दिल्ली हाई कोर्ट ने दाऊद इब्राहिम गिरोह से कथित रूप से जुड़े एक व्यक्ति के खिलाफ हत्या की साजिश के आरोपों को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि पुलिस अपराध रोकने के नाम पर ‘आपराधिक न्याय प्रणाली’ के नियमों और सुरक्षा उपायों का उल्लंघन नहीं कर सकती।

यह मामला एक व्यक्ति की याचिका से जुड़ा था, जिसने 2004 में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उस पर बबलू श्रीवास्तव की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया गया था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि उसके संबंध दाऊद इब्राहिम गिरोह के लोगों से हैं।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि पुलिस का अपराधों पर नजर रखना और लोगों की सुरक्षा के लिए सतर्क रहना जरूरी है और यह एक सराहनीय काम है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पुलिस कानून और न्याय प्रक्रिया को नजरअंदाज कर दे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध से निपटने के लिए कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई की जानी चाहिए।

याचिकाकर्ता ने निचली आदेश को इन आधारों पर दी थी चुनौती

याचिकाकर्ता ने 2004 के निचली अदालत के आदेश को निम्नलिखित आधारों पर चुनौती दी कि एफआईआर एक पुलिस अधिकारी की शिकायत के आधार पर दर्ज की गई थी, जो जांच अधिकारी भी थे और उन्होंने ही इस मामले में सबूत जुटाए और आरोपपत्र दाखिल किया।

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इसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध प्रथम दृष्टया षड्यंत्र का मामला सिद्ध करने का कोई आधार नहीं था। याचिकाकर्ताओं और अबू सलेम के बीच हुई कथित बातचीत, यदि उसे सत्य भी मान लिया जाए, तो भी प्रथम दृष्टया षड्यंत्र का मामला नहीं बनता। रिकॉर्ड की गई टेलीफोन बातचीत से संबंधित रिपोर्ट से यह बात निर्विवाद रूप से साबित नहीं होती कि टेप पर रिकॉर्ड की गई आवाज आरोपी की ही है, जिससे अभियोजन पक्ष का पूरा मामला निराधार हो जाता है।

इसके अलावा रिकॉर्ड किए गए बयान के अलावा ऐसा कोई स्वतंत्र सबूत नहीं है जो इस बात का समर्थन करता हो कि याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर बबलू श्रीवास्तव की हत्या के लिए अबू सलेम के साथ साजिश रची थी।

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