महाराष्ट्र के सतारा में रविवार 6 सितंबर 2026 को आयोजित हाफ मैराथन के दौरान एक दर्दनाक घटना सामने आई। पुणे के 65 वर्षीय पूर्व वैज्ञानिक संजय कदम ने 21.1 किलोमीटर की दौड़ पूरी की, लेकिन इसके करीब चार घंटे बाद दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई।

‘सतारा हिल हाफ मैराथन’ को पश्चिमी घाट की खड़ी चढ़ाई और तेज ढलान के कारण देश की सबसे मुश्किल दौड़ों में से एक माना जाता है। पहली बार इस दौड़ में हिस्सा ले रहे संजय कदम को दौड़ के दौरान नीचे की ओर आते समय बेचैनी महसूस हुई थी। मौके पर मौजूद एक हृदय रोग विशेषज्ञ ने उन्हें तुरंत CPR दिया और अस्पताल पहुंचाया गया, जहां एंजियोप्लास्टी के बाद उनकी हालत स्थिर हो गई थी।

दौड़ के दौरान बिगड़ी तबीयत

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, ‘सतारा हिल हाफ मैराथन’ में 7700 धावकों ने 21.1 किलोमीटर की दौड़ पूरी की। आयोजकों ने बताया कि पहली बार इसमें हिस्सा ले रहे संजय कदम को सुबह साढ़े नौ से दस बजे के बीच नीचे की ओर आते समय बेचैनी महसूस हुई।

आयोजन के अध्यक्ष उपेंद्र पंडित ने बताया, ‘‘उनके साथ दौड़ रहे मिरज के ह्र्दय रोग विशेषज्ञ रियाज मुजावर समेत अन्य धावकों ने तुरंत उनकी मदद की। रियाज मुजावर ने मौके पर ही उन्हें कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) दिया। रास्ते में तैनात कार्डियक एंबुलेंस भी तत्काल मौके पर पहुंची। मेडिकल टीम ने उन्हें आपात उपचार दिया और CPR जारी रखते हुए पल्स अस्पताल ले जाया गया।’’

एंजियोग्राफी में मुख्य धमनी बंद निकली

अस्पताल में डॉक्टरों ने संजय कदम की एंजियोग्राफी की। इसमें पता चला कि उनके दिल की एक मुख्य धमनी पूरी तरह बंद थी। उपेंद्र पंडित ने बताया, ‘‘संजय कदम की एक मुख्य धमनी पूरी तरह से बंद हो गई थी। इसके बाद एंजियोप्लास्टी की गई और स्टेंट डाला गया। इसके बाद उनकी हालत में सुधार हुआ और वह स्थिर हो गए। चार घंटे बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया।’’

सी-डैक में वैज्ञानिक रह चुके थे कदम

आयोजकों के अनुसार, संजय कदम सेवानिवृत्त वैज्ञानिक थे और उन्होंने सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) में काम किया था। आयोजकों ने बताया कि प्रतियोगिता में शामिल होने वाले धावकों की मेडिकल जानकारी पंजीकरण के दौरान ही जुटाई जाती है।

इस साल प्रत्येक पंजीकृत धावक को मेडिकल पहचान टैग भी दिया गया था, जिसमें संबंधित स्वास्थ्य जानकारी दर्ज थी। इसका उद्देश्य आपात स्थिति में धावक को तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने में मदद करना था। आयोजकों के मुताबिक, प्रतियोगिता के दौरान करीब 80 प्रतिशत प्रतिभागियों ने ये मेडिकल टैग पहने थे।

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