Sabarimala Case Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने मंगलवार को सबरीमाला मुद्दे पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि किसी महिला को महीने में तीन दिन अछूत नहीं माना जा सकता और फिर चौथे दिन उसे अछूत मानना ​​बंद कर दिया जाए, ऐसा नहीं हो सकता।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “इस मामले में ‘अनुच्छेद 17’ यानी छुआछूत के खिलाफ अधिकार पर दलील किस तरह पेश की जाए, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने 3 दिन तक तो महिला को ‘अछूत’ माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई ‘अछूतपन’ न रह जाए।”

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर आयु प्रतिबंध हटाने वाले अपने 2018 के फैसले की समीक्षा की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने क्या-क्या तर्क दिए

इस मामले की सुनवाई की शुरुआत सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की तरफ से शुरू हुई। इसमें जस्टिस नागरत्ना ने सबरीमाला मामले के संदर्भ में अनुच्छेद 17 की तरफ इशारा किया। जस्टिस नागरत्ना के विचार साझा करने से पहले मेहता ने 2018 के उस फैसले पर आपत्ति जताई थी जिसमें कहा गया था कि मासिक धर्म की अशुद्धता के आधार पर महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध अस्पृश्यता का एक रूप है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “सबरीमाला में एक मत यह है कि अनुच्छेद 17 महिलाओं पर लागू होता है। आप महिलाओं को अछूतों की तरह मान रहे हैं, यह एक मत है। मुझे इस पर कड़ी आपत्ति है।” उन्होंने आगे कहा, “भारत उतना पितृसत्तात्मक या लैंगिक रूढ़िबद्ध समाज नहीं है जितना पश्चिम समझता है।” इस पर जस्टिस नागरत्ना ने मामले में अनुच्छेद 17 के लागू होने पर सवाल उठाया।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि अगर कोई सामाजिक बुराई है, जिसे धार्मिक प्रथा का नाम दिया जा रहा है, तो अदालत निश्चित रूप से दोनों के बीच अंतर कर सकती है। एसजी मेहता ने कहा कि आवश्यक प्रथा एक अलग मुद्दा है, लेकिन अगर यह एक सामाजिक बुराई है, तो इसका जवाब हां हो सकता है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 25 मौजूदा स्थिति और भविष्य में किए जाने वाले कार्यों के बीच संतुलन स्थापित करता है। उन्होंने कहा, “भविष्य में क्या करना है, यह विधायिका पर छोड़ दिया गया है, लेकिन संविधान अनुच्छेद 25 में पहले से मौजूद प्रावधानों को संरक्षित करने का भी प्रयास करता है।”

सबरीमाला मामला आखिर क्या है?

सुप्रीम कोर्ट केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर आयु प्रतिबंध हटाने वाले अपने 2018 के फैसले की समीक्षा की मांग वाली याचिकाओं पर अंतिम दलीलें सुन रहा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत इस पीठ की अध्यक्षता कर रहे हैं। इसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची भी शामिल हैं।

28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से महिला विजिटर्स पर आयु प्रतिबंध हटा दिया और केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल नियम, 1965 के नियम 3 (बी) को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया, जो रीति-रिवाज के आधार पर महिलाओं को बाहर करने की अनुमति देता था।

सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर केरल सरकार नरम

केरल के सबरीमाला मंदिर में एक खास उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर रोक के मामले में केरल की वाम लोकतांत्रिक सरकार ने शनिवार को अपना पहले का रुख थोड़ा नरम कर लिया है। सरकार ने कहा कि कई वर्षों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं में बदलाव करने से पहले उस धर्म के विद्वानों और समाज सुधारकों से व्यापक सलाह लेना जरूरी है। पढ़ें पूरी खबर…