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आंकलनः आखिर भारत क्यों बना रहे राष्ट्रमंडल खेलों का हिस्सा?

नई सहस्त्राब्दी में उन सवालों को यह दलील देकर अनसुना कर दिया गया कि राष्ट्रमंडल खेलों का महत्व भले ही कम हो लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षाकृत बेहतर सफलता पाने का भारतीय खिलाड़ियों के लिए यही आदर्श मंच है। एक तरह से सही भी है। उसके अलावा दक्षिण एशियाई खेलों में ही नेपाल, मालदीव, भूटान, पाकिस्तान, बंग्लादेश आदि के सामने थैलियां भर पदक बटोर लाने में ही भारतीय खिलाड़ी सक्षम रहे हैं।

Author Updated: August 22, 2019 1:53 AM
आजाद होने के बाद भी देश राष्ट्रमंडल का हिस्सा बनें क्योंकि इससे ब्रिटेन से मिलने वाली आर्थिक मदद और कारोबार की सुविधा की उन्हें जरूरत थी। लेकिन कुछ साल में स्थिति काफी तेजी से बदली है। राष्ट्रमंडल का कोई महत्त्व नहीं रह गया है। फिर भी अतीत की एक औपचारिकता निभाने के नाते राष्ट्रमंडल खेल हो रहे हैं। 1974 तक इन खेलों से ब्रिटिश जुड़ा रहा।

श्रीशचंद्र मिश्र
फिलहाल ऐसी संभावना बन रही है कि भारत 2022 में बर्मिंघम (इंग्लैंड) में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा न ले। दरअसल, आयोजकों ने निशानेबाजी को इससे बाहर रखने का फैसला किया है जिसके विरोध में भारतीय ओलंपिक संघ ने खेलों का बहिष्कार करने मन बना लिया है। राष्ट्रमंडल खेल होने में अभी तीन साल हैं। स्थितियां बदल भी सकती हैं। इस बीच प्रमुख खिलाड़ियों और खेल प्रशासकों के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि भारत को राष्ट्रमंडल खेलों का बहिष्कार करना चाहिए या नहीं? बहिष्कार करने की सूरत में भारत को राष्ट्रमंडल खेलों की बिरादरी से निकाले जाने का खतरा भी खड़ा हो सकता है। सवाल यह है कि अगर ऐसा हुआ तो क्या भारतीय खेलों का नुकसान होगा। राष्ट्रमंडल खेल ही एकमात्र ऐसा मंच है जहां भारतीय खिलाड़ियों को ठीक-ठाक पदक मिलते रहे हैं। यह अलग बात है कि राष्ट्रमंडल खेलों में मिली सफलता की कलई एशियाई या ओलंपिक खेलों में खुल जाती है। ऐसे में क्या यह बेहतर नहीं होगा कि राष्ट्रमंडल खेलों की सफलता से मोहित होने की बजाए खिलाड़ी एशियाई व ओलंपिक खेलों में कुछ कर दिखाने की कोशिश करें।

इससे ज्यादा गंभीर मुद्दा यह है कि गुलामी की याद दिलाने वाले राष्ट्रमंडल खेलों का भारत हिस्सा क्यों बना रहे? ब्रिटिश उपनिवेश रहे देशों का यह खेल आयोजन अंग्रेजों का आधिपत्य जताने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। 1930 से 1950 तक इन खेलों को ब्रिटिश एंपायर गेम्स के नाम से जाना जाता था। ब्रिटिश साम्राज्य का दायरा जब सिकुड़ने लगा तो इन खेलों का नाम ब्रिटिश एंपायर एंड कामनवेल्थ गेम्स हो गया। यह सिलसिला 1966 तक चला। ब्रिटिश गुलामी से मुक्त हुए देशों का राष्ट्रमंडल बना। आजाद होने के बाद भी देश राष्ट्रमंडल का हिस्सा बनें क्योंकि इससे ब्रिटेन से मिलने वाली आर्थिक मदद और कारोबार की सुविधा की उन्हें जरूरत थी। लेकिन कुछ साल में स्थिति काफी तेजी से बदली है। राष्ट्रमंडल का कोई महत्त्व नहीं रह गया है। फिर भी अतीत की एक औपचारिकता निभाने के नाते राष्ट्रमंडल खेल हो रहे हैं। 1974 तक इन खेलों से ब्रिटिश जुड़ा रहा। 1978 में पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों के नाम से यह आयोजन हुआ। आज भी इन खेलों का उद्घाटन इंग्लैंड की महारानी या उनकी अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधि करता है।

