…तो क्या तोक्यो फिर बनेगा भारतीय हॉकी की वापसी का गवाह!

तोक्यो ओलंपिक 2020 के उद्घाटन मुकाबले में भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने न्यूजीलैंड को हरा कर जब अपना अभियान शुरू किया तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह टीम सेमी फाइनल तक का सफर तय कर पाएगी।

Tokyo
भारतीय हॉकी टीम से उम्‍मीद जगी। फाइल फोटो।

राजेंद्र सजवान

तोक्यो ओलंपिक 2020 के उद्घाटन मुकाबले में भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने न्यूजीलैंड को हरा कर जब अपना अभियान शुरू किया तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह टीम सेमी फाइनल तक का सफर तय कर पाएगी। लेकिन जब अगले मुकाबले में आॅस्ट्रेलिया ने 7-1 से रौंद कर भारतीय खिलाड़ियों और हॉकी प्रेमियों को स्तब्ध किया तो यह तय लगने लगा कि इस लाचार टीम को लेकर की जा रही तमाम भविष्यवाणियां और दावे झूठ का पुलिंदाभर हैं और शायद तोक्यो ओलंपिक भारतीय हॉकी का कब्रगाह बनने जा रहा है। कुछ इसी प्रकार की राय महिला हॉकी को लेकर भी बन रही थी। लेकिन महिलाओं ने पुरुष टीम का अनुसरण कर ऐसा कारनामा कर दिखाया जैसा पहले कभी देखने को नहीं मिला।

दोनों टीमों का सेमी फाइनल में पहुंचना बड़ी कामयाबी है लेकिन सौ फीसदी फिटनेस के साथ यूरोपीय टीमों पर भारी पड़ना, नए युग की शुरुआत कह सकते हैं। आॅस्ट्रेलिया द्वारा रौंदे जाने के बाद भी यदि पुरुष टीम ओलंपिक का सेमी फाइनल खेल रही है तो यह सचमुच हैरान करने वाला प्रदर्शन है। बड़े मंच पर इतने बड़े गोल अंतर से हारने के बाद भी यदि कोई टीम अपने तेवर बदल कर लगातार चार मैच जीत सकती है तो वह पदक क्यों नहीं जीत सकती? स्पेन अर्जेंटीना, जापान को हराने के बाद भारतीय खिलाड़ियों ने क्वार्टर फाइनल में ग्रेट ब्रिटेन को जिस रफ्तार, ठहराव और अंतत: अवसरवादिता से पराजित किया उसे देख कर यह भरोसा करना मुश्किल है कि यह वही टीम है जिसने कंगारुओं के सामने हथियार डाल दिए थे।

भारतीय खिलाड़ियों, टीम प्रबंधन, कोचों और हॉकी के कर्णधारों का मनोबल ऊंचा है। इतना ऊंचा कि शायद आॅस्ट्रेलिया या कोई भी अन्य टीम भारत से मुकाबला करने से पहले ही दहशत में आ सकती है। उन्हें याद दिला दें कि 57 साल पहले इसी तोक्यो शहर ने भारतीय हॉकी का पराक्रम देखा था। तब हम बड़े-बड़े दिग्गजों को हरा कर चैंपियन बने थे। 1964 में जब हमारे खिलाड़ी जापान की राजधानी में अवतरित हुए तो उनके अंदर बदले का लावा फूट रहा था। उनका एक और सिर्फ एक लक्ष्य था, हर हाल में पाकिस्तान से हिसाब चुकता करना और चार साल पहले रोम ओलंपिक में गंवाया खिताब वापस पाना।

आजादी से पहले 1932 से 36 के बीच भारत ने तीन ओलंपिक स्वर्ण जीते थे। आजाद होने के बाद भारत ने 1948, 52 और 56 के खेलों में अपनी बादशाहत बनाए रखी। अंतत: पाकिस्तान ने पहली बार 1960 के रोम ओलंपिक में भारत को हरा कर चैन की सांस ली और अपना पहला ओलंपिक स्वर्ण अर्जित किया। लेकिन चार साल बाद जब दोनों परंपरागत प्रतिद्वंद्वी आमने सामने हुए तो चरणजीत सिंह की कप्तानी वाली भारतीय टीम ने हिसाब चुकता कर दिखाया। विजेता टीम में हरिपाल कौशिक, शंकर लक्ष्मण, गुरबक्स, धर्म सिंह, पिरथीपाल, मोहिन्दरलाल, राजिंदर सिंह, हरबिंदर सिंह, ऊधम सिंह, बलबीर सिंह जैसे धुरंधर खिलाड़ी शामिल थे। सही मायने में भारत ने अपना सातवां और असली गोल्ड तोक्यो में जीता था। 1980 का आठवां गोल्ड अमेरिकी बायकॉट का पुरस्कार माना जाता रहा है।

एक बार फिर भारतीय हॉकी टीम तोक्यो में है और खिताबी जीत के साथ अपने गौरव की वापसी के लिए गिरती पड़ती संभल गई है। फर्क सिर्फ इतना है कि हमारा कट्टर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान क्वालीफाई नहीं कर पाया है और भारत भी पहले जैसा शक्तिवान नहीं रहा है। लेकिन यदि भारतीय खिलाड़ी पदक जीत पाते हैं तो भारत और एशियाई हॉकी एक बार फिर से तोक्यो से अपनी विजय यात्रा की शुरुआत कर सकती है।

भले ही हमारे पास पहले जैसे खेल कौशल वाले चैंपियन खिलाड़ी नहीं हैं और हमारा रेकार्ड भी लगातार खराब होता चला गया लेकिन तोक्यो यदि हमारी हॉकी के लिए फिर से भाग्यशाली रहा तो भारत में हॉकी खोया सम्मान पा सकती है। भारतीय टीम के अब तक के प्रदर्शन को देखें तो गोलकीपर श्रीजेश मजबूत दीवार बन कर खड़े हैं। रक्षा पंक्ति बेजोड़ है, फॉरवर्ड रंगत पकड़ चुके हैं और पेनाल्टी कार्नर पर गोल बन रहे हैं। अर्थात एक संतुलित टीम तैयार है।

ओलंपिक में पहली बार लग रहा है कि भारतीय हॉकी ने खुद को हर हाल में ढाल लिया है। नकली घास के मैदान पर खेलते हुए 45 साल हो गए हैं। ऐसे में अब किसी बहाने की गुंजाइश नहीं बची है। बस एक पदक भारतीय हॉकी की वापसी का शंखनाद कर सकता है। शायद अब नहीं तो कभी नहीं!

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