हौसले के आगे बड़ी से बड़ी मुसीबत हार जाती है, ऐसा सिर्फ कहावतों में ही नहीं होता यह असल जिंदगी में एक भारतीय पैरा एथलीट ने साबित करके दिखाया है। बिहार के नालंदा शहर में जन्मे झंडू कुमार का शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा था। एक समय इस खिलाड़ी ने जहां ई रिक्शा चलाया था और सब्जी बेचकर गुजर-बसर किया था। अब यह खिलाड़ी ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का प्रतिनिधित्व करने जा रहा है।

झंडू कुमार ने 5 साल की उम्र में ही अपने दोनों पैरों की ताकत गंवा दी थी। पोलियो के कारण बचपन से ही झंडू बैसाखी का सहारा ले रहे थे। इसके बाद भी उनका जीवन सुधरा नहीं और गरीबी ने उनके परिवार को जकड़ लिया। उनके परिवार का काम था सब्जी बेचने का। एक वक्त झंडू ने भी सब्जी बेची थी। फिर कोरोना काल में उन्होंने ई-रिक्शा चलाकर गुजारा किया।

इसके बाद गरीबी जब उनके परिवार पर बुरी तरह हावी हुई तो ई-रिक्शा भी उन्हें बेचना पड़ गया। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए रवाना होने से पहले बुधवार 15 जुलाई को मीडिया से बातचीत की और अपने संघर्षों की कहानी को बताया। इस दौरान उन्होंने जनसत्ता के सवाल का जवाब दिया और बताया कि कैसे गोला फेंक, भाला फेंक और चक्का फेंक में हाथ आजमाने के बाद वह पैरा पॉवरलिफ्टिंग में आ गए।

कैसे एथलेटिक्स में पहुंचे झंडू कुमार?

झंडू ने कहा,”मैंने शुरुआती जीवन में कई बुरे दिन व्यतीत किए हैं, जहां आलू, प्याज बेचने से कोरोना काल में ई-रिक्शान चलाने तक के संघर्ष शामिल हैं।” उन्होंने 2010 से 2012 के बीच जिम जाना शुरू कर दिया था। इसके बाद उन्होंने गोला फेंक, चक्का फेंक और भाला फेंक में हाथ आजमाया। फिर इसी सफर को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने एक खास सलाह के बाद पैरा पॉवरलिफ्टिंग में अपना करियर चुना।

उन्होंने बताया,”मैंने लिफ्टिंग बेल्ट के साथ ट्रेनिंग शुरू की। मैं 100 किलो से अधिक वजन उठाने लगा था। मेरे कोच ने मुझे प्रोत्साहित किया और 2018 में बिहार स्टेट गेम्स में हिस्सा दिलाया। मुझे प्रतियोगिता में हिस्सा लेने और बिहार का नाम ऊंचा करने में मजा आने लगा था।” हालांकि, उनका संघर्ष यहां थमा नहीं था और असली परीक्षा शुरू हुई जब जिम से बाहर की दुनिया में वह आगे बढ़े।

परिवार का पेट भरने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। जीवन यापन के लिए उन्होंने सब्जियां बेचीं और अपनी व्हीलचेयर पर 20 किलोमीटर का सफर तय करते हुए सब्जियां बेचते थे। इसके बाद कोरोना काल आया और उनका यह काम ठप होने लगा। फिर उन्होंने दोस्त से पैसे उधार लिए और ई-रिक्शा खरीदा। जैसे-तैसे उनका गुजारा शुरू हुआ और साथ ही साथ वह खेल में भी अपना हाथ आजमाते रहे।

कैसे पैरा पॉवरलिफ्टिंग में पहुंचे झंडू कुमार?

जनसत्ता की तरफ से जब उनसे सवाल किया गया कि गोला फेंक, भाला फेंक और चक्का फेंक को छोड़ कैसे वह पॉवरलिफ्टिंग में आए तो उन्होंने कहा,”जब हम शॉट पुट, डिस्कस फेंकते थे तो हम जिम में बाइसेप्स और ट्राईसेप्स की एक्सरसाइज करते थे, इस कारण हमारा कंधा पूरी तरह फ्री नहीं हो पाता था। उस वक्त बिहार में एक सिक्रेटरी थे उन्होंने कहा की आप पॉवरलिफ्टिंग कर सकते हो क्योंकि आपकी बॉडी अच्छी है और ताकत भी है।”

झंडू कुमार ने आगे बताया,”फिर मैंने उनसे कहा कि ठीक है सर कैसे और कहां पर होगा पॉवरलिफ्टिंग तब उन्होंने बताया कि कलकत्ता (कोलकाता) में नेशनल होने वाला है 2022 में। उस वक्त हम तैयारी भी कर रहे थे तो हम 100-110 की रेंज तक जा रहे थे। फिर हमने वहां हिस्सा लिया और ब्रॉन्ज मेडल भी जीता।” इस तरह झंडू कुमार का सफर पैरा पॉवरलिफ्टिंग तक पहुंचा। उन्होंने 2025 मार्च में 206 किलोग्राम वजन उठाकर नेशनल रिकॉर्ड भी बनाया था। अब कॉमनवेल्थ गेम्स में देश को उनसे मेडल लाने की उम्मीद है।

रजिंदर सिंह रहेलू ने बदली जिंदगी

झंडू कुमार ने आगे बताया,”मैंने फिर अपना ई-रिक्शा बेचा और मैं दिल्ली आ गया। यहां मेरी मुलाकात रजिंदर सिंह रहेलू सर से हुई। शुरुआत में मैं फेल हुआ और तीन बार लिफ्ट करने में असफलता हाथ लगी। मगर कोच सर ने मुझमें भरोसा दिखाया। मैं आज जहां भी हूं उनके समर्थन की वजह से ही हूं।”

2023 में गांधीनगर स्थित SAI (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई। झंडू के नाम 2025 में 206 किलोग्राम का वजन उठाकर नेशनल रिकॉर्ड दर्ज हुआ। आज वह ग्लास्गो में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स में देश के लिए मेडल लाने के लिए तैयार हैं और कमर कस चुके हैं।

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