सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी है, क्योंकि मुकदमे की कार्यवाही में 35 साल की देरी हो चुकी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह केवल देरी के आधार पर ही अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही रद्द करने के लिए इच्छुक है। साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा कि आदेश पारित करने से पहले वह राज्य के अधिकारियों की भी बात सुनेगा।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस जेबी परदीवाला और विजय बिश्नोई की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करने वाले इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली पुलिस अधिकारी की याचिका पर नोटिस जारी किया।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, “इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, और विशेष रूप से लगभग 35 वर्षों के बीत जाने को ध्यान में रखते हुए, हम केवल इसी आधार पर कार्यवाही को रद्द करने के इच्छुक हैं। हालांकि, कोई भी आदेश पारित करने से पहले हम राज्य की बात सुनना चाहेंगे।”
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारी के खिलाफ मामला 1989 में इलाहाबाद के रामबाग पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था। उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 147 (दंगा करने का दंड), 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाने का दंड) और 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) तथा रेलवे अधिनियम की धारा 120 के तहत दंडनीय अपराधों के लिए मुकदमा चल रहा है।
प्रयागराज की एक अदालत में यह मुकदमा 1991 से लंबित है। इस मामले में कुल पांच आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किए गए थे, जिनमें से दो की मृत्यु हो चुकी है और दो को अभियोजन पक्ष द्वारा मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहने के कारण बरी कर दिया गया था।
याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री का अवलोकन करने और मामले के तथ्यों पर विचार करने से यह नहीं कहा जा सकता कि इस स्तर पर आवेदक के विरुद्ध कोई अपराध नहीं बनता है। अदालत में दिए गए सभी तर्क विवादित तथ्यों से संबंधित हैं, जिन पर धारा 482 सीआरपीसी के तहत इस न्यायालय द्वारा निर्णय नहीं किया जा सकता है। हस्तक्षेप का कोई मामला नहीं बनता है। उपरोक्त मामले की संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की प्रार्थना अस्वीकार की जाती है। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उत्तराखंड राज्य को पक्षकार बनाते हुए शीर्ष न्यायालय ने मामले की सुनवाई 29 अप्रैल तक के लिए स्थगित कर दी।
दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली पुलिस को चेतावनी दी है। हाई कोर्ट ने कहा कि वह पिछले महीने पुलिस द्वारा छात्रों और कार्यकर्ताओं की कथित अवैध हिरासत और यातना के मामले में सीबीआई जांच का आदेश देगा। पढ़ें पूरी खबर।
