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खेलना बच्चों का खेल नहीं, जुनून हो: मीनाक्षी

भारत के लिए दसवें एशिया पैसिफिक एक्वेटिक मीट में पदक हासिल करने वाली पाहूजा ने अगले ओलंपिक की तैयारियों में लगे कोच और खिलाड़ियों से फिटनेस के अलावा वैज्ञानिक और तकनीक के सहारे आगे बढ़ने की सलाह दी।

Author Published on: September 21, 2017 3:21 AM
एक रिसर्च में सामने आया है कि लगातार पानी में फ्लोटिंग करने से क्रोनिक स्ट्रेस की दिक्कत दूर हो जाती है।

संदीप भूषण 

यो ओलंपिक से सबक लेकर 2020 में होने वाले तोक्यो ओलंपिक की तैयारी में खेल मंत्रालय लगातार काम कर रहा है। इसके लिए अलग से अभिनव बिंद्रा की देखरेख में टारगेट ओलंपिक पोडियम योजना पर काम किया जा रहा है। इन सब के बाद भी एक संशय बरकरार है कि क्या ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन में जारी गिरावट 2020 तक सुधार सकती है? कई पूर्व खिलाड़ियों का मानना है कि हमें सिर्फ खिलाड़ियों के फिटनेस पर ही नहीं, बल्कि कई अन्य पहलुओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है। भारत की जलपरी कही जाने वाली मीनाक्षी पाहूजा का भी यही मानना है। वह कहती हैं कि खेलना कोई बच्चों का खेल नहीं है, यह जुनून होना चाहिए। और इसके लिए जरूरी है कि स्टेडियम चौबीस घंटे खुले रहें। खेल का मतलब सिर्फ प्रतियोगिता नहीं है। यह हमारे समाज को स्वस्थ्य बनाने में भी सहायक है, इसलिए सरकार को चौबीस घंटे स्टेडियम को चलाने की व्यवस्था करनी चाहिए। इससे ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ी समय की पाबंदियों से मुक्त होकर अपनी प्रैक्टिस कर सकेंगे।

भारत के लिए दसवें एशिया पैसिफिक एक्वेटिक मीट में पदक हासिल करने वाली पाहूजा ने अगले ओलंपिक की तैयारियों में लगे कोच और खिलाड़ियों से फिटनेस के अलावा वैज्ञानिक और तकनीक के सहारे आगे बढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि आज दुनिया के जितने भी देश खेल में आगे हैं उन्होंने खिलाड़ियों के अभ्यास में वैज्ञानिक पहलुओं का इस्तेमाल किया है। रियो में तैराकी के लिए सबसे ज्यादा पदक झटकने वाले अमेरिकी तैराक माइकल फ्लेप्स का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी विदेशी एथलीट लगातार अपने प्रदर्शन में सुधार कर रहा है तो इसका श्रेय सिर्फ तकनीक को ही जाता है।
2013 के लिम्का बुक आॅफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाली दिल्ली की इस तैराक ने कहा कि हमारा देश वैज्ञनिक ढांचे से खेल की पढ़ाई और खिलाड़ियों को तैयार करने के मामले में बहुत पीछे है। उन्होंने विदेशी तैराकों के बार में बताते हुए कहा कि किसी भी टूर्नामेंट की तैयारी से पहले उनके कोच कई महत्त्वपूर्ण तकनीकी जानकारी उनके साथ साझा करते हैं, लेकिन भारत में शायद यह नहीं होता।

भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के प्रयास और इनकी इकाइयों की कार्य प्रणाली में तकनीक को कितना महत्त्व दिया जाता है, इस सवाल पर पाहूजा ने कहा कि इन्होंने जो प्रयास किया है वह सराहनीय है लेकिन हम यहीं नहीं रुक सकते। अगर पदक तालिका में शीर्ष स्थान पाना है तो हमें उन देशों से सीखना होगा जिन्होंने खेल को एक अत्याधुनिक कारखानों की तरह हर पहलू से दुरुस्त रखा है। उन्होंने भारतीय तैराकी के बारे में कहा कि यहां अभी भी युवा प्रतिभाओं को उनकी गलतियों के बारे में सिखाने के लिए सिनेमेटोग्राफी की सुविधा नहीं है। सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे एलीट खिलाड़ियों की वीडियोग्राफी हो और जूनियर खिलाड़ी उसे देखें और सीखें।

नौकरी के लिए पदक की चाह
मीनाक्षी ने माना कि आज के ज्यादातर खिलाड़ी केवल नौकरी की चाह में खेल की दुनिया में कदम रखते हैं। उन्होंने इसके लिए समाज और सरकार को जिम्मेदार बताते हुए कहा कि इससे बचने के लिए देश में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने की जरूरत है। साथ ही खेल से संन्यास ले चुके खिलाड़ियों को कोचिंग में लाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि खेल को लेकर देश में जागरूकता की आवश्यकता है। हमारे समाज में जब कोई लड़की खिलाड़ी बनना चाहती है तो उसे कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। जब सबसे लड़कर वह कुछ हासिल करती है तो उसके माता-पिता यही कहते हैं कि या तो सरकार नौकरी दे या फिर जो पैसे तुमने कमाए हैं उससे शादी कर लो। यह इसलिए है कि उन्हें लगता है खेल का कोई भविष्य नहीं है। उन्होंने कहा कि एक खिलाड़ी मुश्किल से चालीस साल में संन्यास ले लेता है। अब सवाल है कि अगर इस हालत में उसके पास कमाई का कोई जरिया न हो तो वो क्या करेगा। और शायद इसी का परिणाम है कि अखबारों में रोज यह खबरें होती हैं कि देश के लिए सम्मान बटोरने वाला अपनी जीविका चलाने के लिए पदक बेचने को मजबूर है।

भारत की जलपरी के नाम से मशहूर मीनाक्षी पाहूजा दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में सहायक प्रोफेसर हैं। बचपन से ही पानी को घर मानने वाली पाहूजा ने महज तीन साल की उम्र में राज्यस्तर और नौ की उम्र में राष्ट्रीय पदक अपने नाम किया। 1987 से 2001 तक लगातार चौदह साल राष्ट्रीयस्तर पर कई टूर्नामेंटों में पदक जीतते रहने के बाद 2006 में बतौर तैराक स्वीमिंग पूल से बाहर समुद्र में तैरना शुरू किया। पिता वीके पाहूजा को कोच और आदर्श मानने वाली इस तैराक ने 2010 में 5 दिन में 5 झील का सफर तय कर रेकार्ड बनाया। इन्होंने 1996 दसवें एशिया फैसिफिक एज ग्रुप एक्वेटिक मीट में कांस्य पदक जीता। अभी हाल ही में ऐरोजोना (अमेरिका) में एससीएआर तैराकी चैलेंज में सफलता हासिल कर देश का गौरव बढ़ाया।

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