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Rio Olympics 2016: भारत की झोली अब भी खाली, पदक की राह में हैं ये 5 रोड़े

भारत ने 1920 से अब तक ओलंपिक में केवल 24 पदक जीते हैं।

205 देशों के 10 हजार से ज्यादा खिलाड़ी Rio 2016 Olympics में हिस्सा ले रहे हैं।

ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में चल रहे ग्रीष्म ओलंपिक 2016 में भारत ने अपना अब तक का सबसे बड़ा दल भेजा है। भारत के कुल 119 खिलाड़ी रियो गए हैं लेकिन अभी से ऐसा लगने लगा है कि भारत अपने अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (2012 के लंदन ओलंपिक में जीते गए छह मेडल) तक पहुंच जाए तो भी गनीमत है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत प्रति व्यक्ति ओलंपिक पदक के मामले में दुनिया के सबसे फिसड्डी देशों में शुमार किया जाता है। ओलंपिक में भारत ने अब तक कुल नौ गोल्ड जीते हैं। इनमें से आठ गोल्ड उसे पुरुष हॉकी में मिले हैं। पुरुष हॉकी में भारत ने आखिरी बार 1980 के मॉस्को ओलंपिक में गोल्ड जीता था। उसके बाद भारत को गोल्ड के लिए 28 सालों का इंतजार करना पड़ा।

2008 के बीजिंग ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा ने 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग में देश को गोल्ड दिलाया। बीजिंग ओलंपिक में भारत ने एक गोल्ड और दो ब्रॉन्ज के साथ कुल तीन पदक जीते थे। ये भारत का ओलंपिक में अब तका दूसरा सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा है। 2012 के लंदन ओलंपिक में भारत ने दो सिल्वर और चार ब्रॉन्ज पदक जीते थे। ओलंपिक में भारत ने 1920 से लेकर 2012 तक केवल 24 पदक जीते हैं। ओलंपिक पदक जीतने के मामले में भारत छोटे यूरोपीय देशों और गरीब माने जाने वाले कई अफ्रीकी देशों से भी पीछे है। आखिर क्यों?

1- गरीबी

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी मानी जाती है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी भारत में रहती है। यूएन के अनुसार 2014 तक भारत में करीब 35 करोड़ 60 लाख लोग 10 से 24 वर्ष के बीच की उम्र के थे। इतनी बड़ी युवा आबादी के बावजूद भारत के ओलंपिक में खराब प्रदर्शन के पीछे सबसे बड़ी वजह आर्थिक संसाधनों का अभाव है। भले ही केंद्र सरकार और दुनिया की दूसरी बड़ी संस्थाएं भारत को दुनिया के सबसे तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाओं में एक बताए, खेल-कूद पर खर्च के मामले में वो दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में एक है। संसदीय पैनल की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा खेल पर किया जाने वाला कुल खर्च तीन पैसे प्रति व्यक्ति प्रति दिन है।

इतिहास में सबसे अधिक 2400 से ज्यादा ओलंपिक मेडल जीतने वाला अमेरिका खेलों पर प्रति व्यक्ति प्रति दिन 22 रुपये खर्च करता है। वहीं ब्रिटेन 50 पैसे प्रति व्यक्ति प्रति दिन और जमैका 19 पैसे प्रति व्यक्ति प्रति दिन खेलों पर खर्च करता है। अब हर आदमी पर हर रोज तीन पैसे खर्च करके कितने ओलंपिक मेडल लाए जा सकते हैं, ये सबके सामने है। वहीं कुछ लोग ये सवाल भी पूछते हैं कि कोई विकासशील देश केवल ओलंपिक मेडल जीतने के लिए क्यों पैसे खर्च करे, जबकि देश में बेरोजगारी, अशिक्षा और भूख जैसी चीजों के लिए पर्याप्त फंड नहीं है?

2- करियर का सवाल

विशेषज्ञों की मानें तो भारत में आज भी खेल अच्छा करियर नहीं है। पुरानी कहावत है, “पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे खराब।” शहरी तबके में विभिन्न खेलों को लेकर आई थोड़ी जागरुकता को छोड़ दें तो आज भी भारतीय माता-पिता बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस इत्यादि बनने का सपना देखते हैं। इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के प्रमुख नारायन रामचंद्रन ने हाल में मीडिया से कहा था, “भारत में खेल हमेशा ही शिक्षा से पीछे रहा है। ज्यादातर भारतीय परिवार अपने बच्चों को ओलंपियन बनाने के बजाय डेंटिस्ट या एकाउंटेंट बनाना पसंद करेंगे।”

जाहिर है भारतीय अभिभावकों की नजर में खेल में उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं है। ज्यादातर बच्चों को ये चिंता सताती है कि अगर बच्चे खेल में कुछ कर भी गए तो एक उम्र के बाद उनके लिए अपना परिवार चलाना मुश्किल होगा। राष्ट्रीय खेलों या कॉमनवेल्थ खेलों में पदक विजेता खिलाड़ियों के गरीबी-लाचारी के किस्से भारतीय मां-बाप के डर को और पुष्ट करते हैं।

