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सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिका आइपीएल का भविष्य

क्रिकेट के अलावा सट्टेबाजी और दूसरी वजहों से भी सुर्खियों में रही इंडियन क्रिकेट प्रीमियर लीग (आइपीएल) पर मंगलवार को बड़ा फैसला आने की उम्मीद है..

Author July 12, 2015 9:56 AM

क्रिकेट के अलावा सट्टेबाजी और दूसरी वजहों से भी सुर्खियों में रही इंडियन क्रिकेट प्रीमियर लीग (आइपीएल) पर मंगलवार को बड़ा फैसला आने की उम्मीद है। वैसे तो फैसला आइपीएल की दो टीमों चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रॉयल्स पर आएगा लेकिन इसका असर आइपीएल की दूसरी टीमों पर भी पड़ेगा। देश में ललित मोदी को लेकर जिस तरह का माहौल है और उन पर भ्रष्टाचार के जिस तरह के आरोप लगे हैं उसे देखते हुए भी मंगलवार को आने वाले फैसले पर क्रिकेट जगत की निगाहें रहेंगी।

हाल के दिनों में ललित मोदी को लेकर केंद्र की राजग सरकार विपक्ष के निशाने पर रही है और सुषमा स्वराज से लेकर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के इस्तीफे की मांग के बीच मोदी जिस तरह के ट्वीट करते रहे, उससे आइपीएल पर सवाल खड़ा होना लाजमी भी है। लेकिन इसके लिए एक-दो लोगों को जिम्मेदार माना जाना सही नहीं है। मोदी-राजे और स्वराज के संबंधों से इतर क्रिकेट में जिस तरह का ‘लेनदेन’ चलता रहा है उसे देखते हुए कई और हैं जिन पर सवाल खड़ा होगा।

यह सही है कि ललित मोदी बरास्ता राजस्थान क्रिकेट बीसीसीआइ से जुड़े। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से उनके अच्छे रिश्ते हैं और उन्होंने ही ललित मोदी को राजस्थान क्रिकेट का मुखिया बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। तब वे राजस्थान की मुख्यमंत्री थीं। लेकिन इसके बाद ललित मोदी ने बीसीसीआई में जिस तरह का रसूख बनाया और आइपीएल के जरिए कॉरपोरेट घरानों को लुभा कर पैसों का खेल शुरू किया, उसमें राजे का योगदान नहीं रहा है। तब भारत में इंडियन क्रिकेट लीग शुरू हुई थी और इससे घबराई बीसीसीआइ ने उसके काट में आइपीएल की शुरुआत की। तब शरद पवार बोर्ड के अध्यक्ष और अरुण जेटली व राजीव शुक्ला उपाध्यक्ष थे। यानी आइपीएल के खेल को ‘सभी दलों’ का साथ मिला हुआ था।

क्रिकेट में जो कालिख पसरी है, उसे हर पार्टी का समर्थन हासिल है क्योंकि क्रिकेट के प्रमुख पदों पर सियासी हस्तियां काबिज हैं और क्रिकेट के बहाने एक-दूसरे को गिराने-बचान के खेल में जुटे हैं। आइपीएल को लोकप्रियता तो मिली लेकिन इससे कई खामियां भी जुड़तीं चली गर्इं। पैसे का बोलबाला रहा। पार्टियों के बहाने टीम के फ्रेंचाइजों ने ‘अलग’ खेल शुरू किया। बीसीसीआइ गदगग था तो ललित मोदी बमबम। तब मोदी असामान पर थे और क्रिकेट मैदानों के अलावा होटलों में भी खेला जाता था। लेकिन इसी चकाचौंध ने ललित मोदी को शिकंजे में जकड़ा और वे पैसे के फेर में इस कद्र पड़े कि अब भगौड़ बन कर लंदन से ट्वीट-ट्वीट खेल रहे हैं।

मोदी के जाने के बाद भी आइपीएल का कंलक कम नहीं हुआ। दो साल पहले सट्टेबाजी में जब तीन खिलाड़ियों को पकड़ा गया तो चेन्नई सुपकिंग्स के मालि गुरुनाथ मेयप्पन व राजस्थान रायल्स के राज कुंद्रा का सच भी सामने आ गया। तब बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष एन श्रीनिवासन अपने दामाद मेयप्पन को बचाने में लगे रहे तो पूरा क्रिकेट जगत श्रीनिवासन को। जबकि जरूरत क्रिकेट को बचाने की थी। अब इसा सट्टेबाजी के मामले को लेकर मंगलवार को अहम फैसला आना है।

सुप्रीम कोर्ट ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अगुआई वाली उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। समिति की रिपोर्ट की बुनियाद पर आइपीएल के आठवें सत्र के दौरान सट्टेबाजी के लिए इन टीमों और इनके मालिकान मेयप्पन और कुंद्रा के खिलाफ सजा पर फैसला करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने 22 जनवरी को मेयप्पन और कुंद्रा के खिलाफ लगे आरोपों को सही पाया था और दोनों के खिलाफ सजा तय करने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था जिसमें न्यायमूर्ति अशोक भान और न्यायमूर्ति आरवी रवींद्रन भी शामिल थे।

समिति के सूत्रों की मानें तो तीनों पूर्व न्यायाधीशों की समिति को अपना काम पूरा करने के लिए तीन महीने का वक्त दिया गया था। समिति बीसीसीआइ के सहमति करार और नियमों का आकलन करने के बाद जरू री होने पर हितों के टकराव को सुलझाने के लिए संशोधन पर भी सुझाव देगी। हालांकि इस मामले में पूर्व बीसीसीआइ अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के खिलाफ आरोप साबित नहीं हो सके थे।

लेकिन श्रीनिवासन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की थी और हितों के टकराव के बात को सही मानते हुए उन्हें अध्यक्षपद छोड़ने और चुनाव न लड़ने को कहा था। आइपीएल के नियमों के अनुसार टीम का कोई अधिकारी अगर खेल को बदनाम करता है तो टीम की फ्रेंचाइजी को रद्द किया जा सकता है। सारी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर है क्योंकि उसके फैसले से आइपीएल का भविष्य भी जुड़ा है।

(फ़ज़ल इमाम मल्लिक)

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