अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में तीन प्रारूप हैं और मुख्यत: 2 गेंदों का इस्तेमाल होता है। टेस्ट क्रिकेट में लाल गेंद का इस्तेमाल होता है। वनडे और टी20 सफेद गेंद से खेले जाते हैं। पिंक बॉल से भी क्रिकेट खेला जाता है, लेकिन डे-नाइट टेस्ट कम होने के कारण इसका इस्तेमाल सीमित है। एक वक्त था जब क्रिकेट केवल लाल गेंद से खेला जाता था। खिलाड़ी सफेद कपड़े पहनते थे और लाल गेंद से खेल होता था। यह तब का समय था जब क्रिकेट केवल दिन में होता था।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सफेद गेंद का इस्तेमाल पहली बार 1992 में हुआ था। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की मेजबानी में खेले गए 1992 वर्ल्ड कप में क्रिकेट में बहुत बदलाव हुए। पहली बार खिलाड़ी रंगीन कपड़ों में दिखे। उनकी पीठ पर नाम लिखा जाने लगा। फ्लडलाइट्स में मैच कराए गए। रंगीन कपड़ों और फ्लडलाइट्स में लाल गेंद को देखने में दिक्कत होती। इसके कारण मैच में दो सफेद गेंदों के इस्तेमाल करने का फैसला लिया गया। हालांकि, क्रिकेट में सफेद गेंद का इस्तेमाल 1977 में ही हो गया था।
हॉकी से सफेद बॉल का कनेक्शन
ऑस्ट्रेलियाई मीडिया कारोबारी कैरी पेकर की 1977 में वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट (WSC) ने कूकाबुरा से एक ऐसी बॉल बनाने को कहा जो लाइट में दिखे। कूकाबुरा को दूसरे खेल में सफेद गेंद के इस्तेमाल का अनुभव था। 1956 के ओलंपिक मेलबर्न में होने थे। हॉकी में कूकाबुरा बॉल इस्तेमाल की गई थीं और क्रिकेट की लाल गेंद को ही सफेद रंग से रंग दिया गया था।
नारंगी, पीली और सफेद गेंद का ट्रायल
वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट से जुड़े ऑस्टिन रॉबर्टसन और रिची बेनो ने कूकाबुरा के ब्रूस थॉम्पसन के साथ मिलकर गेंदों के ट्रायल किए, जो दो साल तक चला। इस दौरान नारंगी, पीली और सफेद गेंद का ट्रायल हुआ। लाइट में सफेद गेंद सबसे ज्यादा साफ दिखी। दिलचस्प यह है कि डब्ल्यूएससी का विरोध करने वाले ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट बोर्ड (ACB) से कूकाबुरा को दिक्कत नहीं झेलनी पड़ी।
1992 में सफेद गेंदों का इस्तेमाल पहली बार वर्ल्ड कप में किया गया
इसका कारण शायद यह था कि गेंद कोई और बनाने वाला नहीं था। डब्ल्यूएससी के बाद ऑस्ट्रेलिया में वनडे रंगीन कपड़ों और सफेद गेंद वाले मैच होने लगे और कूकाबुरा की पहुंच न्यूजीलैंड तक हो गई। साल 1992 में कूकाबुरा की सफेद गेंदों का इस्तेमाल पहली बार वर्ल्ड कप में किया गया था। सफेद बॉल के क्रिकेट में आज भी केवल कूकाबुरा की गेंद का इस्तेमाल होता है।
1999 वर्ल्ड कप में ड्यूक व्हाइट बॉल का इस्तेमाल हुआ
ड्यूक रेड बॉल का इस्तेमाल 1760 से हो रहा है। इनका इस्तेमाल इंग्लैंड में हुए पहले तीन वर्ल्ड कप और 1987 में भारत और पाकिस्तान में हुए चौथे वर्ल्ड कप में किया गया था। ड्यूक ने भी व्हाइट-बॉल मार्केट में अपनी जगह बनाने की कोशिश की। इंग्लैंड में 1999 का वर्ल्ड कप पहला और अब तक का इकलौता वर्ल्ड कप था, जिसमें ड्यूक की बनाई हुई व्हाइट बॉल का इस्तेमाल हुआ था।
कूकाबुरा की गेंद क्यों होती है इस्तेमाल
भारत में सैंसपैरिल्स ग्रीनलैंड्स (SG) ने 1951 में क्रिकेट की गेंद बनानी शुरू की। एसजी 1991 में अपनी टेस्ट गेंद लाया। 1990 के दशक के बीच तक एसजी व्हाइट बॉल भी बनाने लगा। आईसीसी ने अपनी वर्ल्ड कप प्लेइंग कंडीशन में लिखा है कि मुकाबलों में सफेद कूकाबुरा टर्फ क्रिकेट बॉल ही इस्तेमाल की जाएंगी।
दुनिया भर में कूकाबुरा की गेंद
इसका मतलब है कि आईसीसी की आधिकारिक गेंद सफेद कूकाबुरा टर्फ है। इसी के कारण सफेद कूकाबुरा का इस्तेमाल पूरी दुनिया में द्विपक्षीय वनडे सीरीज के दौरान भी किया जाता है। इसका इस्तेमाल दुनिया भर में टी20 लीग सहित घरेलू क्रिकेट में भी किया जाता है।
2000 तक हुआ लाल गेंद का इस्तेमाल
साल 1992 में सफेद गेंद के इस्तेमाल के साथ ऐसा नहीं था कि वनडे में लाल गेंद का इस्तेमाल खत्म हो गया। वनडे में लाल गेंद और सफेद कपड़े का इस्तेमाल 2000 के दशक के शुरुआत में भी हुआ था। दिन में खेले जाने वाले वनडे में इसका इस्तेमाल होता था।
लाल गेंद से आखिरी मैच
14 दिसंबर 2000 को आखिरी बार लाल गेंद और सफेद पोशाक में वनडे मैच खेला गया था। वह राजकोट में भारत और जिम्बाब्वे के बीच सीरीज का 5वां मुकाबला था। उसमें भारत 39 रन से जीता। अजीत अगरकर ने इसी मैच में 21 गेंद पर बौतर भारतीय बल्लेबाज सबसे तेज अर्धशतक जड़ने का रिकॉर्ड अपने नाम किया था। इसके बाद से दिन में भी सफेद गेंद का इस्तेमाल होने लगा।
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