20 सितंबर 1998 को अफगानिस्तान के नांगरहार प्रांत में जन्में राशिद खान आज दुनिया के जाने-माने क्रिकेटरों में शामिल हैं। उनकी पहचान खासतौर पर अपनी लेग स्पिन के लिए है, लेकिन क्रिकेट के शुरुआती दिनों में उन्हें खुद को एक बल्लेबाज के रूप में भी साबित करने का भरोसा था। दिलचस्प यह है कि जिस अंडर-19 ट्रायल से उन्हें अफगानिस्तान क्रिकेट की नई प्रतिभाओं की तलाश के दौरान चुना जाना था, उसमें वह चुने भी नहीं गए थे।
राशिद खान ने उस ओपन ट्रायल में बल्लेबाज के रूप में 3-4 गेंदें ही खेली थीं। दो गेंदों पर उन्होंने शॉट लगाए और बाकी गेंदें चूक गए। कोच ने उनसे कहा, ‘‘बस इतना ही, आने के लिए धन्यवाद।’’ शायद तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि जिसे वापस भेजा गया है, वह भविष्य में अफगानिस्तान क्रिकेट का सबसे बड़ा नाम बनने वालों में शामिल होगा। राशिद खान के शुरुआती सफर की कहानी बताती है कि यह जरूरी नहीं कि प्रतिभा को हमेशा पहली नजर में पहचान लिया जाए। जनसत्ता के खेलनामा की किताबगाथा में हम राशिद खान के शुरुआती सफर की बात करेंगे।
नांगरहार से पेशावर तक का सफर
राशिद का जन्म नांगरहार के अचिन जिले के पिखी खेर गांव में हुआ। उनका परिवार अफगानिस्तान में लंबे समय से जारी संघर्ष और असुरक्षा के बीच पाकिस्तान के पेशावर चला गया था। राशिद खान: फ्राम स्ट्रीट्स टू स्टारडम में जफर हांड लिखते हैं कि राशिद खान ने एक बातचीत में अपने परिवार के पेशावर जाने की वजह बताते हुए कहा था कि उनके चाचा की मृत्यु के बाद घर पर रात में कुछ हथियारबंद लोगों ने हमला कर दिया था।
परिवार के कई लोग घायल हुए। इसके बाद उनके पिता ने तय किया कि वहां रहना सुरक्षित नहीं है। राशिद माता-पिता के साथ पेशावर चले गए। उनके कुछ बड़े भाई पहले ही वहां रह रहे थे। यही पेशावर आगे चलकर उनके क्रिकेट जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
क्रिकेट अकादमी नहीं, भाइयों से सीखा खेल
राशिद की क्रिकेट की शुरुआती शिक्षा किसी बड़ी क्रिकेट अकादमी में नहीं हुई। उन्होंने क्रिकेट घर, मोहल्ले और अपने भाइयों से सीखा। राशिद खान के परिवार में क्रिकेट का माहौल था। राशिद खान छह भाई और चार बहनें हैं। राशिद खान के कई बड़े भाई क्रिकेट खेलते थे और उनमें भी गेंदबाजी की अच्छी प्रतिभा थी। राशिद बचपन में उन्हें खेलते हुए देखते थे और धीरे-धीरे खुद भी उनके साथ खेलने लगे।
राशिद खान को शुरुआत में टीम में खिलाड़ी के तौर पर ज्यादा महत्व नहीं मिलता था। वह सबसे छोटे थे, इसलिए कई बार उन्हें सिर्फ 12वें खिलाड़ी की भूमिका मिलती थी। वह भाइयों की क्रिकेट किट संभालते, मैच देखते और उनके साथ रहते, लेकिन यही माहौल उनके लिए अनौपचारिक क्रिकेट अकादमी बन गया।
राशिद खान ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया था कि उनके भाई घर के अंदर, पिछवाड़े और बाहर क्रिकेट खेलते थे। वह पहले सिर्फ उन्हें देखते थे और उनकी क्रिकेट किट के लिए मदद करते थे। बाद में उन्हें भी बल्ला और गेंद लेकर खेलने का मौका मिलने लगा। यहीं से उन्होंने खेल को समझना और अपनी शैली विकसित करना शुरू किया।
पेशावर ने निखारी प्रतिभा
पेशावर में स्कूलों और गलियों में क्रिकेट खेलना आम बात थी। राशिद खान भी अपने भाइयों, पड़ोसियों और स्कूल के दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने लगे। बड़े भाइयों के साथ लगातार खेलने का एक फायदा यह हुआ कि उन्हें कम उम्र में ही बड़े और बेहतर खिलाड़ियों के खिलाफ खेलने का मौका मिला। किसी औपचारिक अकादमी की ट्रेनिंग के बजाय खेलते-खेलते उनकी क्रिकेट की समझ विकसित होती गई।
राशिद खान के भाई आमिर में भी अच्छी गेंदबाजी प्रतिभा थी। परिवार के दूसरे सदस्यों में भी क्रिकेट का शौक था, लेकिन किसी ने पेशेवर क्रिकेट को करियर नहीं बनाया। राशिद खान ही वह नाम बने, जिन्होंने इस प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।
जब राशिद को बल्लेबाज या गेंदबाज में से एक चुनना पड़ा
साल 2016 अंडर-19 विश्व कप की तैयारी के दौरान अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने नई प्रतिभाओं की तलाश के लिए ओपन ट्रायल आयोजित किया। नांगरहार के गाजी अमानुल्लाह खान क्रिकेट स्टेडियम में आयोजित इस ट्रायल में बड़ी संख्या में युवा क्रिकेटर पहुंचे थे।
राशिद खान भी दोस्तों की सलाह पर वहां पहुंचे। वह घरेलू क्रिकेट में खेल चुके थे, लेकिन उनके मुकाबले बहुत कम लोगों ने देखे थे। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि क्या उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का पर्याप्त मौका मिलेगा। ओपन ट्रायल में खिलाड़ियों से कुछ सामान्य सवाल पूछे जा रहे थे। जैसे- पहचान पत्र है या नहीं, उम्र कितनी है और बल्लेबाज हैं या गेंदबाज?
