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वर्ल्ड कप फाइनल में सचिन तेंदुलकर ने वीरेंद्र सहवाग को कुर्सी से उठने नहीं दिया था, नहीं देखा था MS Dhoni का विनिंग सिक्स

वर्ल्ड कप फाइनल से पहले नर्वस होने के सवाल पर सचिन ने कहा था, ‘‘नर्वस तो मैं हम मैच से पहले होता हूं। मुझे वो अनुभव अच्छा लगता था। इससे यह होता था कि मेरा शरीर उस मैच के लिए तैयार होता था। वर्ल्ड कप फाइनल में यह अलग था।’’

Sachin Tendulkar, Virender Sehwag, MS Dhoniसचिन तेंदुलकर उस मैच में 14 गेंद पर 18 रन बनाकर मलिंगा की गेंद पर आउट हुए थे। (सोर्स – सोशल मीडिया)

भारतीय टीम 2011 में दूसरी बार वर्ल्ड चैंपियन बनी थी। कपिलदेव के बाद महेंद्र सिंह धोनी टीम इंडिया के क्रिकेट इतिहास में ऐसे दूसरे कप्तान बने, जिन्हें वर्ल्ड कप की ट्रॉफी उठाने का मौका मिला। फाइनल में श्रीलंका के खिलाफ मिली जीत में तत्कालीन कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की पारी और उनके आखिरी छक्के को लोग हमेशा याद करते हैं, लेकिन ‘क्रिकेट के भगवान’ सचिन तेंदुलकर वहां होने के बाद भी उस ऐतिहासिक छक्के को नहीं देख सके थे। इसका खुलासा तेंदुलकर ने खुद एक इंटरव्यू में किया था।

तेंदुलकर ने आज तक न्यूज चैनल को एक इंटरव्यू दिया था। इसमें उन्होंने वर्ल्ड कप फाइनल के बारे में बात की थी। तेंदुलकर ने कहा था, ‘वर्ल्ड कप फाइनल के दौरान मैं ड्रेसिंग रूम था। दो विकेट गिर चुके हैं। मेरे साथ वीरू (वीरेंद्र सहवाग) था। पार्टनरशिप होने लगी थी। इसके बाद वीरू को मैंने कहा कि जो भी इस जगह से उठना नहीं है। क्रिकेट में सभी खिलाड़ियों को टोटके होते हैं, लेकिन कोई बताता नहीं है। मन में रखते हैं। जब वर्ल्ड कप फाइनल हो तो आपको उसे फॉलो करना ही चाहिए।’’ तेंदुलकर उस मैच में 14 गेंद पर 18 रन बनाकर आउट हुए थे।

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वर्ल्ड कप फाइनल से पहले नर्वस होने के सवाल पर सचिन ने कहा था, ‘‘नर्वस तो मैं हम मैच से पहले होता हूं। मुझे वो अनुभव अच्छा लगता था। इससे यह होता था कि मेरा शरीर उस मैच के लिए तैयार होता था। वर्ल्ड कप फाइनल में यह अलग था। मैंने महेंद्र सिंह धोनी का आखिरी छक्का नहीं देखा। मुझे लगता है सहवाग ने भी नहीं देखा था। मैंने उसे उठने ही नहीं दिया था। जब हमने शोर सुना तो पता चल गया कि हम जीत गए हैं। 130 करोड़ भारतीय जनता की तरह हम भी उसके बाद पागल हो रहे थे।’’

सचिन ने फाइनल खेलने पर कहा, ‘‘मेरे लिए वर्ल्ड कप कुछ अलग था। विराट कोहली का यह पहला वर्ल्ड कप था और मेरा छठा। पहला और छठा में अंतर होता है। दो बार हम करीब पहुंचे थे। 1996 में सेमीफाइनल और 2003 में फाइनल खेले थे। पास जाकर नहीं जीतने पर दुख होता है। फाइनल जीतने के बाद सबसे पहले मैंने भगवान को शुक्रिया कहा। इससे बढ़िया रिजल्ट कुछ नहीं हो सकता था। किसी भी क्रिकेटर के लाइफ में इससे बड़ा मेडल कुछ नहीं हो सकता।’’

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