इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चार दशक पुराने एक मामले में 8000 रुपये की वसूली से जुड़े मुकदमे में अनोखा जुर्माना लगाया है। हाईकोर्ट ने इस केस को दोबारा खोलने से इनकार कर दिया और मुकदमेबाजों पर तथ्य को छिपाने औ झूठे दावों के आधार पर अंतरिम आदेश हासिल करने के आरोप में दो रुपये का अनोखा जुर्माना भी लगाया। दरअसल ये मुकदमा कृषि जमीन को लेकर 1984 के एक मामले से जुड़ा था।
जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र, एक मृत जजमेंट डेटर (निर्णय ऋणी) के कानून वारिसों तारा चंद और पांच अन्य द्वारा एक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में 1 जनवरी 1985 को पारित एक एकपक्षीय डिक्री (ex parte decree) और उसके बाद की निष्पादन प्रक्रियाओं को चुनौती दी गई थी, जिनके फलस्वरूप सहारनपुर जिले में कृषि भूमि की निलामी हुई थी।
क्यों लगाया दो रुपये का जुर्माना?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 22 मई को 2 रुपये का जुर्माना लगाते हुए कहा, “याचिकाकर्ताओं के झूठ और आचरण के लिए उन पर भारी और मिसाली जुर्माना लगाया जा सकता था, लेकिन रिकार्ड से पता चलता है कि वे जिस तबके से आते हैं, उसे देखते हुए कोर्ट उनपर भारी जुर्माना लगाने के मूड में नहीं है। फिर भी जिस तरह से पूरी कार्यवाही के दौरान उनका आचरण रहा है, उसे देखते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं पर दो रुपये का जुर्माना लगाना उचित समझा है, ताकि उन्हें इस कोर्ट की नजर में उनके एतराजों और आचरण की अहमियत का एहसास कराया जा सके।”
याचिकाकर्ताओं को कोर्ट द्वारा लगाया गया दो रुपये का जुर्माना 7 जुलाई तक जमा करने का निर्देश दिया गया है, ऐसा न करने पर सहारनपुर के जिला मजिस्ट्रेट को यह राशि भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल करने के लिए अधिकृत किया गया है।
10,000 से अधिक दिनों के बाद चुनौती
हाईकोर्ट ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि याचिका दायर करने में बहुत अधिक देरी हुई है। कोर्ट ने दो रुपये का जुर्माना लगाते हुए यह टिप्पणी की कि यह चुनौती संबंधित कार्यवाही के 10000 से अधिक दिनों बाद और डिक्री के अंतिम रूप ले लेने के दशकों बाद सामने आई है।
कोर्ट ने कहा, “जैसा कि बताया गया कि यह याचिका न केवल 10,274 दिनों की देरी के कारण बाधित दी, बल्कि यह यह सुनवाई योग्य भी नहीं थी और इस याचिका को दायर करना कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग और गलत इस्तेमाल था।”
कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता प्रभावी रूप से उस विवाद को फिर से शुरू करने की कोशिश कर रहे थे जो पहले ही दीवानी प्रक्रिया के सभी चरणों से गुजर चुका था और जिस पर 2 रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस स्थापित कानून पर भी भरोसा किया जिसमें कहा गया है कि निष्पादन कोर्ट किसी डिक्री के पीछे नहीं जा सकता और यहां तक कि कथित रूप से त्रुटिपूर्ण डिक्री भी अपील या अन्य उपयुक्त कार्यवाही द्वारा रद्द किए जाने तक बाध्यकारी बनी रहती है।
चूँकि 1 जनवरी 1985 के आदेश के विरुद्ध कभी कोई अपील दायर नहीं की गई थी, इसलिए हाईकोर्ट ने यह निर्णय दिया कि आर्टिकल 227 के अंतर्गत दायर याचिका के माध्यम से परोक्ष रूप से इसकी वैधता पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है, और साथ ही 2 रुपये का जुर्माना भी लगाया।
आठ हजार रुपये के कर्ज से शुरू हुआ विवाद
ये मुकदमा 1984 से जुड़ा है, यह मुकदमा मौजूदा याचिकाकर्ताओं के पिता जय नंद को कथित तौर पर दिए गए 8000 रुपये की वसूली के लिए दायर किया गया था।
1 जनवरी 1985 को एक ट्रायल कोर्ट ने केस को एकतरफा डिक्री किया और डिफेंडेंट को छह परसेंट सालाना ब्याज के साथ रकम चुकाने का निर्देश दिया। इसके बाद डिक्री-होल्डर ने एग्ज़िक्यूशन प्रोसीडिंग्स शुरू कीं।
हालांकि, जो एक रूटीन पैसे रिकवरी का केस लग रहा था, वह धीरे-धीरे एक लंबी कानूनी लड़ाई में बदल गया, जिसमें सहारनपुर की देवबंद तहसील के गांव नंधेडा खुर्द में खेती की ज़मीन पर अटैचमेंट, नीलामी और कम्पटीशन वाले दावे शामिल थे।
जय नंद की अक्टूबर 1988 में मौत हो गई, जिसके बाद डिक्री-होल्डर ने डिक्री की रकम वसूलने के लिए अपने कानूनी वारिसों के खिलाफ केस किया।
तीन दशकों से भी अधिक समय बाद लगभग 37 सालों के बाद वारिसों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें डिक्री या उसके निष्पादन की कार्यवाही के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और उन्होंने 1985 के बाद से हुई हर चीज को रद्द करने की मांग की।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि नीलामी अवैध थी
याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि उन्हें कार्यवाही के बारे में कई साल बाद ही पता चला, जब अधिकारियों ने विवादित संपत्ति की पैमाइश करने की कोशिश की।
उन्होंने दलील दी कि निष्पादन की कार्यवाही उनकी जानकारी के बिना की गई थी और एक अपेक्षाकृत छोटी धनराशि के आदेश (मनी डिक्री) को पूरा करने के लिए कीमती कृषि भूमि की नीलामी कर दी गई थी।
उनके वकील ने यह दलील दी कि एकतरफा डिक्री कानूनी रूप से दोषपूर्ण थी कि सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत उचित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था और यह कि नीलामी की कार्यवाही में गंभीर अनियमितताएं थीं।
याचिकाकर्ताओं ने आगे यह तर्क दिया कि चूंकि वे मूल मुकदमे में पक्षकार नहीं थे, इसलिए वह डिक्री उन पर अपने आप लागू नहीं हो सकती थी।
इस दलील को खारिज करते हुए, जस्टिस शैलेंद्र ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता स्पष्ट रूप से यह अनुमति देती है कि किसी मृत देनदार के कानूनी प्रतिनिधियों के खिलाफ भी डिक्री का पालन कराया जा सकता है।
कोर्ट ने संहिता की धारा 2(11), 50 और 146 का हवाला दिया और यह फैसला सुनाया कि याचिकाकर्ता, जिन्हें मृत व्यक्ति की संपत्ति विरासत में मिली है, वे डिक्री के पालन की कार्यवाही से छूट का दावा नहीं कर सकते।
कोर्ट ने कहा, “जहां तक देनदार के कानूनी प्रतिनिधियों की स्थिति से जुड़े कानूनी पहलू का सवाल है, तो कानूनी प्रतिनिधि का मतलब ऐसे व्यक्ति से है जो कानून की नजर में किसी मृत व्यक्ति की संपत्ति का प्रतिनिधित्व करता है।” कोर्ट ने 2 रुपये का जुर्माना लगाते हुए यह फैसला सुनाया कि वह डिक्री मृत व्यक्ति के कानूनी वारिसों के खिलाफ भी लागू रहेगी।
रिकॉर्ड दिखाते हैं कि पिटीशनर्स ने कार्रवाई में हिस्सा लिया था। पिटीशनर्स का एक मुख्य दावा यह था कि उन्हें एग्ज़िक्यूशन की कार्रवाई के बारे में पता नहीं था। हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी कहता है और 2 रुपये का जुर्माना लगाया।
एक याचिकाकर्ता ने कार्रवाई में लिया था हिस्सा
जस्टिस शैलेंद्र ने कहा कि अगस्त 1989 में एक नई एग्ज़िक्यूशन एप्लीकेशन फाइल करने के बाद कानूनी वारिसों को नोटिस जारी किए गए थे और 2 रुपये का जुर्माना लगाया गया था। इससे भी जरूरी बात यह है कि पिटीशनर्स में से एक ने कार्रवाई में एक्टिव रूप से हिस्सा लिया था और सिविल प्रोसीजर कोड के सेक्शन 47 के तहत ऑब्जेक्शन फाइल किए थे।
कोर्ट ने पाया कि उन आपत्तियों पर गौर किया गया था और 20 जुलाई 1993 को निष्पादन अदालत द्वारा उनका निपटारा कर दिया गया था और 2 रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
फैसले में कहा गया, “याचिकाकर्ताओं की ओर से यह दलील कि आदेश-पत्र में CPC की धारा 47 के तहत आपत्तियों के निपटारे का कोई संकेत नहीं मिलता, स्वीकार नहीं की जा सकती।”
चूंकि उन आपत्तियों पर दिए गए आदेश को कभी चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए कोर्ट ने माना कि वह आदेश बहुत पहले ही अंतिम रूप ले चुका था, और 2 रुपये का जुर्माना लगाया।
की गई ऑक्शन प्रोसेस की जांच
फैसले का एक बड़ा हिस्सा उस ऑक्शन की लीगैलिटी से जुड़ा है जिसके जरिए डिक्री-होल्डर ने आखिरकार विवादित प्रॉपर्टी हासिल की।
कोर्ट ने पाया कि पहले की ऑक्शन सेल को सच में रद्द कर दिया गया था क्योंकि डिक्री-होल्डर ने सिविल प्रोसीजर कोड के ऑर्डर XXI रूल 72 के तहत एग्जीक्यूटिंग कोर्ट से पहले इजाजत लिए बिना प्रॉपर्टी खरीदी थी।
हालांकि, एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ने बाद में इस कमी को ठीक कर दिया। तय प्रोसेस को फॉलो करने के बाद 1999 में एक नई ऑक्शन की गई।
जब कोई मुकाबला करने वाला बोली लगाने वाला सामने नहीं आया, तो डिक्री-होल्डर सबसे अधिक बोली लगाने वाला बन गया और उसने कोर्ट की इजाजत से प्रॉपर्टी खरीद ली। बिक्री पक्की हो गई, एक सेल सर्टिफिकेट जारी किया गया, और बाद में प्रॉपर्टी नीलामी खरीदने वाले के पक्ष में म्यूटेट कर दी गई।
कोर्ट की ओर से डिक्री से पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद 2002 में एग्जिक्यूशन की कार्रवाई औपचारिक रूप से बंद कर दी गई। जस्टिस शैलेंद्र ने कहा, “कोर्ट इस बात से संतुष्ट है कि कानून के सही तरीके का पालन किया गया था।” कोर्ट ने 12 अगस्त तक एक अनुपालन रिपोर्ट मांगी है।
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