सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। क्योंकि हाई कोर्ट ने उस व्यक्ति को जमानत दे दी थी जिस पर अपनी पत्नी की बार-बार दहेज की मांग पूरी न करने पर गला घोंटकर हत्या करने का आरोप है। इस मांग में टोयोटा फॉर्च्यूनर कार और नकदी शामिल थी।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस जेबी परदीवाला और विजय बिश्नोई की पीठ ने पाया कि हाई कोर्ट ने तथ्यों को ठीक से दर्ज भी नहीं किया था और दहेज हत्या के मामलों में लागू होने वाली परिस्थितियों या वैधानिक अनुमानों की जांच किए बिना, मुख्य रूप से एफआईआर दर्ज करने में देरी के आधार पर जमानत दे दी थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि हमें यह देखकर अत्यंत खेद है कि हाई कोर्ट ने दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध में आरोपी को जमानत देने के लिए दिए गए तर्कों की त्रुटिपूर्ण श्रृंखला से परे, तथ्यों को भी सही ढंग से दर्ज नहीं किया है। हमारा मानना है कि हाई कोर्ट ने आरोपी के पक्ष में अपने विवेक का प्रयोग करने में घोर त्रुटि की है।”
इसमें कहा गया है कि यह मामला दहेज के लिए युवा विवाहित महिलाओं के साथ क्रूरता करने और उनकी हत्या करने के एक परेशान करने वाले पैटर्न को दर्शाता है। खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यों में।
इसमें 2023 के आंकड़ों का हवाला दिया गया है जिसमें देशभर में दहेज से संबंधित 6,156 मौतें दर्ज की गईं, जिनमें से 2,122 उत्तर प्रदेश में और 1,143 बिहार में हुईं। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि कानूनी प्रतिबंधों और शिक्षा तक बढ़ती पहुंच के बावजूद दहेज की मांग बनी हुई हैं, जो अक्सर शादी के बाद जबरदस्ती और हिंसा में बदल जाती हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि हमने समय के साथ देखा है कि उत्तर प्रदेश राज्य में नवविवाहित युवतियों को दहेज की कमी के कारण उनके ससुराल में बेरहमी से मार डाला जा रहा है। या तो उन्हें लगातार उत्पीड़न के कारण आत्महत्या करने पर मजबूर किया जाता है या अधिक दहेज की कमी के कारण उनकी हत्या कर दी जाती है।
यह मामला 2024 में गाजियाबाद में एक महिला की मौत से जुड़ा है। उस महिला की शादी आरोपी प्रिंस चौधरी से फरवरी 2019 में हुई थी।
पीड़िता के पिता द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर के अनुसार, परिवार ने शादी में 30 लाख रुपये से ज्यादा खर्च किए थे, जिसमें एक I20 कार और 10 लाख रुपये नकद शामिल थे। हालांकि, जब I20 कार एक दुर्घटना में क्षतिग्रस्त हो गई, तो पति और उसके परिवार ने फॉर्च्यूनर कार और अतिरिक्त 10 लाख रुपये की मांग शुरू कर दी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि जब ये मांगें पूरी नहीं हुईं, तो महिला को लगातार शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का शिकार बनाया गया। आरोप है कि उसे पीटा गया, गाली दी गई, भूखा रखा गया और जान से मारने की धमकी दी गई। उसके पिता ने बताया कि आगे की मांगें पूरी करने में असमर्थता जताने के बावजूद, उन्होंने पारिवारिक खातों से पति के रिश्तेदारों को 4 लाख रुपये दिए और कई बार 5 लाख रुपये नकद दिए। हालांकि, उत्पीड़न कथित तौर पर जारी रहा।
11 जुलाई 2024 को सुबह लगभग 7:30 बजे महिला ने अपने पिता से फोन पर बात की। एफआईआर के अनुसार, वह रो रही थी और उसने बताया कि उसे पीटा जा रहा है और गला घोंटकर या फांसी पर लटकाकर मारने की धमकी दी जा रही है।
कुछ घंटों बाद, उसके ससुराल से एक रिश्तेदार ने कथित तौर पर उसके परिवार को सूचित किया कि उसकी गला घोंटकर फांसी लगा दी गई है। जब परिवार उसके ससुराल पहुंचा तो वह वहां नहीं थी। पड़ोसियों ने उन्हें बताया कि उसके शव को अस्पताल ले जाया गया है। जिसके बाद पिता ने गाजियाबाद के एक अस्पताल में अपनी बेटी को मृत पाया।
घटना के अगले दिन ही दिन प्रिंस के परिवार के आठ सदस्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। जांच के बाद, भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं के तहत प्रिंस और उनके माता-पिता के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया।
