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रग्बी में तीसरी बार विश्व विजेता बना दक्षिण अफ्रीका

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति का विवादित इतिहास रहा है और जिनके अवशेष अभी भी बचे हुए है।

Author Published on: November 14, 2019 3:34 AM
कोलिसी दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत कप्तान हैं जिन्होंने रग्बी विश्व कप जीता है।

दक्षिण अफ्रीकी सबसे अधिक किसी खेल से मोहब्बत करते हैं तो वह रग्बी से। वे रग्बी के हर छोटे टूर्नामेंट तक में अपने देश की जीतते देखना चाहते हैं। इस बार तो दक्षिण अफ्रीका रग्बी में विश्व विजेता बन गया। दक्षिण अफ्रीका के लिए यह खुशी पहली बार नहीं आई है बल्कि वह तीसरी बार विश्व विजेता बना है। इससे पहले 1995 और 2007 में विश्व खिताब जीता था। इस बार चैंपियन बनने में जिन्होंने मुख्य भूमिका निभाई है वे टीम के अश्वेत कप्तान सिया कोलिसी है। कोलिसी दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत कप्तान हैं जिन्होंने रग्बी विश्व कप जीता है।

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति का विवादित इतिहास रहा है और जिनके अवशेष अभी भी बचे हुए है। ऐसे में यदि किसी अश्वेत कप्तान के नेतृत्व मे टीम विश्व चैंपियन बनती है तो यह जीत खास बन जाती है। कोलिसी को एक अश्वेत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए हालांकि एक अश्वेत की इस काम्याबी से दक्षिण अफ्रीका में पूरी अश्वेत बिरादरी को एक ताकत मिलेगी। सिया कोलिसी के लिए तो खेलना भी दूर की बात थी। उनके मां बापइतने गरीब थे कि उनके पास सिया को पालने के लिए भी पैसे नहीं थे। मां बाप ने सिया को उनकी दादी के पास छोड़ दिया जहां उन्होंने रग्बी खेलना शुरू किया।

खेल पर उनकी बचपन से गजब की पकड़ थी। उनकी रफ्तार और खेल की तकनीक देखकर हर कोई उसकी तारीफ करता। वे पहली बार कोई टूर्नामेंट खेलने किसी मैदान में उतरे तो उनके पास किट के लिए पैसे नहीं थे। उन्होंनेमैच के दौरान बॉक्सर के शॉर्टस पहने हुए थे। उनके खेल को देखते हुए उनकी टीम को उन्हें खिलाना पड़ा। वे अपने खेल के बूते आगे बढ़ता रहे परन्तु कुछ सालों में ही उनकी मां और दादी का निधन हो गया। उसके बाद उनके लिए अपने खेल को जारी रखना मुश्किल हो गया था। उनके पास आजीविका का संकट खड़ा हो गया।

ऐसे में किसी के लिए खेल को जारी रखना कितना मुश्ेिकल काम हो सकता हैै। फिर भी उन्होंने अपने आपको मानसिक रूप सेमजबूत किया और खेल को जारी रखा। उनका खेल इतना अद्भुत था कि उन्हें एक के बाद एक सफलताएं मिलती गईं। कोलिसी की खेल पर अच्छी पकड़ है। वे मैदान में पूरीतरह से चौकन्ना रहते हैं। वे फ्लेंकर की पोजीशन में खेलते हैं। उनकी इस प्रतिभा को चयनकर्ताओं ने पहचाना और उन्हें दक्षिण अफ्रीकी टीम का कप्तान बना दिया गया। उन्हें खिलाड़ी के तौर पर कोई बड़ा अनुभव नहीं था।

उन्होंने अभी तक मात्र 58 मैच ही खेले थे। दरअसल यह जिम्मेदारी उसकी खेल की समझ को देखकर सौंपी गई। और उन्होंने बेहतर ढंग से अपनी टीम का नेतृत्व किया। फाइनल में इंग्लैंड के विरुद्ध मैच खेलने से पहले सभी खिलाड़ियों को कहा किहमारे पास अगले 80 मिनट हैं और इसमें हमें एकजुट होकर सामजंस्य के साथ खेलना है। इस दौरान हम से बेहतर कोई नहीं है। इस मंत्र के सब कायल हो गए।

कोलिसी ने टीम के खिलाड़ियों का इस तरह से मनोबल बढ़ाया कि टीम के खिलाड़ियों पर किसी भी प्रकार का कोई दबाव नहीं रहा। वैसे टीम के कोच रेसी एरामस भी कहते हैं कि हमारे लिए रग्बी में किसी भी प्रकार का दबाव नहीं रहता है। लोगों का समर्थन हमारे लिए सबसे बड़ी उम्मीद है। इस मंत्र के सहारे दक्षिण अफ्रीका ने फाइनल में इंग्लैंड को 32-12 से हराकर तीसरी बार विश्व खिताब जीत लिया।

मनीष कुमार जोशी

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