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किताब में खुलेंगे राज, रानी रामपाल को छोड़ भारतीय टीम के किसी खिलाड़ी नहीं पहचान रहे थे नरिंदर बत्रा

नरिंदर बत्रा महिला टीम की खिलाड़ियों को शुभकामनाएं देने के लिए मैदान पर आए। उन्होंने रानी राम से शुभकामना देना शुरू किया, लेकिन वह दूसरे खिलाड़ियों को नहीं पहचान रहे थे।

किताब में खुलेंगे राज, रानी रामपाल को छोड़ भारतीय टीम के किसी खिलाड़ी नहीं पहचान रहे थे नरिंदर बत्रा
कोच शोर्ड मारिन की कोचिंग में भारतीय महिला हॉकी टीम ने टोक्यो ओलंपिक 2020 में ऐतिहासिक चौथा स्थान हासिल किया था। (फाइल फोटो)

भुवनेश्वर के कलिंगा स्टेडियम में 1 नवंबर 2019 को भारतीय महिला हॉकी टीम का अमेरिका के खिलाफ ओलंपिक क्वालीफायर मैच था। यह महत्वपूर्ण मैच देखने के लिए लगभग 15 हजार लोग स्टैंड में थे। इनमें से एक इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन (FIH) के तत्कालिन अध्यक्ष नरिंदर बत्रा भी थे। इस महत्वपूर्ण मैच के शुरू होने से ठीक पहले वह मैदान पर आए और भारतीय खिलाड़ियों से मिले। वह कप्तान रानी रामपाल को छोड़कर किसी को नहीं पहचान रहे थे। इस बात खुलासा टीम के पूर्व सोर्ड मारिन ने अपनी किताब विल पावर में किया है।

मारिन ने किताब में इस वाक्ये के बारे में बताते हुए लिखा है, “हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मैच शुरू होने से कुछ मिनट पहले बत्रा हमेशा की तरह कुर्ता-पायजामा और एक जैकेट पहने हुए हमें शुभकामनाएं देने के लिए मैदान पर आए। उन्होंने रानी से खिलाड़ियों को शुभकामना देना शुरू किया, लेकिन जब उन्होंने दूसरों की ओर रुख किया तो स्थिति थोड़ी अजीब हो गई क्योंकि वह किसी अन्य खिलाड़ी को नहीं पहचान रहे थे। उन्होंने पूछा ‘ड्रैग-फ्लिकर कौन है?’ वह इस बात से अनजान थे कि वह दुनिया में सर्वश्रेष्ठ ड्रैग फ्लिकर में से एक गुरजीत कौर से कुछ गज की दूरी पर खड़े थे।”

मारिन ने अपनी किताब में आगे कहा, ” बत्रा के पास कहने के लिए और कुछ नहीं था। इसलिए वह मुस्कुराकर मुड़े और वापस अध्यक्ष वाले कमरे में चले गए। वह अपने आरामदायक एसी वाले कमरे से हमें देख रहे थे। इतने महत्वपूर्ण मैच से ठीक पहले यह अच्छा पल नहीं था, लेकिन बत्रा ने अनजाने में मेरा काम आसान कर दिया। मैंने खिलाड़ियों में जोश भरने के लिए उनके व्यवहार का इस्तेमाल किया।”

घर में विदेशियों की तरह महसूस कर रहे थे

मारिन ने आगे कहा, ” बत्रा का रवैया भारत में महिला हॉकी के प्रति बड़ी उदासीनता का उदाहरण था। दुख की बात है कि हम अपने ही घर में विदेशियों की तरह महसूस कर रहे थे। सोचिए रानी पहली बार 2008 में भारत के लिए खेली थीं, जब वह केवल 14 वर्ष की थी। दस साल बाद वह अपनी 250वीं अंतरराष्ट्रीय मैच खेल रही थी और उन्होंने गर्व से कप्तान का आर्मबैंड पहना था।

लंबे समय तक अपने देश में नहीं खेली महिला टीम

सोर्ड मारिन ने यह भी कहा, “2019 में अमेरिका के खिलाफ यह मैच केवल दूसरी बार था जब वह घर पर इतना अहम मैच खेल रही थीं। वह 2012 के बाद पहली बार इतना महत्वपूर्ण मुकाबला खेल रही थीं। बाकी खिलाड़ियों ने कभी ऐसा अनुभव नहीं किया था। मैं किसी भी खेल में किसी अन्य टीम के बारे में नहीं सोच सकता, जो कुछ असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर इतने लंबे समय तक अपने देश में न खेली हो।”

दुर्भाग्य से देश में महिला हॉकी को तवज्जों नहीं दी जाती

मारिन ने आगे कहा, ” यह इसलिए शर्म की बात थी क्योंकि भारत में हॉकी को काफी भावुक होकर देखा जाता है, लेकिन यहां हॉकी पुरुषों का खेल है। जीवन बदलने वाले लीग, शीर्ष टीमों के खिलाफ नियमित मैच, विश्व स्तरीय कोचिंग स्टाफ केवल पुरुषों के लिए थे। दुर्भाग्य से देश में महिला हॉकी को तवज्जों नहीं दी जाती। मैं जानता हूं कि ऐसा पैसों के कारण है, लेकिन महासंघ की प्राथमिकताओं में भी महिला हॉकी नहीं थी।

शिकायत नहीं कर रहा हूं बस तथ्य पेश कर रहा हूं

मारिन ने यह भी कहा, “मैं शिकायत नहीं कर रहा हूं बस तथ्य पेश कर रहा हूं। मुझे मेरे कार्यकाल के दौरान हॉकी इंडिया से काफी हद तक मदद मिली। हमारे पास प्रशिक्षण और रहने के लिए अच्छी सुविधाएं थीं, हमारी काफी मांगों को तुरंत पूरा किया गया। मीडिया टीम ने बिना किसी पूर्वाग्रह के दोनों टीमों को समान स्तर का एक्सपोजर देने के लिए कड़ी मेहनत की।

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