द्रोणाचार्यों पर विदेशी प्रशिक्षक क्यों भारी?

कुछ एक दिनों में द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित भारतीय खेल गुरुओं की संख्या बढ़ने वाली है।

ग्राहम रीड। फाइल फोटो।

राजेंद्र सजवान

कुछ एक दिनों में द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित भारतीय खेल गुरुओं की संख्या बढ़ने वाली है। पांच सात या अधिक नाम द्रोणाचार्य अवार्ड के लिए चुने जा सकते हैं, जिन्हें देश के राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित किया जाएगा। हालांकि 29 अगस्त को खेल अवार्ड दिए जाते हैं लेकिन इस बार तोक्यो ओलंपिक और तत्पश्चात पैरालंपिक के कारण तिथि को आगे बढाना पड़ा है।

यह धारणा बन रही है कि भारतीय खेल करवट बदल रहे हैं और हमारे खिलाड़ी दुनिया भर में अपनी जीत का डंका बजाने के लिए कमर कस चुके हैं। तोक्यो ओलंपिक खेलों के नतीजों ने भारतीय खिलाड़ियों के बारे में आम भारतीय की सोच को भी बदला है। इसके साथ ही विदेशी कोचों को लेकर भी सोच बदल रही है। कल तक तमाम भारतीय खेल प्रेमी विदेशी कोचों को बुरा भला कहते थे और खराब प्रदर्शन के लिए उन्हें दोष देते थे लेकिन अब यह माना जा रहा है कि विदेशी कोच भारतीय खेलों की नैय्या पार लगा सकते हैं।

हालांकि भारतीय कोच दो तीन दशकों से उपेक्षित हैं और उन्हें विदेशियों का सहायक भर माना जाता है लेकिन कुछ खेलों में आज भी हमारे अपने कोच बेहतर परिणाम दे रहे हैं। मसलन कुश्ती को ही लें। कुश्ती में भारत ने हाकी के बाद सबसे ज्यादा सात ओलंपिक पदक जीते हैं और ओलंपिक पदक जीतने वाले तमाम खिलाड़ी हमारे अपने अखाड़ों और अपने गुरु खलीफाओं की देन रहे हैं। फिर भी कुछ पहलवानों का भरोसा विदेशी प्रशिक्षकों पर बढ़ रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि विदेशी हमारे पहलवानों पर अपना रंग रोगन चढ़ाते हैं और बने बनाए पहलवानों को अपनी देन बताते हैं।

सिर्फ़ कुश्ती ही नहीं, तमाम भारतीय खेल विदेशी प्रशिक्षकों को अपनाने की मांग करने लगे हैं। खासकर, ओलंपिक स्वर्ण जीतने वाले नीरज चोपड़ा की कामयाबी के बाद से यह भ्रम पैदा किया जाने लगा है कि पदक जीतना है तो विदेशी प्रशिक्षकों से प्रशिक्षण लो। बेशक, विदेशियों के पास कुछ खास तो होगा। हो सकता है उनके पास कोई जादुई चिराग हो। लेकिन निशाने बाजों, मुक्केबाजों और अन्य के मामले में यह चिराग जल क्यों नहीं पाया?

बेशक, नीरज के खेल में सुधार का बड़ा श्रेय विदेशियों को जाता है। खुद नीरज भी यह स्वीकार कर चुके हैं और आगे भी उनसे ज्ञान लेते रहेंगे। लेकिन सबसे बड़ा चमत्कार हाकी टीमों के प्रदर्शन में देखने को मिला है। तोक्यो जैसा प्रदर्शन भारतीय पुरुष और महिला हाकी टीमों ने शायद वर्षों पहले किया था। पुरुष खिलाड़ी 41 साल बाद पदक जीतने में सफल रहे और इस प्रकार भारतीय हाकी और हाकी इंडिया की विदेशी कोचों पर आस्था बढ़ गई। महिला खिलाड़ियों ने भी गजब का प्रदर्शन किया और उनके चौथे स्थान को भी विदेशियों का कमाल बताया जा रहा है।

हाकी, एथलेटिक, मुक्केबाजी, निशानेबाजी आदि खेल संघों ने विदेशी को प्राथमिकता देने का मन बना लिया है। हैरानी वाली बात यह है कि ओलंपिक में फ्लाप साबित हुए खेल भी अपने प्रशिक्षक को भाव नहीं दे रहे। खेल मंत्रालय ने संकेत दिया है कि आगे भी विदेशी प्रशक्षकों की ही भूमिका अहम रहेगी। तो फिर अपने द्रोणाचार्यों का क्या होगा? जिन खेलों में विदेशी नाकाम हुए उन पर पैसा बहाने वाला तर्क समझ से परे है। तो क्या हमारे अपने गुरु खलीफा सिर्फ द्रोणाचार्य अवार्ड पाने के लिए अस्तित्व में हैं? सवाल यह भी है कि यदि सरकार और खेल संघ विदेशियों से प्रभावित हैं तो उन्हें जमीनी स्तर से खिलाड़ियों को सिखाने पढ़ाने की जिम्मेदारी क्यों नहीं सौंपी जाती?

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