इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में मवेशियों के कथित गैर-कानूनी परिवहन को लेकर एक अहम टिप्पणी की। साथ ही कोर्ट ने इस सिलसिले में ज़ब्त किए गए एक ट्रक को छोड़ने का आदेश भी दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्य के अंदर सिर्फ़ गायों या उनके गोवंश को ले जाना यूपी काउ स्लॉटर प्रिवेंशन एक्ट के तहत कोई जुर्म नहीं है। जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि माना कि गाड़ी के अंदर कोई बीफ़ नहीं मिला और रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे पता चले कि गायों या उनके गोवंश को काटने के लिए स्मगल किया जा रहा था।
सिर्फ़ गायों को ले जाना जुर्म नहीं- हाई कोर्ट
कोर्ट ने 15 अप्रैल के अपने आदेश में कहा, “सिर्फ़ गायों या उनके गोवंश को राज्य के अंदर ले जाना जुर्म नहीं कहा जा सकता।” मार्च 2024 में याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ UP काउ स्लॉटर प्रिवेंशन एक्ट, प्रिवेंशन ऑफ़ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, इंडियन पीनल कोड और आर्म्स एक्ट के तहत FIR दर्ज की गई थी। आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता का ड्राइवर ट्रक में गायों को ले जा रहा था। याचिकाकर्ता के नाम पर रजिस्टर्ड गाड़ी को बाद में ज़ब्त कर लिया गया। अपनी गाड़ी ज़ब्त होने से दुखी होकर उसने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि गाड़ी से कोई बीफ़ नहीं मिला और न ही गोकशी का कोई आरोप था। उसने आगे कहा कि ट्रक के लंबे समय तक जब्त रहने से उसकी रोज़ी-रोटी छिन गई। यह भी कहा गया कि गाड़ी को लंबे समय तक पुलिस स्टेशन में रखने से उसकी कीमत कम हो सकती है और आखिर में वह कबाड़ बन सकती है।
सरकारी वकील ने किया था जमानत का विरोध
याचिका का विरोध करते हुए अतिरिक्त सरकारी वकील (AGA) ने याचिका की मेंटेनेबिलिटी को चुनौती दी। उन्होंने आगे कहा कि UP प्रिवेंशन ऑफ़ काउ स्लॉटर (अमेंडमेंट) एक्ट, 2020 के सेक्शन 5-A के सब-सेक्शन (7) के तहत गाड़ी ज़ब्त करने के आदेश में कोई गैर-कानूनी बात नहीं थी। सेक्शन 5 A(7) कहता है- जिस गाड़ी से इस एक्ट और संबंधित नियमों के नियमों का उल्लंघन करके बीफ़ या गाय और उसके गोवंश को ले जाया जाता है, उसे कानून लागू करने वाले अधिकारियों द्वारा ज़ब्त और ज़ब्त किया जाएगा। संबंधित डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट/पुलिस कमिश्नर, जैसा भी मामला हो, ज़ब्त करने और छोड़ने की कार्रवाई करेंगे।
शुरू में इलाहबाद हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट ने प्री-अरेस्ट बेल दी थी। एक मिसाल का हवाला देते हुए कोर्ट ने यह भी दोहराया कि ज़ब्त गाड़ियों को लंबे समय तक पुलिस कस्टडी में रखने का कोई मकसद नहीं होता और इससे वे खराब हो जाती हैं।
कोर्ट ने कहा, “यह मजिस्ट्रेट का काम है कि अगर किसी भी समय ज़रूरत पड़े, तो गाड़ियों को वापस करने के लिए सही बॉन्ड और गारंटी के साथ-साथ सिक्योरिटी लेकर तुरंत सही ऑर्डर पास करें। ऐसा ऐसी गाड़ियों को वापस करने के पत्र की सुनवाई पेंडिंग रहने तक किया जा सकता है।”
कोर्ट ने क्या कहा?
मेंटेनेबिलिटी के मुद्दे पर कोर्ट ने राज्य की आपत्ति को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कोई दूसरा तरीका होने से आर्टिकल 226 के तहत हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर कोई रोक नहीं लगती। कोर्ट ने कहा, “दूसरा तरीका संविधान के आर्टिकल 226/227 या CrPC के 482 या 528 BNSS के तहत पावर का इस्तेमाल करने पर कोई रोक नहीं है, इसलिए AGA की आपत्ति फेल हो जाती है।”
कोर्ट ने दूसरे फैसले पर भरोसा करते हुए और यह देखते हुए कि गाड़ी पिछले दो साल से पुलिस स्टेशन के खुले परिसर में खड़ी थी और कबाड़ हो रही थी, याचिकाकर्ता की गाड़ी को छोड़ने की अर्जी मान ली। इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रक को याचिकाकर्ता को पर्सनल बॉन्ड और श्योरिटी देने पर छोड़ा जाए। साथ ही शर्त लगाई कि गाड़ी को बेचा या बदला नहीं जाएगा और ज़रूरत पड़ने पर कोर्ट के सामने पेश किया जाएगा।
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