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…आखिर कब जागेगा भारतीय फुटबॉल का सोया शेर?

नील छेत्री भारतीय फुटबॉल इतिहास के सर्वकालीन श्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक हैं। विश्व कप और एशिया कप के संयुक्त क्वालीफायर में बांग्लादेश के खिलाफ दो शानदार गोल जमा कर भारतीय कप्तान ने साबित कर दिया कि उन्हें क्यों करिश्माई खिलाड़ी कहा जाता है।

सुनील छेत्री।

राजेंद्र सजवान

सुनील छेत्री भारतीय फुटबॉल इतिहास के सर्वकालीन श्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक हैं। विश्व कप और एशिया कप के संयुक्त क्वालीफायर में बांग्लादेश के खिलाफ दो शानदार गोल जमा कर भारतीय कप्तान ने साबित कर दिया कि उन्हें क्यों करिश्माई खिलाड़ी कहा जाता है। उनके अलावा वर्तमान टीम में एक और दमदार खिलाड़ी गोलकीपर गुरप्रीत सिंह संधू हैं। लेकिन फुटबाल ग्यारह खिलाड़ियों का खेल है और हर स्थान पर हर एक का स्तरीय होना जरूरी है। वरना ऐसा हाल होता है जैसा पिछले पांच दशकों में भारतीय टीम का हुआ है।

भारतीय फुटबॉल आज कहां खड़ी है, विश्व कप और एशिया कप क्वालीफायर में खेले मैचों के नतीजों से पता चल जाता है। जो लोग बांग्लादेश पर मिली जीत पर इतरा रहे हैं, उन्हें यह बता दें कि बांग्लादेश विश्व रैंकिंग में हमसे 79 पायदान पीछे है। यह भी जान लें कि विश्व कप क्वालीफायर में छह वर्षों में यह भारत की पहली जीत है, जबकि विदेशी धरती पर 20 साल बाद कोई मुकाबला जीता है। लेकिन जो देश आज बांग्लादेश, अफगानिस्तान जैसी टीमों के सामने असहाय नजर आता है वह कभी फ्रांस, इटली और अन्य प्रमुख फुटबाल राष्ट्रों का मुकाबला करने की योग्यता रखता था।

1948 में लंदन, 1952 में हेलसिंकी, 1956 में मेलबॉर्न और 1960 में रोम ओलंपिक में भारतीय फुटबॉल ने बखूबी अपनी उपस्थिति दर्ज की थी। 1951 और 1962 के एशियाई खेलों का खिताब जीतने वाले भारत की फुटबॉल का भी कभी नाम था। तब एशियाई देशों में भारत को एक सुपर पावर के रूप में देखा जाने लगा था। लेकिन पता नहीं किसकी नजर लगी कि आज भारत दुनिया के फिसड्डी देशों में शामिल हो गया है और बांग्लादेश जैसे नौसिखिया को बमुश्किल हरा पाता है।

आखिर कमी कहां रह गई? जवाब ढूंढने के लिए पचास साल की भारतीय फुटबॉल पर सरसरी नजर डालें तो पता चलता है कि तब साधन सुविधाओं की बेहद कमी थी। खिलाड़ियों के पास कामचलाऊ खेल उपकरण भी नहीं थे। ना कोई खाद खुराक और ना ही कोई विदेशी कोच। चूंकि खिलाड़ियों के पास फुटबॉल खेलने के जूते नहीं थे, इसलिए भारतीय टीम 1950 के विश्व कप में भाग नहीं ले पाई थी। इसके बाद फिर कभी मौका नहीं मिल पाया।
आजादी के बाद के 20 साल में भारत ने फुटबॉल में जो नाम सम्मान कमाया उसका बड़ा कारण खेल मैदानों की उपलब्धता, हर गली कूचे, जिले और प्रदेश में टूर्नामेंट का आयोजन था। छोटे बड़े शहरों में फुटबॉल के मेले सजते थे।

डीसीएम, डूरंड, रोवर्स कप, आइएफए शील्ड और दर्जनों अन्य आयोजनों में देश के श्रेष्ठ खिलाड़ियों का जौहर देखने को मिलता था, जिनमें से अधिकांश टूर्नामेंट बंद हो चुके हैं या जैसे तैसे चल रहे हैं। कुछ साल पहले तक संतोष ट्रॉफी राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भाग लेना प्रत्येक खिलाड़ी का पहला सपना होता था, जिसका स्थान आइ लीग और अब आइएसएल ने ले लिया है। भले ही आइएसएल के आयोजन से कुछ खिलाड़ियों को पैसा मिल रहा है पर साल दर साल देश की फुटबॉल रसातल में धसक रही है। संतोष ट्रॉफी की लगातार उपेक्षा का ही नतीजा है कि प्रतिभावान खिलाड़ियों का अकाल सा पड़ गया है। एक जमाना था जब देश के कम से कम 50 शीर्ष खिलाड़ियों के नाम फुटबॉल प्रेमियों की जुबान पर होते थे। आज दो-चार के अलावा अन्य किसी को कोई नहीं जानता। कभी मोहन बागान, ईस्ट बंगाल, गोरखा ब्रिगेड, आंध्रा पुलिस, जेसीटी, पंजाब पुलिस, सीमा बल, मफतलाल, डेम्पो, सलगांवकर और दर्जनों अन्य टीमों का जलवा था। आज बूढ़े विदेशियों से सजे आइएसएल क्लब भारतीय फुटबॉल का मखौल उड़ा रहे हैं।

कुछ पूर्व खिलाड़ियों की मानें तो जब से फुटबाल में विदेशी कोचों का चलन बढ़ा है, अच्छे खिलाड़ियों का जैसे अकाल पड़ गया है और अपने द्रोणाचार्य दर बदर हैं। विदेशी कोच आते हैं, बड़े बड़े दावे करते हैं और जाते जाते कह जाते हैं, भारतीय फुटबॉल कभी नहीं सुधर सकती। यही कोच भारत भूमि पर कदम रखते ही कहते हैं कि भारत फुटबॉल का सोया शेर है, जिसे जगाने की जरूरत है। लेकिन करोड़ों के खर्च के बावजूद एक भी विदेशी कोच भारत की फुटबॉल को जगा नहीं पाया है। पता नहीं सोया शेर अब ब्लू टाइगर क्यों कहा जाने लगा है, जबकि टाइगर ब्लू होता ही नहीं है।

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