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बदलाव: अब फुटबॉल में भी आई तकनीक

फुटबॉल इतिहास में ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे जब रेफरी की चूक एक टीम को भारी पड़ गई और दूसरी को फायदा हो गया। सबसे चर्चित उदाहरण है 1986 के मैक्सिको विश्व कप का क्वार्टर फाइनल मुकाबला।

Author March 8, 2018 05:56 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

पहले ‘खेल भावना’, फिर ‘फेयरप्ले’ और अब फोकस ‘सही फैसले’ पर आ गया है। समय की मांग के साथ अब दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल फुटबॉल भी टेक्नालॉजी से जुड़ने जा रहा है। क्रिकेट, टेनिस और बैडमिंटन जैसे खेलों में पहले से ही तकनीकी का इस्तेमाल हो रहा है। इस साल जून में रूस में होने वाले फुटबॉल विश्व कप में इस क्रांतिकारी कदम का असर दिखेगा। ‘वीडियो असिस्टेंट रेफरी’ टेक्नालॉजी खेल को और विश्वसनीयता प्रदान करेगी। मैदान पर दम मारने वाली टीमें संचालन गलतियों का शिकार न बनें, इसी के मद्देनजर अब फुटबॉल नियम बनाने वाले बोर्ड ने इसे अपनाया है। इंटरनेशनल फुटबॉल एसोसिएशन बोर्ड ने भी ज्यूरिख में हुई अपनी बैठक पर इस पर मुहर लगा दी है। अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल महासंघ के अध्यक्ष गियानी इंफेंटिनो पहले से ही इसे लागू करने के पक्षधर रहे हैं। इस बाबत अंतिम फैसला इसी माह फीफा काउंसिल की बैठक में हो जाएगा। महज इसकी औपचारिकता पूरी होनी है। कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकला है कि इस नियम से खेल को फायदा होगा।

वीडियो असिस्टेंट रेफरी तकनीक पहले से ही यूरोप की चोटी की लीग में लागू हो चुकी है। इनमें जर्मनी की बुंदेसलीगा और इटली की सीरी ए लीग शामिल है। दूसरी कई लीगों में भी इसको परखा जा चुका है। स्पेनिश लीग ला लीगा में भी इसे अगले सीज़न से लागू किए जाने की उम्मीद है। मैदान पर ‘वार’ का इस्तेमाल केवल चार स्थितियों में ही किया जाएगा। गोल, पेनल्टी फैसले, सीधा लाल कार्ड दिखाने और गलत पहचान पर ही इस तकनीक को उपयोग में लाया जाएगा। मैदान पर कई बार रेफरी द्वारा लाल कार्ड लहराने से खिलाड़ी और टीम पर असर पड़ा है। कई बार कार्ड उस खिलाड़ी को मिल जाता है, जिसका दोष ही नहीं होता। ऐसे में यह खिलाड़ियों के लिए राहत की बात होगी। लेकिन ‘वार’ के इस्तेमाल को लेकर अभी मतभेद बने हुए हैं। खिलाड़ी और टीम मैनेजरों की शिकायत है कि टेक्नालॉजी का इस्तेमाल करने में रेफरी जल्दबाजी दिखा रहे हैं। स्टेडियम में मौजूद दर्शक भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि खेल रुकने की वजह क्या है? यूरोपीय फुटबॉल संघ के अध्यक्ष अलेक्सांद्र सेफेरिन का कहना है कि गफलत को लेकर आगामी चैंपियंस लीग में इसे लागू नहीं किया जाएगा।

कुछ यह भी तर्क दे रहे हैं कि वीडियो असिस्टेंट रेफरी प्रणाली से खेल धीमा पड़ जाएगा। खेल रुकने से खिलाड़ियों और टीमों की लय टूटेगी। पुन: खेल शुरू होने पर टीम और खिलाड़ियों को नए सिरे से लय बनानी होगी। कुछ इस बात से भी नाखुश हैं कि ‘वार’ को सीधे विश्व कप में प्रहयोग में लाया जा रहा है। फुटबॉल तेज तर्रार खेल है। पलक झपकते गेंद मैदान से एक छोर से दूसरे छोर का सफर तय करती है। रेफरी को इसी तेजी से सामंजस्य बैठाते हुए गेंद के करीब रहना पड़ता है। साइडलाइन पर मदद से लिए दो लाइंसमैन मौजूद रहते हैं। पर फिर भी मैदान के अंदर पैसले लेते समय कई बार रेफरी से चूक हो जाती है। विश्व कप जैसे मंच पर तो संघर्ष इतना पैना रहता है कि रेफरी की एक चूक खेल के परिणाम पर असर डाल देती है। इसलिए 2018 विश्व कप में वीडियो असिस्टेंट रेफरी टेक्नालॉजी की मदद लेना स्वागत योग्य कदम है।

फुटबॉल इतिहास में ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे जब रेफरी की चूक एक टीम को भारी पड़ गई और दूसरी को फायदा हो गया। सबसे चर्चित उदाहरण है 1986 के मैक्सिको विश्व कप का क्वार्टर फाइनल मुकाबला। इंग्लैंड के खिलाफ अर्जेंटीना के स्टार खिलाड़ी डाइगो माराडोना ने सिर से गोल बनाने के लिए ‘हाथ’ का इतना सफाई से इस्तेमाल किया कि रेफरी भी पकड़ नहीं पाया। बाद में यह गोल ‘हैंड ऑफ गॉड’ के नाम से मशहूर हुआ और इंग्लैंड को विश्व कप से बाहर होना पड़ा। पिछले साल जब भारत में अंडर-17 फुटबॉल विश्व कप का आयोजन हुआ था तो तकनीक के अभाव में रेफरी और लाइंसमैन की चूक माली को भारी पड़ गई। गोल पर निशाना लगा, गेंद ह्यबारह्ण को टकराई, गोल रेखा के अंदर पड़े टिप्पे के बाद गेंद बाहर निकल आई और गोल की अपील नकार दी गई थी। खैर, टेक्नालॉजी लागू होने से खिलाड़ियों और टीम के पास अपील करने का विकल्प रहेगा जिससे सही तस्वीर सामने आएगी। खेल की लय पर असर जरूर पड़ेगा लेकिन अहम यह है कि आप गलतियों का शिकार नहीं बनेंगे।

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