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‘लड़का बहुत बहादुर है’, यह सुन-सुनकर कैंसर को दी मात; अब रणजी ट्रॉफी के डेब्यू मैच में ही कमल कनियाल ने जड़ दिया शतक

कमल दोबारा क्रिकेट खेलेंगे या नहीं, यह उनके दिमाग में नहीं था। उनके पिता सेना से हवलदार के पद से रिटायर हुए हैं। उन्होंने अपने युवा बेटे को हमेशा सांत्वना दी। उन्होंने कमल को कभी भी पैनिक नहीं होने दिया। कमल ने बताया, ‘डॉक्टर ने कहा था कि ठीक होने की संभावना अधिक है।’

Author Edited By आलोक श्रीवास्तव नई दिल्ली | Updated: February 14, 2020 12:49 PM
कमल कनियाल (सोर्स- फेसुबक पेज)

कमल कनियाल (Kamal Kaniyal) को वह दिन आज भी याद है जब वे खून की जांच के लिए गए थे और डॉक्टर ने उनके पिता उमेश को आगे के इलाज के लिए नोएडा के अस्पताल में ले जाने की सलाह दी थी। उन्हें डॉक्टर के साथ पिता की हुई पूरी बातचीत याद नहीं है। उन्होंने सुना था कि उनकी प्लेटलेट्स कम हो रही हैं और उन्हें इलाज के लिए उत्तर प्रदेश के इस शहर जाना होगा। वे तब 15 साल के थे। उनके टेस्ट किए गए। जब रिपोर्ट आई तो पता चला कि वे ल्यूकेमिया यानी ब्लड कैंसर से पीड़ित हैं।

हालांकि, कमल के लिए यह सब अब अतीत है। वे इस बीमारी को पूरी तरह से मात दे चुके हैं। गुरुवार को उन्होंने कनियाल ने रणजी ट्रॉफी (Ranji Trophy 2019-20) में महाराष्ट्र (Maharashtra) के खिलाफ उत्तराखंड (Uttarakhand) के लिए डेब्यू किया। बारामती (Baramati) के भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर स्टेडियम (Bharat Ratna Dr Babasaheb Ambedkar Stadium) में खेले गए इस मैच में कनियाल ने 160 गेंदों पर 101 रन बनाए। उन्होंने अपनी पारी में 17 चौके लगाए।

हमारे सहयोगी समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कनियाल ने उन दिनों को याद किया। उन्होंने बताया, ‘वह सेकंड स्टेज थी। मुझे बताया गया था कि इससे मेरे शरीर का 47% हिस्सा प्रभावित है।’ कमल का चयन यूपी (उत्तर प्रदेश) अंडर-14 के लिए चुने गए 40 और अंडर-16 के लिए चुने गए 60 खिलाड़ियों में हो चुका था, लेकिन वे फाइनल स्क्वाड में जगह नहीं बना पाए थे। लेकिन कैंसर का मतलब था नैनीताल के पास हल्द्वानी का रहने वाला यह लड़का, अगले साल कुछ नहीं कर पाएगा।

तीन साल पहले, जब तक लोढ़ा समिति की सिफारिश नहीं लागू हुईं थीं और उत्तराखंड एसोसिएशन को पूर्ण सदस्यता सौंपी गई, उत्तराखंड स्थायी सदस्य नहीं था। इसने स्थानीय क्रिकेटरों के लिए भी द्वार खोल दिए और इसका मतलब था कि वे अब उत्तर प्रदेश की दया पर नहीं थे, जिन्होंने हमेशा उन्हें एक ठंडा कंधा दिया।

हालांकि, युवराज सिंह की तरह हल्द्वानी का युवा भी भी कैंसर से लड़ा और अपनी वापसी की पटकथा लिखी। कमल ने अंडर -19 के नौ मैचों में एक दोहरे शतक, दो शतक और 3 अर्धशतक के मदद से 800 रन बनाए। इसके बाद उन्हें रणजी ट्रॉफी के लिए उत्तराखंड की टीम चुना गया। पुराने दिनों को याद करते हुए, कनियाल ने कहा कि उन्होंने कभी उम्मीद नहीं खोई। उन्हें विश्वास था कि वे इस बीमारी को हरा देंगे।

वे दोबारा क्रिकेट खेलेंगे या नहीं, यह उनके दिमाग में नहीं था। उनके पिता सेना से हवलदार के पद से रिटायर हुए हैं। उन्होंने अपने युवा बेटे को सांत्वना दी। उन्होंने कमल को कभी भी पैनिक नहीं होने दिया। कमल ने बताया, ‘डॉक्टर ने कहा था कि ठीक होने की संभावना अधिक है। डॉक्टर का कहना था कि इस उम्र में शरीर जल्दी ठीक हो जाता है। मैं कीमोथेरेपी के पांच दौर से गुजरा। मुझे नहीं पता था कि इसका क्या मतलब है। मेरे आसपास पॉजिटिव लोग थे। उन्होंने मुझे हमेशा प्रेरित किया और खुश रखा। मेरा परिवार कहता था कि मैं एक टाइगर हूं, ‘लड़का बहुत ही बहादुर है’, बस ये लाइन सुनकर जोश आ जाता था।’

छह महीने के इलाज के बाद डॉक्टरों ने कहा कि वह ठीक है, लेकिन घर पर सावधानी बरतनी पड़ेगी। कमल को पूरी तरह से ठीक होने में लगभग एक साल लग गया। जब उन्होंने कैंसर को हरा दिया, तो सबसे पहले फिर से मैदान का रुख किया। कमल और उनका परिवार शायद ही कभी अपनी इस परेशानी को सार्वजनिक किया हो, जिसे वे अपने जीवन का सबसे काला अध्याय मानते हैं।

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