एफआईआर में दर्ज किया गया कि पीड़िता की गर्दन और शरीर पर चोट के स्पष्ट निशान थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चेहरे, बांहों और छाती पर खरोंचों सहित कई अन्य चोटें दर्ज की गईं, जिनमें गर्दन के चारों ओर 32 सेंटीमीटर लंबा रस्सी का निशान भी शामिल था।
गिरफ्तारी के बाद प्रिंस ने पहले सेशन कोर्ट में जमानत के लिए अर्जी दी। हालांकि, सेशन कोर्ट ने उनकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की। जिसने एफआईआर दर्ज करने में देरी का हवाला देते हुए उन्हें जमानत दे दी।
मृतका के पिता ने इसके बाद हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। रिकॉर्ड की जांच करने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि एफआईआर मृत्यु के ठीक अगले दिन ही तुरंत दर्ज कर ली गई थी और हाई कोर्ट ने इसे विलंबित मानकर गलती की थी।
शीर्ष अदालत ने आगे यह भी कहा कि उच्च न्यायालय भारतीय साक्षी अधिनियम (बीएसए), 2023 की धारा 118 के तहत वैधानिक अनुमान को ध्यान में रखने में विफल रहा है, जो दहेज मृत्यु के मामलों में लागू होता है जहां मृत्यु से ठीक पहले उत्पीड़न दिखाया जाता है।
अदालत ने कहा कि पुत्री के माता-पिता को उसकी मृत्यु की सूचना अगले ही दिन, यानी 12.07.2024 को मिली, और उसी दिन संबंधित पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा दी गई। एफआईआर दर्ज करने में देरी कहां हुई? मान लीजिए कि एफआईआर दर्ज करने में कुछ देरी हुई भी, तो क्या दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध में यह अपने आप में आरोपी को जमानत पर रिहा करने का आधार हो सकता है? ऐसा लगता है कि उच्च न्यायालय पूरी तरह अनभिज्ञ रहा।
इसमें पोस्टमार्टम के निष्कर्षों का भी उल्लेख किया गया और यह देखा गया कि चोटों की प्रकृति को मुकदमे के दौरान ठीक से समझने की आवश्यकता है और जमानत के चरण में इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसके बाद न्यायालय ने दहेज से संबंधित अपराधों के व्यापक सामाजिक संदर्भ पर विचार किया और पाया कि दशकों से कानूनी प्रतिबंध के बावजूद यह प्रथा जारी है।
इसमें कहा गया है कि भारत में, जहां परंपरागत रूप से बेटी को ‘पराया धन’ माना जाता है। वहां माता-पिता या अभिभावकों द्वारा विवाह में ‘उपहार’ देने की एक गहरी जड़ें जमाई हुई, लेकिन अक्सर अनकही, प्रथा मौजूद है, ताकि उनकी बेटी के वैवाहिक जीवन में सुख हो।
न्यायालय ने पाया कि विवाह के बाद इस प्रकार की प्रथाएं अक्सर बढ़ जाती हैं। इसमें कहा गया कि शादी से पहले, दूल्हे का परिवार शायद ही कभी अत्यधिक मांगें करता है, लेकिन एक बार शादी औपचारिक रूप से संपन्न हो जाने के बाद वे दबाव डालना शुरू कर देते हैं, यह मानते हुए कि दुल्हन के माता-पिता के पास शादी को बनाए रखने के लिए उनकी बात मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।
इसमें इसे जबरदस्ती और ब्लैकमेल का एक कपटपूर्ण चक्र बताया गया है। जहां लगातार मांगें महिलाओं को असुरक्षित परिस्थितियों में डाल देती हैं। अदालत ने कहा कि इस प्रथा को जड़ से खत्म करने के लिए समाज में एक गहरे बदलाव की जरूरत है। जिसमें दहेज देने से इनकार करना और दहेज मांगने वालों के खिलाफ सामाजिक कलंक लगाना शामिल है। अंत में न्यायालय ने चेतावनी दी कि न्यायिक आदेशों से यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि ऐसे अपराधों को हल्के में लिया जा रहा है। इसके बाद कोर्ट ने मृतका के पति प्रिंस की जमानत रद्द कर दी और उसे एक सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने निचली अदालत को एक वर्ष के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी करने का भी निर्देश दिया।
केंद्र सरकार ने मॉनसून सत्र के मद्देनजर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने वाले विधेयक का मंजूरी दे दी है। विधेयक में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने का प्रावधान है। पढ़ें पूरी खबर।
