उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस उपनिरीक्षक राम अवतार सिंह यादव ने अपने प्रमोशन के लिए करीब 25 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। सेवा के दौरान प्रमोशन से वंचित किए जाने के बाद उन्होंने पुलिस विभाग से लेकर राज्य लोक सेवा अधिकरण और फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट तक अपनी लड़ाई जारी रखी। 85 साल की उम्र में आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और कोर्ट ने उन्हें इंस्पेक्टर पद के सभी लाभ देने का आदेश दिया।

यादव मूल रूप से इटावा के परसौली ओढमपुर के रहने वाले हैं। अपने हक की लड़ाई के लिए उन्हें कई बार 450 किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर कोर्ट में खुद पेश होना पड़ा। कोर्ट ने उनके इस प्रयास और मामले को आगे बढ़ाने में दिखाई गई तत्परता को भी अपने आदेश में दर्ज किया।

1980 से मिलेगा प्रमोशन का लाभ

इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि राम अवतार सिंह यादव को 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर पद के वेतन और अन्य लाभ दिए जाएं। कोर्ट ने उनकी सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले संबंधित लाभों को भी संशोधित करने का आदेश दिया है। इन सभी लाभों का भुगतान चार सप्ताह के भीतर करने को कहा गया है।

न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता के साथ ‘अनुचित व्यवहार’ किया गया। कोर्ट ने यह भी माना कि यादव ने अपने मामले को आगे बढ़ाने में असाधारण दृढ़ता दिखाई।

प्रमोशन क्यों रोका गया था?

यादव ने सेवा के दौरान अपने बैच के अन्य अधिकारियों को प्रमोशन मिलने के बाद विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और DGP के सामने अपना पक्ष रखा था। हालांकि, अप्रैल 2010 में DGP ने उनके दावे को खारिज कर दिया।

DGP के आदेश में यादव की गोपनीय चरित्र प्रविष्टियों में प्रतिकूल टिप्पणियों और पूर्व में मिली एक सजा का हवाला दिया गया था। आदेश में कहा गया था कि उन्हें पांच बार दंडित किया गया था और सात बार उनके रिकॉर्ड में प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज की गई थीं।

यादव ने इन आधारों को चुनौती देते हुए राज्य लोक सेवा अधिकरण, लखनऊ का रुख किया। नवंबर 2012 में उनका दावा खारिज कर दिया गया। इसके बाद उनकी पुनर्विचार याचिका भी अगले साल खारिज हो गई।

हाई कोर्ट में भी लंबी चली लड़ाई

अधिकरण के फैसले को यादव ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, फरवरी 2015 में उनकी याचिका गैर-प्रॉसिक्यूशन के कारण खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने याचिका बहाल करने के लिए आवेदन किया, लेकिन दिसंबर 2025 में एक अन्य पीठ ने भी इसे गैर-प्रॉसिक्यूशन के आधार पर खारिज कर दिया।

इसके बाद यादव ने दिसंबर के आदेश को वापस लेने के लिए मौजूदा आवेदन दाखिल किया। उन्होंने कोर्ट के सामने एक अहम बात रखी कि DGP के 2010 के आदेश में जिन प्रतिकूल प्रविष्टियों का हवाला दिया गया था, उन्हें कभी उन्हें बताया ही नहीं गया था।

‘नकारात्मक बात साबित करने के लिए नहीं कहा जा सकता’

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के लिए यह साबित करना संभव नहीं है कि उसे कोई बात बताई ही नहीं गई। कोर्ट के अनुसार, विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह यह साबित करता कि प्रतिकूल प्रविष्टियां याचिकाकर्ता को विधिवत बताई गई थीं।

पीठ ने कहा कि यादव का यह कहना कि उन्हें वर्षों की प्रतिकूल प्रविष्टियों की जानकारी नहीं दी गई थी, ऐसी स्थिति में उनसे इसका उल्टा साबित करने की मांग नहीं की जा सकती। कोर्ट ने माना कि अधिकरण ने इस महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान नहीं दिया।

25 साल बाद मिला हक

कोर्ट ने कहा कि केवल प्रतिकूल प्रविष्टियों के आधार पर प्रमोशन से इनकार करना इस बात को साबित नहीं करता कि यादव पर प्रमोशन के लिए उचित तरीके से विचार किया गया था। पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि याचिकाकर्ता के साथ अन्याय हुआ।

अब 85 वर्षीय राम अवतार सिंह यादव को 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर के पद के वेतन और अन्य लाभ मिलेंगे। साथ ही उनकी सेवानिवृत्ति से जुड़े लाभों को भी उसी आधार पर संशोधित किया जाएगा। 85 साल की उम्र में मिली यह जीत सिर्फ एक पदोन्नति का मामला नहीं है, बल्कि उस जिद और धैर्य की मिसाल भी है जिसके साथ राम अवतार सिंह यादव ने करीब ढाई दशक तक अपने अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखी।

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