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खेलने की चाहत, खौफ भी

सबसे अहम सवाल यह है कि कोई खिलाड़ी कोविड-19 का शिकार होकर उससे उबर भी जाता है तो बाद में इसका असर कैसा होगा, कोई बताने की स्थिति में नहीं है। टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली ने भी इस महामारी की वजह से पांच महीने ट्रेनिंग नहीं की। जब ट्रेनिंग शुरू की तो उन्होंने साफ कहा कि वे डरे हुए थे।

कोविड-19 लिएंडर पेस जैसे कई खिलाड़ियों के सपने पर चोट कर सकता है।

टूर्नामेंट कैसा भी हो, हर बड़े खिलाड़ी का फोकस रहता है अच्छा प्रदर्शन करना। अच्छा प्रदर्शन उसकी ट्रेनिंग, शारीरिक और मानसिक फिटनेस पर निर्भर करता है। इसके लिए परिस्थितियां भी अनुकूल होनी चाहिए। अनुकूल नहीं होंगी तो इसका दबाव खिलाड़ी पर पड़ेगा। आजकल के माहौल में यह दबाव तनाव में बदल रहा है। दुनिया भर में फैली कोरोना महामारी ने खिलाड़ी की हताशा को बढ़ाया है। खिलाड़ी पशोपेश में हैं, क्या करें और क्या न करें। प्रमुख अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं टल रही हैं। जो हो रही हैं उसमें भी खिलाड़ी जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

टीम गेम सबसे बड़ी समस्या है। फुटबॉल हो या हॉकी, रग्बी हो या बास्केटबाल, आपस में दूरी बनाए रखना खिलाड़ियों के लिए चुनौती है। क्रिकेट टीम में खिलाड़ी ग्यारह खेलते हैं। गेंद हो या बल्ला, खिलाड़ी अपने हुनर से रंग जमा सकता है। लेकिन जब बात क्षेत्ररक्षण की आती है तो गेंद का संपर्क कई खिलाड़ियों से होता है। खिलाड़ी अपने को बचाए रखकर खेल सकता है पर संकट कब और कैसे आ जाए, इसका पता नहीं चलता।

कोविड-19 के अपने देश में बढ़ते ग्राफ को देखते हुए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इस बार आइपीएल को संयुक्त अरब अमीरात में करवाने का फैसला किया है। फैसला सही है या गलत, अलग राय हो सकती है। चिंता की बात यह है कि खिलाड़ियों का कोरोना पॉजीटिव आना शुरू हो गया। चूंकि फ्रेंचाइजी टीमों ने वहां डेरा जमाना शुरू कर दिया है, इसलिए यह टीमों के लिए परेशानी बढ़ाने वाली खबर है। चेन्नई सुपरकिंग्स के 13 सदस्यों का पॉजीटिव पाया जाना खतरे की घंटी है। इनमें दीपक चाहर और ऋतुराज गायकवाड़ जैसे उपयोगी खिलाड़ी हैं।

सुरेश रैना का भी अपनी टीम चेन्नई सुपरकिंग्स को छोड़कर स्वदेश लौट आना शुभ संकेत नहीं है। इसके पीछे कई कहानियां चल रही हैं। इनमें एक यह भी है कि वे कोविड-19 के डर से लौटे हैं। सुपरकिंग्स के खिलाड़ी हरभजन सिंह अभी टीम के साथ नहीं जुड़े हैं। जो परिस्थितियां बनी हैं, उसका डर उन्हें भी सता रहा है। निश्चित ही इस घटना से दूसरी टीमों में भी डर जरूर पैदा हुआ होगा।

स्थिति अजीब है। कोविड-19 के कारण क्रिकेट आस्ट्रेलिया ने इस वर्ष अपने यहां होने वाले टी-20 क्रिकेट विश्व कप को अगले साल तक टाल दिया है। इस टूर्नामेंट को टाला तो इसलिए गया होगा कि खिलाड़ियों को किसी तरह का नुकसान नहीं हो। लेकिन क्रिकेट जगत के तमाम दिग्गज खिलाड़ियों में से किसी एक ने भी नहीं कहा कि हम इस स्थिति में खेलने को तैयार हैं। लेकिन अपनी-अपनी टीमों के यही तोप खिलाड़ी इंडियन प्रीमियर लीग में खेलने के लिए पहुंचेंगे। इसका मतलब यह हुआ कि कोरोना की वजह से टी-20 विश्व कप को टालना नौटंकी है। सुरक्षा से बड़ा पैसा है। फिर वेस्ट इंडीज, पाकिस्तान और आस्ट्रेलिया की टीमें इंग्लैंड में खेल रही हैं। जब ये टीमें वहां खेलने जा सकती हैं तो बाकी टीमों के साथ आस्ट्रेलिया अपने यहां विश्व कप क्यों नहीं करवा सकता। लगता है पैसे की ताकत के आगे आइसीसी भी झुक गया है और आइपीएल के लिए जगह बनाने की खातिर विश्व कप को भी किनारे लगा दिया गया।

सबसे अहम सवाल यह है कि कोई खिलाड़ी कोविड-19 का शिकार होकर उससे उबर भी जाता है तो बाद में इसका असर कैसा होगा, कोई बताने की स्थिति में नहीं है। टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली ने भी इस महामारी की वजह से पांच महीने ट्रेनिंग नहीं की। जब ट्रेनिंग शुरू की तो उन्होंने साफ कहा कि वे डरे हुए थे।

खिलाड़ी हर तरह के हैं। टेनिस के कई महारथी कोविड-19 की वजह से अमेरिकी ओपन जैसी महत्त्वपूर्ण ग्रैंडस्लैम प्रतियोगिता में नहीं जा रहे। उन्होंने अपने दिल की आवाज सुनी है। खिताब तो बाद में भी जीता जा सकता है फिर जीवन को खतरे में क्यों डाला जाए। पुरुष वर्ग में चैंपियन स्पेन के राफेल नडाल और महिला वर्ग की विजेता कनाडा की बियांका एद्रेंस्कु दोनों ही खिताब का बचाव नहीं करेंगे। महिला वर्ग में तो टाप आठ में से छह खिलाड़ियों ने यूएस ओपन से दूर रहने का फैसला किया है। विश्व नंबर वन आस्ट्रेलिया की ऐश्ले बार्टी और नंबर दो रोमानिया की सिमोना भी इनमें हैं। रोजर फेडरर चोटिल होने के कारण शिरकत नहीं कर रहे हैं।

कोविड-19 लिएंडर पेस जैसे कई खिलाड़ियों के सपने पर चोट कर सकता है। तोक्यो ओलंपिक अगले साल तक टल गए हैं। पेस इसमें खेलकर रेकार्ड के साथ ओलंपिक विदाई चाहते थे। इस साल उन्होंने टेनिस को अलविदा कहने की घोषणा कर रखी है। देखना यह है कि वह अपनी घोषणा पर कायम रहते हैं या फैसला बदलकर अपने करिअर को अगले साल ओलंपिक तक बढ़ाते हैं। इससे नुकसान में तो खिलाड़ी है।

 

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