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3- क्रिकेट की दबंगई

ओलंपिक में भारत के खराब प्रदर्शन के पीछे कुछ लोग क्रिकेट की अतिशय लोकप्रियता को भी एक वजह मानते हैं। रियो ओलंपिक के दौरान ही एक चीनी वेबसाइट ने “दूसरे खेलों की तुलना में क्रिकेट की लोकप्रियता, हॉकी की फीकी पड़ती चमक और ग्रामीण इलाकों में ओलंपिक के प्रति जागरुकता के अभाव” को ओलंपिक में भारत के खराब प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार कारणों में माना। इससे पहले भी कई भारतीय और विदेशी खेल विशेषज्ञ क्रिकेट को अन्य भारतीय खेलों की खराब हालात के लिए जिम्मेदार बता चुके हैं। बगैर किसी अतिश्योक्ति के कहा जा सकता है कि आज के भारत में क्रिकेट ही एक ऐसा खेल है जो देश के लगभग हर हिस्से में लोकप्रिय है। और जिसे लेकर भारतीय मां-बाप का नजरिया भी बदल है। वो अपने बच्चों को क्रिकेटर बनाने के प्रति उदार होने लगे हैं। लेकिन क्या क्रिकेट की लोकप्रियता की कीमत भारत को दूसरे खेलों की बलि देकर चुकानी पड़ेगी?

4- खेल संस्थाओं का रवैया

भारत कितना पैसा खेल पर खर्च करता है और कितने युवा खिलाड़ी बनना चाहते हैं जैसे सवाल अपनी जगह वाजिब हैं। लेकिन इन सवालों के बरक्स एक सवाल ये भी है कि भारत जितना पैसा खेलों पर खर्च करता है और जो लोग खिलाड़ी बनना चाहते हैं उसकी जमीनी हकीकत क्या है? अगर आप खेल से जुड़ी खबरें पढ़ते रहते हैं तो आप विभिन्न खेल संस्थाओं में भ्रष्टाचार, बदहाली नियमों की मनमानी व्याख्या और खिलाड़ियों की उपेक्षा के किस्से पढ़े होंगे। रियो ओलंपिक खुद भारत में खेल प्रशासन की हालत का उदाहरण बनता जा रहा है। भारतीय खेल मंत्रालय और खेल प्राधिकरणों के पदाधिकारियों को खिलाड़ियों से ज्यादा अपनी चिंता रहती है। भारतीय खेल मंत्री और उनके साथियों पर रियो ओलंपिक के आयोजनकर्ताओं ने अभद्र बरताव करने का आरोप लगाया है।

उससे पहले कुश्ती में नरसिंह यादव और सुशील कुमार का विवाद भी भारतीय खेल प्राधिकरण की हकीकत सामने लाता है। ओलंपिक में दो पदक (एक सिल्वर और एक ब्रॉन्ज) जीतने वाले सुशील कुमार को इस मामले में अदालत तक का दरवाजा खटखटाना पड़ा। इस पूरे विवाद की जड़ में था भारतीय कुश्ती संघ के नियमों में स्पष्टता का अभाव। इससे पहले 2010 में भारत में हुए कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान हुए कथित भ्रष्टाचार से देश की पूरी दुनिया में किरकिरी हुई थी। पहले से ही फंड की कमी से जूझ रहे भारतीय खिलाडि़यों को खेल संस्थानों के भ्रष्टाचार के कारण अत्याधुनिक तकनीकी और प्रशिक्षण मिलना लगभग नामुमकिन हो जाता है। जिसका असर ओलंपिक खेलों में दिखाई देता है।

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5- सामाजिक रुढि़यां

भारतीय खेलों के इतिहास पर किताब लिखने वाले प्रोफेसर रोनोजॉन सेन की मानें तो भारत में खेलों के खराब हालात के पीछे उसकी पारंपरिक सांस्कृतिक और जातिगत रूढ़ियां भी जिम्मेदार हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में पढ़ाने वाले प्रोफेसर सेन के के अनुसार भारतीय परंपरागत रूप से खुद एक एक व्यक्ति के बजाय अपनी जाति, कबीले या क्षेत्र के सदस्य के रूप में देखते हैं। अगर कोई भारतीय किसी खेल में अच्छा है तो भी उसे उसके परिवार या समुदाय द्वारा उसे हतोत्साहित किया जाता है। सामाजिक बंटवारे के चलते हर समुदाय अलग-अलग खेलता है। प्रोफेसर सेन ने बीबीसी से कहा था, “भारत में निचली जाति की बड़ी आबादी है और इस तबके में शिक्षा का अभाव है। शारीरिक पोषण और स्वास्थ्य के मामले में भी इस समुदाय की हालत खराब है।” इसलिए भारतीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेलों में हिस्सा ले नहीं पाता। उस तक खेल सुविधाओं की पहुंच ही नहीं है।

बहरहाल, अभी रियो ओलंपिक जारी है और भारतीय पुरुष हॉकी टीम के अलावा दीपा करमाकर (जिमनास्ट), साइना नेहवाल (बैडमिंटन), सानिया मिर्जा और रोहन बोपन्ना (टेनिस मिक्स्ड डबल), मनोज कुमार और विकास कृष्णन (मुक्केबाजी) और योगेश्वर दत्त और नरसिंह यादव (कुश्ती) से पदक की उम्मीद बाकी हैं।

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