सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने शीर्ष अदालत में भ्रष्ट जजों को लेकर गंभीर टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत में कई ऐसे जज रहे हैं जिनके आचरण से न्याय व्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचा है। दवे ने कहा कि न्याय व्यवस्था धीरे-धीरे पैसे वालों और ताकतवर लोगों के पक्ष में झुकती जा रही है और एक ऐसे कार्यपालिका तंत्र का समर्थन कर रही, जो लगातार शक्तिशाली होता जा रहा है।
दुष्यंत दवे ने कहा कि क्या हम संविधान को विफल कर रहे हैं या संविधान हमें विफल कर चुका है। दवे ने कहा कि न्यायपालिका में कुछ बेहद शानदार जज भी रहे हैं, लेकिन कई जजों के आचरण ने न्याय को काफी नुकसान पहुंचाया है।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, दवे ने कहा, “मैं 48 साल से न्यायपालिका में वकील के तौर पर रहा। उसके आधार मैं कह सकता हूं कि न्यायापालिका में कुछ बेहतरीन जज रहे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इतने भ्रष्ट जज भी रहे हैं कि अब मैंने उनकी गिनती करना भी छोड़ दिया है। दवे ने आगे कहा कि ऐसे जजों के कारण न्याय को बहुत नुकसान हुआ है, जबकि न्याय हर इंसान की बुनियादी जरूरत है।
दुष्यंत दवे ने आरोप लगाया कि न्याय व्यवस्था अमीर और ताकतवर लोगों के पक्ष में झुकती जा रही है। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था उनके प्रभाव में आ गई है। अमीर और ताकतवर लोगों ने न्यायिक व्यवस्था पर कब्जा कर लिया है। उनके मामलों की सुनवाई तेजी से होती है। दवे ने कहा कि बड़े औद्योगिक घरानों को अक्सर अदालतों से उनके पक्ष में फैसले मिल जाते हैं।
उन्होंने कहा कि उनके मामले लगभग हमेशा सफल होते हैं। आप अखबार या बिजनेस अखबार खोलिए, आपको हर दूसरे या तीसरे दिन किसी बड़े औद्योगिक घराने के पक्ष में आया कोई फैसला दिख जाएगा। यह हैरान करने वाला है कि वे हर मामले में कैसे सफल हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें कभी हार का सामना नहीं करना पड़ता, लेकिन यही स्थिति बन गई है।
दवे ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संबंधों को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था ऐसी कार्यपालिका का समर्थन करती दिखाई दे रही है, जो लगातार अधिक शक्तिशाली होती जा रही है। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की अपनी भूमिका पर्याप्त रूप से नहीं निभा रहा है।
वरिष्ठ वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि कार्यपालिका की ज्यादतियों को केवल इंदिरा गांधी सरकार के दौरान लगे आपातकाल तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए।
दवे ने कहा कि ऐसा नहीं है कि आपातकाल के दौरान केवल इंदिरा गांधी ही ज्यादतियों के लिए जिम्मेदार थीं। पिछले 12 वर्षों में देश में जो कुछ हो रहा है, वह भी चिंता का विषय है। हालात धीरे-धीरे नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं। मौलिक अधिकार बेहद जरूरी हैं और अनुच्छेद 32 के तहत इन अधिकारों को लागू कराना सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी है। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट खुद देखता है कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, तब भी वह हस्तक्षेप करने को तैयार नहीं है। दवे ने SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट के रुख की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के रुख से वयस्क मताधिकार के अधिकार पर खतरा पैदा हो रहा है।
दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि का भी जिक्र किया। उन्होंने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की आलोचना करते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किए गए जजों में एक भी महिला नहीं थी।
दवे ने कहा कि जस्टिस चंद्रचूड़ खुद को एक महान और उदार जज बताते थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में 17 जज नियुक्त किए, लेकिन उनमें एक भी महिला नहीं थी। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में समाज के अलग-अलग वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना जरूरी है, ताकि जज उन सामाजिक परिस्थितियों को समझ सकें, जिनमें विवाद पैदा होते हैं।
दवे ने कहा कि देश में ज्यादातर जज ऊंची जातियों से आते हैं और उनमें से ज्यादातर कानूनी पेशे से जुड़े परिवारों से होते हैं। जब तक समाज के अलग-अलग वर्गों से जज नियुक्त नहीं किए जाएंगे, तब तक वे न्याय देने के लिए जरूरी संवेदनशीलता को नहीं समझ पाएंगे। उन्होंने कहा कि न्याय देना केवल किसी मामले में फैसला सुनाना नहीं है, बल्कि यह समझना भी है कि समाज की समस्याएं क्या हैं और उनका ऐसा समाधान कैसे निकाला जाए जो कानूनी होने के साथ-साथ निष्पक्ष और न्यायपूर्ण भी हो। इसके लिए ऐसे जज जरूरी हैं जो समाज के हर वर्ग की समस्याओं को समझ सकें।
दवे ने आगे कहा कि मीडिया और न्यायपालिका, दोनों ही नागरिकों की रक्षा करने में नाकाम रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारी आवाज की कोई अहमियत नहीं रह गई है, क्योंकि जिन दो संस्थाओं को हमारी रक्षा करनी चाहिए-मीडिया और न्यायपालिका दोनों ने हमें बुरी तरह निराश किया है। दवे ने यह बातें एक कार्यक्रम के दौरान कहीं।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक खबर पर गंभीर चिंता जताई है, जिसमें बताया गया था कि जुलूस में बज रहे तेज लाउडस्पीकर के शोर के कारण सात साल के एक स्कूली बच्चे की मौत हो गई। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जय कुमार पिल्लई की डिवीजन बेंच ने कहा कि अदालत के जजों ने भी काम से घर लौटते समय कई जगहों पर ध्वनि प्रदूषण के नियमों का खुलेआम उल्लंघन होते देखा। पढ़ें पूरी खबर।
