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जब हिटलर के सामने भारतीयों ने खेली कबड्डी, देखने पहुंची भीड़ को कंट्रोल करने के लिए बुलानी पड़ी पुलिस

1936 में अमरावती के जाने-माने क्लब हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल (एचवीपीएम) ने लगभग 30 खिलाड़ियों को बर्लिन की यात्रा के लिए भेजा। इन खिलाड़ियों को कबड्डी, मल्लखम्भ और दूसरे पारंपरिक भारतीय खेलों का प्रदर्शन करना था, जो ओलंपिक खेलों का हिस्सा नहीं थे।

Author Updated: July 22, 2019 3:02 PM
एडोल्फ हिटलर। (Photo Courtesy: Youtube)

प्रो कबड्डी लीग का सातवां सीजन शुरू हो चुका है। इस टूर्नामेंट में 12 टीमें एक-दूसरे के खिलाफ दो-दो बार भिड़ेगी। जिसके बाद टॉप 6 में रहने वाली टीमें आगे के लिए क्वॉलिफायर में प्रवेश करेंगी। इसमें काफी संख्या में विदेशी खिलाड़ियों ने भी हिस्सा लिया है। पिछले साल बेंगलुरु बुल्स के सिर पर प्रो कबड्डी का ताज सजा था। क्लब स्तर पर कबड्डी खेलने की बात करें तो अमरावती का नाम सामने आता है। 1936 में बर्लिन ओलंपिक के समय इसी शहर के एक छोटे से क्लब ने जर्मनी के तत्कालीन शासक एडोल्फ हिटलर के सामने कबड्डी खेली थी। आज भले ही कबड्डी मिट्टी से आकर मैट पर आ गई हो, लेकिन इससे होने वाले फायदों में शायद ही कोई कमी आई हो। राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी भी इस खेल के फायदों को लेकर एक लेख लिख चुके हैं। लेखक विवेक चौधरी की किताब ‘‘कबड्डी बाई नेचर’’ में कुछ ऐसे ही दिलचस्प किस्से हैं।

किताब में इस बात का भी जिक्र है कि कैसे गांव का खेल माने जाने वाले कबड्डी ने शहरों में अपनी पहचान बनाई और मिट्टी के मैदान पर खेले जाने वाला यह खेल इनडोर वातानुकूलित स्टेडियम तक पहुंचा। इसके दर्शकों में बड़े व्यपारियों के साथ बालीवुड के सितारें भी शामिल हैं। भारतीय खेलों में खिलाड़ियों की नीलामी की बात करें तो क्रिकेट के बाद सबसे ज्यादा करोड़पति इस खेल से ही बने हैं।

किताब में बताया गया है कि 1936 में अमरावती के जाने-माने क्लब हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल (एचवीपीएम) ने लगभग 30 खिलाड़ियों को बर्लिन की यात्रा के लिए भेजा। इन खिलाड़ियों को कबड्डी, मल्लखम्भ और दूसरे पारंपरिक भारतीय खेलों का प्रदर्शन करना था, जो ओलंपिक खेलों का हिस्सा नहीं थे। इस दौरे पर टीम के साथ पत्रकार वीबी कप्तान भी गये थे। यह दौरा एचवीपीएम के उपाध्यक्ष सिद्धांत काने की पहल से संभव हुआ था जो भारतीय खेलों से दुनिया को रूबरू करवाना चाहते थे।

किताब के मुताबिक, ‘‘शहर के विश्वविद्यालय मैदान पर 40 मिनट का मैच खेला गया जिसमें बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचे। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि पहले मैच के खत्म होने के बाद तुरंत दूसरा और फिर तीसरा मैच खेला गया। व्यवस्था को सुचारू बनाये रखने के लिए वहां मौजूद सुरक्षार्किमयों को मैदान के आस पास लगाया गया था। दर्शकों की बड़ी संख्या के कारण कैमरामैन और इस खेल की रिकॉर्डिेंग करने वालों को भी कैमरा लगाने के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।’’

इस मैच के बाद हिटलर काने से मिले और उन्हें ‘हिटलर मेडल’ भी दिया जिसके प्रशस्ति पत्र पर लिखा था, ‘‘यह पदक 1936 में बर्लिन ओलंपिक में दी गयी सेवा के लिए दिया जा रहा है। यह सम्मान काने को दिया जा रहा है।’’ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दिसंबर 1926 में जब अमरावती पहुंचे तो वह यहां के युवाओं को कबड्डी खेलते देख काफी प्रभावित हुए। वह इस बात को लेकर काफी खुश थे कि जाति का बंधन तोड़ युवा ना सिर्फ इस खेल का लुत्फ उठा रहे थे बल्कि वे साथ में खाना भी खा रहे थे।

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