जब राशिद की बारी आई तो कोच ने उनसे पूछा, बल्लेबाज हैं या गेंदबाज? राशिद खान ने जवाब दिया, मैं ऑलराउंडर हूं। कोच ने कहा कि उन्हें एक भूमिका चुननी होगी। राशिद बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों करना चाहते थे, लेकिन उन्हें इनमें से एक को चुनना पड़ा। दोस्तों से सलाह लेने के बाद राशिद खान ने बल्लेबाजी को चुना।
इसके बाद राशिद खान को तीन या चार गेंदें खेलने को मिलीं। उन्होंने दो गेंदों पर शॉट लगाए और बाकी गेंदें चूक गए। इसके बाद कोच ने उनसे कहा कि उनका ट्रायल खत्म हो गया है। जिस लड़के के लिए यह दिन अपने क्रिकेट करियर को बदलने का मौका था, वह उस दिन चयनित नहीं हुआ।
जिस ट्रायल में नहीं चुने गए, वहीं से आगे बढ़ी कहानी
राशिद खान के लिए वह ट्रायल निराशाजनक जरूर रहा होगा, लेकिन उनका क्रिकेट सफर वहीं खत्म नहीं हुआ। इसके उलट, उन्होंने आगामी वर्षों में न सिर्फ अफगानिस्तान की राष्ट्रीय टीम में जगह बनाई बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अलग पहचान स्थापित की।
इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि राशिद खान की प्रतिभा किसी एक ट्रायल में दिखाई देने वाली चीज नहीं थी। वह वर्षों से घर और मोहल्ले में क्रिकेट सीख रहे थे। भाइयों के साथ खेलते हुए उन्होंने गेंद और बल्ले के साथ समय बिताया था और धीरे-धीरे अपना खेल विकसित किया था।
अफगानिस्तान में क्रिकेट की नई पहचान
राशिद के क्रिकेटर बनने की कहानी अफगानिस्तान में क्रिकेट के विकास से भी जुड़ी हुई है। अफगानिस्तान में क्रिकेट का इतिहास बहुत पुराना बताया जाता है, लेकिन आधुनिक दौर में इस खेल को नई पहचान पाकिस्तान में रहने वाले अफगान शरणार्थियों के बीच मिली। 1990 के दशक में बड़ी संख्या में अफगान पाकिस्तान से अपने देश लौटे। इनमें ऐसे लोग भी थे जो पेशावर में क्रिकेट से जुड़े थे और अपने साथ इस खेल की संस्कृति लेकर लौटे।
अफगानिस्तान क्रिकेट फेडरेशन की स्थापना 1995 में हुई। बाद में 2 जून 2009 को इसे बोर्ड का दर्जा मिला और यह अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड के रूप में जाना जाने लगा। अफगानिस्तान को 2008 में आईसीसी की संबद्ध सदस्यता मिली और 2017 में पूर्ण सदस्य का दर्जा हासिल हुआ। इसी बदलाव के दौर में राशिद खान जैसे खिलाड़ियों ने अफगानिस्तान को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में नई पहचान दिलाई।
गलियों से दुनिया के क्रिकेट मैदान तक
राशिद खान की कहानी में एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ उनका बचपन संघर्ष और असुरक्षा के माहौल में गुजरा, परिवार को घर छोड़कर दूसरे देश जाना पड़ा और क्रिकेट सीखने के लिए उन्हें किसी बड़ी अकादमी का सहारा नहीं मिला। दूसरी तरफ, घर के भीतर भाइयों के साथ खेलते हुए उन्हें लगातार क्रिकेट का माहौल मिलता रहा। वही माहौल धीरे-धीरे उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।
राशिद खान की इस बात की याद दिलाती है कि किसी खिलाड़ी की असली क्षमता को हमेशा एक मौके, कुछ गेंदों या कुछ मिनटों में नहीं आंका जा सकता। कभी-कभी प्रतिभा को अपनी पहचान बनाने के लिए सिर्फ एक और मौके की जरूरत होती है। राशिद खान को वह मौका मिला और उन्होंने उसे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सबसे बड़े मंचों तक पहुंचा दिया।
‘मैं मुस्लिम हूं, बाकी हिंदू’, जब सलीम दुर्रानी की बात सुन टाइगर पटौदी ने दी थी जान से मारने की ‘धमकी’
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