पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने हाल ही में 81 साल के याचिकाकर्ता राम निवास अग्रवाल को आपराधिक अवमानना ​​का दोषी ठहराया है। उन्होंने अपने खिलाफ अंतरिम आदेश आने के बाद हाई कोर्ट और जिला अदालतों के मौजूदा जजों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं।

जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की डिवीजन बेंच ने अग्रवाल के ‘सच’ और ‘निष्पक्ष आलोचना’ वाले बचाव को खारिज करते हुए कहा, “बिना किसी आधार के मनगढ़ंत बातों पर यकीन करना, जिसे बार-बार सोचने और बेतुकी हरकतों से और पक्का किया गया हो, सच नहीं हो सकता। किसी झूठ को बार-बार दोहराने या जोर-शोर से कहने से वह सच नहीं बन जाता।”

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला हिसार जिले के हांसी में 1976 के पेट्रोल पंप पार्टनरशिप विवाद से जुड़ा है। अग्रवाल का आरोप था कि एक पूर्व विधायक और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) के अधिकारियों की मिलीभगत से 1988 में एक जाली ‘डिजॉल्यूशन डीड’ (साझेदारी खत्म करने का दस्तावेज़) बनाकर उन्हें जबरदस्ती बाहर निकाल दिया गया था।

अगस्त 2019 में हाई कोर्ट के उन अंतरिम आदेशों से नाराज होकर जिनमें आरोपियों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट दी गई थी और ट्रायल की कार्यवाही पर रोक लगा दी गई थी, अग्रवाल ने सब-डिविज़नल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (SDJM) के सामने गिरफ़्तारी वारंट की मांग करते हुए एक अर्ज़ी दी।

उनकी अर्ज़ी के साथ हाई कोर्ट के कई जजों और निचली अदालतों के न्यायिक अधिकारियों को भेजे गए तथाकथित “कारण बताओ नोटिस” (show cause notices) भी लगे थे। इन नोटिसों में उन पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और आरोपियों के साथ आपराधिक साज़िश रचने का आरोप लगाया गया था।

कोर्ट ने निष्पक्ष आलोचना की दलील को खारिज करते हुए कहा कि संबंधित धारा 5 केवल अंतिम फैसलों (final judgments) की आलोचना पर लागू होती है, लंबित मामलों पर नहीं।

कोर्ट ने कहा कि किसी फैसले की तथ्यात्मक और निष्पक्ष आलोचना और किसी जज की निंदा या बदनाम करना, दोनों अलग बातें हैं। कोर्ट के मुताबिक, अग्रवाल ने जजों पर बार-बार व्यक्तिगत मंशा के आरोप लगाए और इस तरह न्यायपालिका पर सुनियोजित तरीके से हमला किया।

पीठ ने माना कि अग्रवाल का लगातार पश्चाताप न करने वाला रवैया जजों पर दबाव बनाने और उन्हें किसी मामले से अलग होने या अपने पक्ष में फैसला देने के लिए मजबूर करने की कोशिश थी। इसलिए कोर्ट ने उन्हें अवमानना का दोषी ठहराया। अब उनकी मौजूदगी सुनिश्चित करने के लिए वारंट जारी किया गया है। उन्हें 12 अक्टूबर 2026 को सजा की मात्रा (quantum of sentence) पर सुनवाई के लिए अदालत में पेश होना होगा।

टूटा शौचालय, पानी गायब… पत्रकार ने दिखाई स्कूल की सच्चाई तो दर्ज हुई FIR, हाईकोर्ट ने रोक दी कार्रवाई

लखनऊ के एक सरकारी स्कूल की बदहाल स्थिति और साफ-सफाई की खराब व्यवस्था को उजागर करना एक पत्रकार को भारी पड़ गया। रिपोर्ट के बाद उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर के मामले में अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा हस्तक्षेप किया है। कोर्ट ने पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक लगाते हुए अगली सुनवाई तक उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया है। पढ़ें पूरी खबर।