नर समुदाय की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने यूपी सरकार से अपने लिए एक तय इलाका (territory) निर्धारित करने की मांग की थी, ताकि वे वहां पारंपरिक तरीके से “बधाई” (शुभ अवसरों पर मिलने वाले उपहार/पैसे) इकट्ठा कर सकें और दूसरे समूहों से टकराव न हो।
यह मामला गोंडा जिले के कर्नलगंज क्षेत्र से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि किन्नर समुदाय लंबे समय से शादी, जन्म या अन्य शुभ मौकों पर लोगों से बधाई लेता आया है और यह उनकी परंपरा का हिस्सा है। उनका दावा था कि पहले उनके कुछ तय इलाके होते थे, लेकिन अब दूसरे किन्नर समूह उन इलाकों में भी आकर पैसे मांगते हैं, जिससे झगड़े और हिंसक टकराव की स्थिति बन जाती है। यहां तक कि कई बार गंभीर चोटें और मारपीट की घटनाएं भी हुई हैं।
समानता, आजीविका और जीवन की सुरक्षा का अधिकार
याचिका में यह भी कहा गया कि सरकार उनके लिए एक स्पष्ट क्षेत्र तय करे, ताकि हर समूह अपने-अपने इलाके में शांतिपूर्वक बधाई ले सके और किसी तरह की हिंसा या विवाद न हो। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत अपने अधिकारों का हिस्सा बताया, यानी समानता, आजीविका और जीवन की सुरक्षा का अधिकार।
लेकिन हाईकोर्ट की दो जजों की बेंच – जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय – ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने साफ कहा कि किसी भी व्यक्ति या समूह को किसी अन्य व्यक्ति से पैसे वसूलने या लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं दिया जा सकता, जब तक वह कानून के दायरे में न हो। कोर्ट ने कहा कि देश में केवल वही टैक्स, फीस या शुल्क लिया जा सकता है जो कानून के अनुसार तय हो।
अदालत ने यह भी कहा कि अगर इस तरह की मांग को मंजूरी दी जाती है, तो यह गलत परंपरा को वैधता देने जैसा होगा। इससे आगे चलकर कई और समूह भी ऐसे ही ‘अवैध वसूली’ के अधिकार की मांग कर सकते हैं, जो कानून के खिलाफ होगा। कोर्ट ने इसे साफ तौर पर अपराध की श्रेणी में माना।
जजों ने यह भी कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानून मौजूद हैं, जैसे ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019, लेकिन उसमें भी इस तरह के ‘बधाई वसूली अधिकार’ को मान्यता नहीं दी गई है। अंत में अदालत ने कहा कि यह याचिका कानून के आधार पर टिक नहीं सकती, इसलिए इसे खारिज किया जाता है। इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया कि पारंपरिक प्रथाएं या सामाजिक परंपराएं तब तक कानूनी अधिकार नहीं बन सकतीं, जब तक उन्हें स्पष्ट रूप से कानून की मंजूरी न हो।
यह भी पढ़ें: ट्रांसजेंडर बिल पर बवाल: NCTP के सदस्य बोले- सरकार ने हमसे नहीं ली कोई राय
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (संशोधन) विधेयक 2026 लोकसभा और राज्यसभा से पारित हो चुका है। लेकिन नेशनल काउंसिल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स (NCTP) के सदस्यों का दावा है कि सरकार ने उनसे बिना सलाह लिए इस बिल को पेश किया और फिर पारित भी करवा दिया। इसी साल 20 मार्च को रात करीब 10:30 बजे ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट कल्कि सुब्रमण्यम को सामाजिक न्याय मंत्रालय से एक कॉल आया था। यह कॉल तब किया गया, जब ट्रांसजेंडर पर्सन्स (संशोधन) विधेयक 2026 संसद में पहले ही पेश हो चुका था। NCTP के सदस्यों का कहना है कि सरकार बिल तो लेकर आई, लेकिन उनसे कोई सलाह नहीं ली गई। इसी वजह से उन्होंने मंत्रालय को एक पत्र भी लिखा। इसके बाद उन्हें मीटिंग के लिए बुलाया गया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
