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बिहार का नारायण: दिव्यांग पैदा हुआ, अनाथालय में रहा, बसें साफ कीं…अब है गोल्ड मेडल विजेता

दिल्ली के उत्तर पश्चिम इलाके समयपुर बादली स्थित एक झुग्गी में रहने वाले 27 वर्षीय एथलीट नारायण ठाकुर ने संघर्ष और कड़ी मेहनत की बदौलत एशियाई पैरा खेलों में गोल्ड जीता।

Author October 23, 2018 1:28 PM
एशियन पैरा गेम्स में गोल्ड जीतने वाले नारायण ठाकुर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ (Photo: Twitter@narendramodi)

वे दिव्यांग पैदा हुए। जब उनकी उम्र आठ साल की थी, तो उन्होंने अपने पिता को खो दिया। अगले आठ साल उन्होंने अनाथालय में गुजारे।अनाथालय छोड़ने के बाद उन्हें डीटीसी बस साफ करने को मजबूर होना पड़ा। दिल्ली में सड़क किनारे स्थित ढ़ाबे पर वेटर का काम करना पड़ा ताकि जिंदगी की गाड़ी चल सके। लेकिन इन समस्याओं से डटकर मुकाबला करने के बाद बिहार के नारायण ठाकुर जकार्ता में आयोजित एशियाई पैरा खेलों में स्वर्ण पदक (पुरुषों के 100 मीटर टी35 स्पर्धा) जीतने में कामयाब रहे। यह कहानी दिल्ली के उत्तर पश्चिम इलाके समयपुर बादली स्थित एक झुग्गी में रहने वाले 27 वर्षीय एथलीट ही है। जिसने संघर्ष और कड़ी मेहनत की बदौलत यह मुकाम हासिल किया है।

टीओआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार (22 अक्टूबर) को दिल्ली स्टेडियम में सम्मानित होने के बाद नारायण ठाकुर ने कहा, “मेरा जन्म बिहार में हुआ था। कुछ समय बाद मेरे पिता दिल्ली आ गए। यहां आने के कुछ वर्षों बाद बाद पता चला कि उन्हें ब्रेन ट्यूमर है और वे गुजर गए।” नारायण की मां एक प्लास्टिक फैक्ट्री में काम करती थी। लेकिन पति की मौत के बाद उनके लिए अपने तीन बच्चों की देखभाल करना काफी मुश्किल था। ठाकुर के शरीर का बांया हिस्सा लकवाग्रस्त है। वे कहते हैं, “मुझे दरियागंज स्थित अनाथालय में भेज दिया गया ताकि मुझे अच्छा खाना मिले और पढ़ने का मौका मिले। खेलों के प्रति खासकर क्रिकेट, मेरा झुकाव बचपन से ही था। मैं क्रिकेट खेलना चाहता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैंने अनाथालय छोड़ दिया ताकि खेलों में अन्य विकल्प की तलाश कर सकूं।”

नारायण द्वारा वर्ष 2010 में अनाथालय छोड़ने के बाद उनके परिवार पर एक और नई मुसीबत आ खड़ी हुई। वे कहते हैं, “यह वह समय था जब समयपुर बादली स्थित झुग्गियों को ध्वस्त किया जा रहा था। हमारे पास किसी नजदीकी क्षेत्र में शरण लेने के अलावा और किसी तरह का विकल्प नहीं था। पैसों की तंगी तो पहले से ही थी, इसलिए मैं डीटीसी बसों को साफ करने लगा और सड़क किनारे स्थित ढ़ाबे पर काम करने लगा। इसके बावजूद खेल में कुछ अच्छा करने की इच्छा मेरे अंदर बनी रही।”

नारायण को अपना लक्ष्य प्राप्त करने का एक मौका तब मिला जब किसी ने उन्हें यह सलाह दी कि वे जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में जाकर एथलेटिक्स की प्रैक्टिस करें। वे कहते हैं, “मैं इस सलाह के बाद काफी उत्साहित था। लेकिन समस्या यह थी कि घर से स्टेडियम तक जाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। स्टेडियम तक पहुंचने के लिए मुझे तीन बस बदलने पड़ते थे। तब मैंने अपना ठिकाना पानीपत बदलने की कोशिश की। लेकिन यह भी नहीं हो सकता, क्योंकि मेरे पास बस टिकट के लिए 40 से 50 रुपये नहीं थे। तब मैं ट्रेनिंग के लिए त्यागराज स्टेडियम शिफ्ट हो गया।”

ठाकुर कहते हैं कि उन्होंने इस खेल के लिए कड़ी मेहनत की। कुछ अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपने प्रदर्शन से सभी को प्रभावित कर दिया। इसके बाद जर्काता गेम्स में शामिल होना का रास्ता खुला। नारायण गर्व से कहते हैं, “जकार्ता में देश के लिए गोल्ड मेडल जीतने पर मैं काफी खुश हूं। मैं अकेला भारतीय हूं जिसने एशियाड या एशियन पैरा गेम्स में 100 मीटर एथलेटिक्स में गोल्ड मेडल जीता है। मुझे सम्मान समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 40 लाख रुपये का चेक दिया गया। मुझे उम्मीद है कि दिल्ली सरकार द्वारा भी मुझे आर्थिक इनाम दिया जाएगा।” नारायण ठाकुर के पास अभी किसी तरह की नौकरी नहीं है। वे पान गुमटी चलाने में अपनी मां की मदद करते हैं। ‘इनाम में मिले पैसा का क्या करेंगे’ सवाल पर ठाकुर कहते हैं, “मैं सबसे पहले अपने परिजनों के लिए एक घर बनाऊंगा और बचे पैसों को अपनी ट्रेनिंग पर खर्च करूंगा।”

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