दिल्ली की एक पॉक्सो कोर्ट ने आठ साल की अनाथ लड़की का यौन उत्पीड़न करने वाले 72 वर्षीय शख्स को 20 साल के कैद की सजा सुनाई। अदालत ने मामले में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यह वो गिद्ध हैं जो अपनी हवस मिटाने के लिए बच्चों पर नजरें गड़ाए रहते हैं। अदालत ने यह माना कि ऐसे कृत्य केवल आपराध नहीं हैं बल्कि स्वयं ‘बचपन पर एक हमला’ हैं।
तीस हजारी कोर्ट स्थित फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (POCSO) की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बबीता पुनिया मामले की सुनवाई कर रही थीं। वे पिछले साल दिसंबर में एक नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा पर दलीलें सुन रही थीं।
अदालत ने 24 मार्च को यह टिप्पणी की, “यह बेहद डरावनी बात है कि हम ऐसे समाज में रहते हैं, जहां बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। इन (दोषी) जैसे लोग अपनी हवस मिटाने के लिए गिद्धों की तरह उन पर नजर रखते हैं। यह महज एक अपराध नहीं है, यह तो बचपन पर ही एक हमला है – हमारे राष्ट्र के भविष्य पर। ”
अदालत ने कहा कि उसने सजा सुनाने का फैसला इस आधार पर लिया है कि यह न्याय के हित में है और POCSO अपराधों के लिए सजा मिलनी ही चाहिए। ये टिप्पणियां सजा सुनाने वाले एक सख्त आदेश का हिस्सा थीं, जिसे उसी अदालत ने 23 मार्च को आरोपी को दोषी ठहराने के एक दिन बाद पारित किया था।
कोर्ट ने क्यों सुनाया फैसला?
दरअसल, कोर्ट के इस सख्त सजा तक पहुंचने की वजह अटूट विश्वास पर आघात थी जो आरोपी के कारण बच्ची को पहुंची। आठ साल की पीड़िता जो अनाथ है आरोपी को दादा कहती थी। एक ऐसा रिश्ता जिसमें प्रेम, विश्वास और सुरक्षा होती है। हालांकि, आरोपी ने उसके इस विश्वास का फायदा उठाकर उसका यौन शोषण किया।
अदालत ने आरोपी और पीड़िता के बीच 64 साल के भारी उम्र के अंतर को रेखांकित करते हुए इसे एक ऐसा गंभीर कारक बताया जिसने बच्चे को पूरी तरह से बेबस बना दिया। अदालत ने कहा कि इस हमले ने न केवल बच्चे की शारीरिक पवित्रता को नष्ट किया बल्कि “हमारे समाज में बड़ों के प्रति जो सम्मान की भावना है, उसे भी कलंकित किया है।”
कोर्ट ने कहा कि इस तरह की घटना से परिवारों और समुदायों के बीच विश्वास कमजोर हुआ है। पीड़िता उसे ‘दादा’ कहकर बुलाती थी लेकिन उसने अपनी हवस को मिटाने के लिए उसे अपना शिकार बनाया। यह हमला न केवल उस बच्ची पर हुआ है, बल्कि यह हमारे समाज में बड़ों के प्रति जो सम्मान है, उसे भी अपवित्र करता है। यह उस नींव को ही कमजोर कर देता है, जिस पर परिवार और समुदाय टिके होते हैं। यह हमारे इस विचार को भी तोड़ देता है कि बड़े-बुज़ुर्ग बच्चों की रक्षा करते हैं।
कोर्ट ने कहा कि निर्भया रेप केस, कठुआ रेप और मर्डर केस जैसे कुछ रेप केस मीडिया में सुर्खियों में आए, जिससे समाज में हंगामा हुआ। इन मामलों के बाद मौजूदा कानून में कुछ बदलाव किए गए। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के बताए सिद्धांतों को नजरअंदाज करके कोर्ट को समाज की भावनाओं में नहीं बहना चाहिए। इसलिए, इस कोर्ट ने दोषी को सजा इस आधार पर सुनाई है कि यह न्याय के हित में है और अपराध के लिए सजा मिलनी चाहिए। ऐसी सजा अपराध की गंभीरता के हिसाब से होनी चाहिए क्योंकि ज्यादा सजा न तो न्याय के हित में है और न ही समाज के हित में।
अदालत ने आरोपी को POCSO की धारा 6 के तहत दोषी पाया। यह धारा गंभीर प्रकृति के यौन हमले से संबंधित है। इसके साथ ही अदालत ने उसे भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों के तहत भी दोषी ठहराया। मामले में बचाव पक्ष के सभी दलीलों को नकार दिया गया। मामले को बेहद गंभीर बनाने वाले फैक्टर्स को देखने के बाद कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि दोषी को 20 साल की कड़ी कैद की सजा सुनाई जाए। कोर्ट ने 50 हजार का जुर्माना भी लगाया है।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि सजा सुनाते समय जुर्म और सजा के बीच बैलेंस बनाना चाहिए। इस मामले में जुर्म की क्रूरता और हालात को देखते हुए कानूनी तौर पर कम से कम सजा ही सही थी। साथ ही अदालत ने पीड़ित को लागू पीड़ित मुआवजा योजनाओं के तहत 13.5 लाख रुपये का मुआवजा दिया। यह मानते हुए कि कोई भी रकम उस सदमे को मिटा नहीं सकती या खोए हुए बचपन को वापस नहीं ला सकती, अदालत ने कहा कि मुआवजा ‘रिस्टोरेटिव जस्टिस’ का एक जरूरी हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि बलात्कार सिर्फ किसी एक व्यक्ति के खिलाफ अपराध नहीं है, बल्कि पूरे समाज के खिलाफ एक अपराध है। खास तौर पर तब जब पीड़ित कोई बच्चा हो। फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि ऐसे अपराध, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिली गरिमा के साथ जीने और शोषण से मुक्त रहने के मौलिक अधिकार को कमजोर करते हैं।
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किसी भी आपराधिक वारदात में पीड़ित को न्यायपालिका पर भरोसा होता है कि उसे न्याय जरूर मिलेगा। मगर इंसाफ तभी मिल पाता है, जब मामले की गंभीरता के मद्देनजर जांच-पड़ताल की जाए और अदालत में पुख्ता साक्ष्य प्रस्तुत किए जाएं। यह काम जांच एजंसियों का होता है, लेकिन कई बार ऐसा देखा गया है कि पुलिस या अन्य जांच एजंसियों के अधिकारी संगीन मामलों को भी गंभीरता से नहीं लेते हैं और हल्की धाराओं के तहत मामला दर्ज करते हैं। इसके पीछे या तो जांच अधिकारियों की लापरवाही होती है या फिर किसी बाहरी दबाव की वजह से मामले को कमजोर करने की मंशा छिपी होती है। पूरी खबर पढ़ें…
