पैरालंपिक : नया इतिहास बनाने की ओर भारतीय पैरा एथलीट

तोक्यो ओलंपिक में खिलाड़ियों ने एक स्वर्ण सहित सात पदक भारत की झोली में डाल कर इतिहास रचा।

(ऊपर) अवनि लखेरा, सुमित अंतिल, देवेंद्र झाझड़िया। फाइल फोटो।

आत्माराम भाटी

तोक्यो ओलंपिक में खिलाड़ियों ने एक स्वर्ण सहित सात पदक भारत की झोली में डाल कर इतिहास रचा। इसी राह पर अब देश के पैरा एथलीट चल पड़े हैं। उन्होंने पैरालंपिक में दो स्वर्ण सहित कुल 10 पदक जीत लिए हैं। इससे उन्होंने 2016 में रियो पैरालंपिक में जीते अब तक के सबसे ज्यादा चार पदक के बेहतरीन प्रदर्शन को पीछे छोड़ा और नया इतिहास बनाया।

तोक्यो पैरालंपिक में भारत के लिए 29 अगस्त का दिन खास रहा। सुबह-सवेरे ही भारत की महिला पैरा टेबल टेनिस खिलाड़ी भाविनाबेन पटेल ने रजत पदक जीत कर खाता खोला। दिन की दूसरी खुशी तब आई जब ऊंची कूद में निषाद कुमार ने भी रजत पदक जीता। गुजरात के मेहसाणा जिले के वडनगर गांव की 34 साल की पैरा टेबल-टेनिस खिलाड़ी भाविनाबेन पटेल जब 2016 में रियो में नहीं खेल सकी तो पूरी रात सो नहीं पाई थीं।

उन्होंने निर्णय किया था कि वो अब दोबारा रैकेट नहीं उठाएंगी। हालांकि वह खेल में लौटीं और देश को पदक से सम्मानित किया। भाविनाबेन पटेल भारत की पहली महिला पैरा पैडलर हैं जिन्होंने टेबल टेनिस में रजत पदक जीता है। देश की रियो 2016 में रजत पदक जीतने वाली दीपा मलिक के बाद वह दूसरी महिला पैरा खिलाड़ी हैं।

पैरालंपिक का दूसरा रजत पदक 21 साल के निषाद कुमार के नाम रहा। उन्होंने ऊंची कूद के टी-47 वर्ग में अपने पहले प्रयास में 2.02 मीटर की छलांग लगाने के बाद अपने दूसरे प्रयास में 2.06 मीटर की छलांग के साथ रजत पदक अपने नाम किया। खेत में घास काटने वाली मशीन में हाथ कट जाने से दिव्यांग हुए निषाद का यहां तक का सफर आसान नहीं रहा। उनके पिता ने उनके लिए काफी संघर्ष किया और निषाद उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे।

भारतीय खेलप्रेमियों के लिए पैरालंपिक में सबसे बड़ा दिन जयपुर की 19 साल की पैरा निशानेबाज अवनि लखेरा लेकर आर्इं। उन्होंने 10 मीटर एअर राइफल में क्लास एसएच1 वर्ग में अपने सटीक निशानों से 249.6 अंक का स्कोर बनाकर नया पैरालंपिक रेकॉर्ड बनाने का साथ विश्व रेकॉर्ड की बराबरी करते हुए स्वर्ण अपने नाम किया। अवनि ने चीन की झांग कुइपिंग को दूसरे और युक्रेन की इरियाना को तीसरे स्थान पर धकेल कर पैरालंपिक इतिहास में निशानेबाजी में स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला होने का गौरव हासिल किया।

खास बात यह है कि सुमित पहले पहलवान थे। एक दुर्घटना में उनका बांया पैर बूरी तरह से कुचल गया और पहलवानी से उनको दूर होना पड़ा। हालांकि वे खेल से दूर नहीं होना चाहते थे इसलिए वे शॉटपुटर वीरेंद्र धनखड़ से मिले जिन्होंने सुमित को भाला फेंक प्रशिक्षक नवल सिंह से मिलवाया। यहीं से सुमित ने भाला फेंक की तैयारी शुरू कर दी।

पैरालंपिक के सातवें दिन दिल्ली के 24 साल के योगेश कथूनिया ने एफ 56 वर्ग में चक्का फेंक स्पर्धा में रजत पदक जीता। योगेश 16 साल पहले लकवा ग्रस्त हो गए थे, लेकिन कुछ अलग करने की चाहत में मैदान में उतर गए। चौथा रजत दो बार के स्वर्ण विजेता राजस्थान के चुरू जिले के भाला फेंक एथलीट देवेंद्र झाझड़िया ने दिलाया। देवेंद्र 2004 व 2016 पैरालंपिक में स्वर्ण जीत चुके हैं। उनसे उम्मीद थी कि वे इस बार स्वर्ण पदक की हैट्रिक पूरी करेंगे लेकिन एफ 46 वर्ग की भाला फेंक स्पर्धा में वे अधिकतक अपने तीसरे प्रयास में 64.35 मीटर ही भाला फेंक पाए।

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