भारत ने 1930 के हेमिल्टन (कनाडा) में हुए पहले राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा नहीं लिया था। 1934 में उसे सिर्फ एक कांस्य पदक मिला। 1938 में फिर भारत अनुपस्थित रहा। 1942 व 1946 में विश्व युद्ध ने आयोजन रोका। 1950 व 1954 के खेलों का भारत हिस्सा नहीं बना। राष्ट्रमंडल व्यवस्था से मिलने वाली सुविधाओं का लालच 1958 में उसे खेलों में ले आया। तब से लेकर 1962 व 1986 के अलावा भारत ने हर राष्ट्रमंडल खेल में हिस्सा लिया है। 1982 तक कुल पदकों की संख्या बीस तक पहुंचा पाने में भी भारतीय खिलाड़ी नाकाम रहे। 1958 में दो स्वर्ण व एक रजत पदक, 1966 में तीन स्वर्ण, चार रजत व तीन कांस्य पदक, 1970 में पांच स्वर्ण, तीन रजत व चार कांस्य पदक, 1974 में चार स्वर्ण, आठ रजत व तीन कांस्य पदक, 1978 में पांच स्वर्ण चार रजत व छह कांस्य पदक और 1982 में पांच स्वर्ण, आठ रजत व तीन कांस्य पदक भारत के हिस्से में आए। 1990 में 13 स्वर्ण, आठ रजत व 11 कांस्य पदकों के साथ भारतीय खिलाड़ियों ने कुल 32 पदक जुटाए। 1994 में कुल पदक 24 रहे गए और 1998 में 25 ही हो पाए। ऐसे में राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के हिस्सा लेने के औचित्य पर कई बार सवाल उठे।

नई सहस्त्राब्दी में उन सवालों को यह दलील देकर अनसुना कर दिया गया कि राष्ट्रमंडल खेलों का महत्व भले ही कम हो लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षाकृत बेहतर सफलता पाने का भारतीय खिलाड़ियों के लिए यही आदर्श मंच है। एक तरह से सही भी है। उसके अलावा दक्षिण एशियाई खेलों में ही नेपाल, मालदीव, भूटान, पाकिस्तान, बंग्लादेश आदि के सामने थैलियां भर पदक बटोर लाने में ही भारतीय खिलाड़ी सक्षम रहे हैं। ओलंपिक खेलों में रो पीटकर नाम मात्र की सफलता मिलती है। एशियाई खेलों में 1951 की सफलता दोहराने में ही खिलाड़ियों के पसीने छूटते रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रमंडल खेल ही रह जाता है जिसमें चौथे-पांचवें पायदान की सफलता पा कर ही गदगद हुआ जा सकता है। 2002 के मैनचेस्टर खेलों, 2006 के मेलबर्न खेलों और 2010 में नई दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में मिले पदक श्रेष्ठता का गुमान पाले रखने के लिए पर्याप्त रहे।

हालांकि यह सफलता भी गर्व करने लायक नहीं है। 2010 में भारत ने पहली बार सौ पदकों का आंकड़ा पार किया और सिर्फ एक बार पदक तालिका में दूसरा स्थान पाया। उसके अलावा इस सहस्त्राब्दी में भारत के लिए पांचवां या छठा स्थान ही पदक तालिका में सुरक्षित रहा है। 1914 में ग्लासगो में भी बारह खेलों में 215 खिलाड़ी कुल 64 पदकों के साथ पांचवा स्थान ही दिला सके। 2018 में गोल्ड कोस्ट (आस्ट्रेलिया) में हुए खेलों में 26 स्वर्ण पदक सहित कुल 66 पदकों के साथ भारत तीसरे स्थान पर रहा। तुलना की जाए तो राष्ट्रमंडल खेलों में अब तक अट्ठारह आयोजनों में भारत ने 181 स्वर्ण 173 रजत व 150 कांस्य पदक समेत कुल 504 पदक जीते हैं। इससे करीब दो गुने यानी 933 स्वर्ण पदक आस्ट्रेलिया के कब्जे में रहे। आस्ट्रेलिया के कुल पदक जोड़े जाएं तो उनकी संख्या बैठती है 2415 यानी भारत से करीब पांच गुना ज्यादा। यही स्थिति इंग्लैंड की भी है जिसके खाते में 2146 पदक जुड़ चुके हैं। ऐसे में भारतीय सफलता कहां ठहरती है। लेकिन जब कहीं और कुछ पाने की उम्मीद नहीं बंध पा रही है तो राष्ट्रमंडल खेलों का दामन पकड़े रहना मजबूरी ही है।

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