मीराबाई चानू के लिए जेवर बेचकर मां ने बनवाई थीं ओलंपिक जैसी कान की बालियां, बेटी के पदक जीतते ही फूट-फूट कर रोने लगे पिता

ओलंपिक के पहले दिन मीराबाई चानू का पदक ही सिर्फ आकर्षक का केंद्र नहीं था। उनके कान की बालियां ने भी खूब सुर्खियां बटोरी। ओलंपिक के छल्ले के आकार की उनकी सोने की बालियां चानू को उनकी मां ने अपने जेवर बेचकर बनवाई थी।

ओलंपिक के छल्ले के आकार की उनकी सोने की बालियां उनकी मां ने अपने जेवर बेचकर बनवाई थी। (expres file)

टोक्यो ओलंपिक 2020 के पहले दिन जब भारत को लगातार निराशा का सामना करना पड़ रहा था। तब भारोत्तोलक मीराबाई चानू ने रजत पदक जीत इतिहास रचा दिया। 21 साल बाद भारत को भारोत्तोलन स्पर्धा में मेडल जीतने वाली चानू का परिवार उनकी इस सफलता से फूला नहीं समा रहा है।

ओलंपिक के पहले दिन मीराबाई चानू का पदक ही सिर्फ आकर्षक का केंद्र नहीं था। उनके कान की बालियां ने भी खूब सुर्खियां बटोरी। ओलंपिक के छल्ले के आकार की उनकी सोने की बालियां उनकी मां ने अपने जेवर बेचकर बनवाई थी। उनकी मां का मानना था कि यह बालियां मीराबाई चानू के लिए ‘गुडलक’ का काम करेंगी। रियो ओलंपिक में चानू कुछ खास नहीं कर पाई थी ऐसे में जैस ही उन्होंने रजत पदक जीता उनके पिता सैखोम कृति मैतेई फूट-फूट कर रोने लगे।

चानू की मां सेखोम ओंग्बी तोम्बी लीमा ने कहा, ‘”मैं बालियां टीवी पर देखी थी, मैंने ये उसे 2016 में रियो ओलंपिक से पहले दी थी। मैंने मेरे पास पड़े सोने और अपनी बचत से इन्हें बनवाया था जिससे कि उसका भाग्य चमके और उसे सफलता मिले।’”

उन्होंने कहा, “इन्हें देखकर मेरे आंसू निकल गए और जब उसने पदक जीता तब भी। उसके पिता (सेखोम कृति मेइतेई) की आंखों में भी आंसू थे। खुशी के आंसू। उसने अपनी कड़ी मेहनत से सफलता हासिल की।” मीराबाई को टोक्यो में इतिहास रचते हुए देखने के लिए उनके घर में कई रिश्तेदार और मित्र भी मौजूद भी मौजूद थे।

मीराबाई ने महिला 49 किग्रा वर्ग में रजत पदक के साथ ओलंपिक में भारोत्तोलन पदक के भारत के 21 साल के इंतजार को खत्म किया और तोक्यो खेलों में भारत के पदक का खाता भी खोला। छब्बीस साल की चानू ने कुल 202 किग्रा (87 किग्रा+115 किग्रा) वजन उठाकर 2000 सिडनी ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली कर्णम मल्लेश्वरी से बेहतर प्रदर्शन किया।

इसके साथ की मीराबाई ने 2016 रियो ओलंपिक की निराशा को भी पीछे छोड़ दिया जब वह एक भी वैध प्रयास नहीं कर पाई थी। मणिपुर की राजधानी इम्फाल से 25 किमी दूर मीराबाई के नोंगपोक काकचिंग गांव में स्थित घर में कोविड-19 महामारी के कारण कर्फ्यू लागू होने के बावजूद शुक्रवार रात से ही मेहमानों का आना जाना लगा हुआ था। मीराबाई की तीन बहनें और दो भाई और हैं।

उनकी मां ने कहा, ‘‘उसने हमें कहा था कि वह स्वर्ण पदक या कम से कम कोई पदक जरूर जीतेगी। इसलिए सभी ऐसा होने का इंतजार कर रहे थे। दूर रहने वाले हमारे कई रिश्तेदार कल शाम ही आ गए थे। वे रात को हमारे घर में ही रुके।’’

उन्होंने कहा, ‘‘कई आज सुबह आए और इलाके के लोग भी जुटे। इसलिए हमने बराम्दे में लगा दिया और टोक्यो में मीराबाई को खेलते हुए देखने के लिए लगभग 50 लोग मौजूद थे। कई लोग आंगन के सामने भी बैठे थे। इसलिए यह त्योहार की तरह लग रहा था। ’’

लीमा ने कहा, ‘‘कई पत्रकार भी आए। हमने कभी इस तरह की चीज का अनुभव नहीं किया था।’’ मीराबाई ने टोक्यो के भारोत्तोलन एरेना में अपनी स्पर्धा शुरू होने से पहले वीडियो कॉल पर बात की और अपने माता-पिता का आशीर्वाद लिया।

मीराबाई की रिश्ते की बहन अरोशिनी ने कहा, ‘‘वह (मीराबाई) बहुत कम घर आती है (ट्रेनिंग के कारण) और इसलिए एक दूसरे से बात करने के लिए हमने वट्सऐप पर ग्रुप बना रखा है। आज सुबह उसने हम सभी से वीडियो कॉल पर बात की और अपने माता-पिता से उसने आशीर्वाद लिया।’’ उन्होंने कहा, ‘‘उसने कहा कि देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने के लिए मुझे आशीर्वाद दीजिए। उन्होंने आशीर्वाद दिया। यह काफी भावुक लम्हा था।’’

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