अफगानिस्तान में मर्दों को 400 खेल खेलने की मंजूरी, तालिबान से बचकर पाकिस्तान पहुंचीं अफगानी महिला फुटबॉलर्स

दूसरी ओर अफगानिस्तान की 32 महिला फुटबॉल खिलाड़ी अपने परिवारों के साथ पाकिस्तान पहुंच गईं हैं। इन महिला फुटबॉलर्स को तालिबान से धमकियों का सामना करना पड़ रहा था। ये महिला फुटबॉलर पेशावर से लाहौर जाएंगी, जहां उन्हें पाकिस्तान फुटबॉल महासंघ के मुख्यालय में रखा जाएगा।

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तालिबान सिक्योरिटी का एक सदस्य राइफल पकड़े हुए अफगानिस्तान के काबुल में अजीजी बैंक के सामने लोगों को लाइन में लगवाता हुआ। (सोर्स- फाइल फोटो WANA/Reuters)

अफगानिस्तान के नए खेल प्रमुख बशीर अहमद रुस्तमजई ने मंगलवार यानी 15 सितंबर 2021 को कहा कि तैराकी से लेकर फुटबॉल, दौड़ से लेकर घुड़सवारी तक, तालिबान देश में 400 खेलों की मंजूरी देगा। हालांकि, इस बात की पुष्टि करने से इंकार कर दिया कि क्या इनमें से महिलाएं भी कोई खेल खेल सकती हैं। रुस्तमजई ने एएफपी से कहा, ‘कृपया महिलाओं के बारे में और सवाल न करें।’ इस बीच, तालिबान से बचकर अफगानिस्तान की 32 महिला फुटबॉल खिलाड़ी अपने परिवारों के साथ पाकिस्तान पहुंच गईं हैं।

पिछले हफ्ते, तालिबान के सांस्कृतिक आयोग के उप प्रमुख अहमदुल्ला वासीक ने कहा था कि महिलाओं के लिए खेल खेलना जरूरी नहीं है। वहीं, अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड (एसीबी) के अध्यक्ष अजीज़ुल्लाह फाजली ने एसबीएस रेडियो पश्तो को बताया कि उन्हें अब भी उम्मीद है कि महिलाएं खेल पाएंगी। उन्होंने कहा, बहुत जल्द, हम आपको अच्छी खबर देंगे कि हम कैसे आगे बढ़ेंगे, लेकिन रुस्तमजई ने महिला खेल के भविष्य से खुद को अलग कर लिया।

महिलाओं की खेल में भागीदारी से जुड़े सवाल पर नहीं दिया साफ जवाब

रुस्तमजई ने खेल में महिलाओं की भागीदारी पर कहा कि उन्हें अब भी शीर्ष तालिबान नेतृत्व के आदेश का इंतजार है। उनके एक सलाहकार ने कहा कि हम विश्वविद्यालयों की तरह पुरुषों से बिल्कुल अलग महिलाओं को खेलने की मंजूरी देने के बारे में सोच सकते हैं। हालांकि, रुस्तमजई ने सीधे तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की। रुस्तमजई पूर्व कुंग फू और रेसलिंग चैंपियन हैं। उन्हें कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन तालिबान ने अफगानिस्तान में खेल और फिजिकल एजुकेशन का महानिदेशक बनाया है।

नए नियमों के मुताबिक, महिलाओं को विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की मंजूरी दी गई है, लेकिन उन्हें पुरुषों से अलग रखा जाता है। साथ ही खास तरह का परिधान अबाया रॉब और नकाब पहनना होता है। पढ़ाई का पाठ्यक्रम भी उनके हिसाब से होता है। मतलब अब तक जो संकेत मिले हैं उससे लगता है कि महिलाओं के लिए कुछ भी साफ नहीं है।

