सुप्रीम कोर्ट ने अनुराग सिंह ठाकुर पर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के मामलों में हिस्सा लेने पर लगा बैन हटा दिया है। कोर्ट ने कहा कि उन पर जिंदगी भर का प्रतिबंध लगाना न तो सही था और न ही इसका कोई इरादा था। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि यह ‘आनुपातिकता के सिद्धांत को लागू करने का सही मामला है।’ साथ ही स्पष्ट किया कि अदालत का ‘जिंदगी भर का प्रतिबंध लगाने का ना तो कोई इरादा था और ना ही इसकी जरूरत थी।’
9 साल से लगा था अनुराग ठाकुर पर बैन
सुप्रीम कोर्ट ने 2 जनवरी 2017 के अपने फैसले में बदलाव किया और कहा कि अनुराग ठाकुर नियमों और विनियमों के मुताबिक बीसीसीआई के मामलों में हिस्सा लेने के लिए स्वतंत्र होंगे। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2 जनवरी, 2017 के फैसले के निर्देश 3 और 4 पहले ही वापस ले लिए गए थे और यह मौजूदा आवेदन केवल उन पर लगाए गए प्रतिबंध से संबंधित था। अनुराग ठाकुर के वकील ने कहा कि यह प्रतिबंध लगभग 9 साल से लागू था और इसे जारी रखने से गंभीर कठिनाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह भी साफ कर दिया कि अनुराग ठाकुर पहले ही बिना शर्त माफी मांग चुके हैं, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुराग ठाकुर को नोटिस जारी कर उनसे पूछा था कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों शुरू नहीं की जानी चाहिए। कोर्ट ने उनसे लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लागू करने से बचने के लिए आईसीसी से एक लेटर के जरिए दखल मांगने के संबंध में उन पर लगाए गए झूठी गवाही के आरोपों पर जवाब देने को कहा था।
2016 में बीसीसीआई अध्यक्ष बने थे अनुराग ठाकुर
अनुराग ठाकुर 2016 में बीसीसीआई के अध्यक्ष बने थे, लेकिन लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू न करने की वजह से उन्हें उनके पद से हटाया गया था। अब इस फैसले से वे बोर्ड की गतिविधियों में फिर से सक्रिय हो सकेंगे बशर्ते कि वो बीसीसीआई के मौजूदा नियमों का पालन करें। अनुराग ठाकुर ने इस आदेश में संशोधन के लिए याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि 2017 का आदेश बिना उन्हें सुने पारित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस मांग को स्वीकार करते हुए बैन हटाने का फैसला सुनाया। कोर्ट का यह फैसला भारतीय क्रिकेट प्रशासन में एक अहम बदलाव ला सकता है।
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