बता दें कि 1996 से 2001 के तालिबान के क्रूर और दमनकारी शासन के दौरान महिलाओं के किसी भी खेल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था। पुरुषों के खेलों पर भी कड़ा नियंत्रण रखा जाता था। महिलाओं का शिक्षा और काम पर भी काफी हद तक प्रतिबंध लगा दिया गया था। सार्वजनिक तौर पर फांसी देने के लिए स्पोर्ट्स स्टेडियम्स का इस्तेमाल किया जाता था।

रुस्तमजई ने कहा कि हम किसी भी खेल पर तब तक प्रतिबंध नहीं लगाएंगे, जब तक कि वह शरिया कानून का उल्लंघन नहीं करता। 400 प्रकार के खेलों की मंजूरी दी गई है। रुस्तमजई ने कहा कि इस्लामी कानून का पालन करने का मतलब अन्य देशों की तुलना में व्यवहार में थोड़ा बदलाव है। यह भी ज्यादा नहीं है। उदाहरण के लिए फुटबॉल खिलाड़ियों या मॉय थाई मुक्केबाजों को थोड़े लंबे शॉर्ट्स पहनने होंगे, जो घुटने से नीचे होंगे।

महिलाओं के क्रिकेट खेलने के सवाल पर अहमदुल्ला वासीक ने पिछले सप्ताह ऑस्ट्रेलियाई प्रसारक एसबीएस से कहा था, ‘क्रिकेट में, उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है जहां उनका चेहरा और शरीर ढंका नहीं होगा। इस्लाम महिलाओं को इस तरह देखने की इजाजत नहीं देता है।’

हालांकि, तालिबान खासकर क्रिकेट को लेकर पहले से ही दबाव में है। इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) के नियमों में कहा गया है कि टेस्ट मैचों में हिस्सा लेने के लिए देश में एक सक्रिय महिला टीम भी होनी चाहिए।

अफगानी महिला फुटबॉलर्स के लिए पाकिस्तान ने जारी किए आपात मानवीय वीजा

उधर, अफगानिस्तान की 32 महिला फुटबॉल खिलाड़ी अपने परिवारों के साथ पाकिस्तान पहुंच गईं हैं। इन महिला फुटबॉलर्स को तालिबान से धमकियों का सामना करना पड़ रहा था। बुधवार को एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा आपात मानवीय वीजा जारी किए जाने के बाद ये फुटबॉलर पाकिस्तान पहुंचीं हैं। ये महिला फुटबॉलर पेशावर से लाहौर जाएंगी, जहां उन्हें पाकिस्तान फुटबॉल महासंघ के मुख्यालय में रखा जाएगा।

राष्ट्रीय जूनियर बालिका टीम की इन खिलाड़ियों को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कतर जाना था जहां अफगान शरणार्थियों को 2022 फीफा विश्व कप के एक स्टेडियम में रखा गया है। काबुल हवाईअड्डे पर 26 अगस्त को हुए एक बम धमाके के कारण वे ऐसा नहीं कर पाईं। उस बम धमाके में 13 अमेरिकी और कम से कम 170 अफगान नागरिकों की मौत हो गई थी।

‘डॉन’ अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, इन महिला खिलाड़ियों को फुटबॉल खेलने के लिए तालिबान से धमकियों का सामना करना पड़ रहा था। रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त में अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता पर काबिज होने के बाद ये खिलाड़ी तालिबान से बचने के लिए छुपती फिर रही थीं।

ब्रिटेन के एक गैर सरकारी संगठन ‘फुटबॉल फॉर पीस’ ने सरकार और पाकिस्तान फुटबॉल महासंघ (जो फीफा से मान्यता प्राप्त नहीं है) की मदद से इन 32 खिलाड़ियों को पाकिस्तान लाने की शुरुआत की थी। फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फैनटिनो पिछले हफ्ते दोहा यात्रा के दौरान अफगान शरणार्थियों से मिले थे। तब फीफा की इस बात के लिए आलोचना की गई थी कि उसने अफगानिस्तान में इन महिला फुटबॉलर्स की मदद के लिए कोई कदम नहीं उठाया था।

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