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रियो परालंपिक गोल्ड के बाद झाझरिया की निगाह तोक्यो में तिकड़ी बनाने पर

यह 35 वर्षीय खिलाड़ी एकमात्र भारतीय एथलीट है जिसने परालंपिक में दो स्वर्ण पदक जीते हैं। इससे पहले उन्होंने 2004 एथेंस में सोने का तमगा जीता था।

Author नई दिल्ली | September 23, 2016 21:04 pm
देवेंद्र झाजरिया ने Rio Paralympics 2016 में जेवलिन थ्रो में जीता था गोल्ड।

रियो परालंपिक खेलों में भाला फेंक के एफ46 वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने से देवेंद्र झाझरिया भारत के सबसे सफल परा एथलीट बन गए हैं लेकिन उनका इरादा यहीं रुकने का नहीं है और उनकी निगाह 2020 तोक्यो में होने वाले खेलों में स्वर्ण पदक की तिकड़ी बनाने पर लगी है। झाझरिया का बायां हाथ नहीं है। यह 35 वर्षीय खिलाड़ी एकमात्र भारतीय एथलीट है जिसने परालंपिक में दो स्वर्ण पदक जीते हैं। इससे पहले उन्होंने 2004 एथेंस में सोने का तमगा जीता था। झाझरिया ने कहा, ‘रियो की सफलता के बाद मैं यहीं पर नहीं रूकने वाला हूं। मैं अभी फिट हूं और मैं निश्चित तौर पर तोक्यो में स्वर्ण पदक जीतने की कोशिश करूंगा। मैं अपने शरीर को समझता हूं और मैं अब भी सुबह दो घंटे और शाम को भी दो घंटे कड़ा अभ्यास कर सकता हूं जैसा कि मैंने रियो परालंपिक खेलों से पहले किया था।’ उन्होंने कहा, ‘परालंपिक में मेरे नाम पर दो स्वर्ण पदक हैं और दोनों बार मैंने विश्व रिकॉर्ड बनाया। लेकिन मैं इन उपलब्धियों तक ही सीमित नहीं रहूंगा। मैं एक और स्वर्ण जीतना चाहता हूं। मैं तोक्यो 2020 में तिकड़ी बनाना चाहता हूं।’ लेकिन अभी यह तय नहीं है कि झाझरिया की स्पर्धा तोक्यो 2020 में शामिल होगी या नहीं। इससे पहले 2008 और 2012 परालंपिक में भी उनकी स्पर्धा शामिल नहीं थी।

उन्होंने कहा, ‘आईपीसी (अंतरराष्ट्रीय परालंपिक समिति) फैसला करता है कि खेलों में कौन सी स्पर्धा होगी। विकलांगता के स्तर के अनुरूप परालंपिक में कई तरह के वर्गीकरण होते हैं। उदाहरण के लिए आईपीसी फैसला कर सकता है कि परालंपिक में एथलेटिक्स में 50 या 60 स्पर्धाएं होंगी और फिर उसी हिसाब से वर्गीकरण होगा। आईपीसी अगले साल आईपीसी विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप (जुलाई) में तय करेगा कि तोक्यो में कौन सी स्पर्धाएं होंगी।’ झाझरिया ने कहा, ‘मुझे उम्मीद है कि मेरी स्पर्धा 2020 तोक्यो परालंपिक में शामिल रहेगी।’ परालंपिक में केवल तीन भारतीय ही स्वर्ण पदक जीत पाए हैं। परालंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय मुरलीकांत पेटकार थे जिन्होंने 1972 में हेडलबर्ग खेलों में पुरूषों की 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी में सोने का तमगा जीता था। रियो में मरियप्पन थंगवेलु ने पुरुषों की ऊंची कूद टी42 में स्वर्ण पदक जीता था। जोगिंदर सिंह बेदी हालांकि परालंपिक में सर्वाधिक पदक जीतने वाले खिलाड़ी हैं हालांकि वह कभी स्वर्ण हासिल नहीं कर पाए। उन्होंने 1984 में स्टाक मंडाविले और न्यूयार्क में हुए परालंपिक खेलों में गोला फेंक एल6 में रजत तथा चक्का फेंक एल6 और भाला फेंक एल6 में कांस्य पदक जीते थे।

झाझरिया ने अगले साल के राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार के लिये भी अपना दावा पेश किया। खेल मंत्रालय ने घोषणा की है कि परा खिलाड़ियों को भी सक्षम खिलाड़ियों की तरह ही दर्जा दिया जाएगा और झाझरिया को लगता है कि अगले साल उन्हें देश का यह सर्वोच्च खेल पुरस्कार मिल सकता है। उन्होंने कहा, ‘किसी भी भारतीय ने परालंपिक में दो स्वर्ण पदक नहीं जीते हैं। मुझे लगता है कि मैंने वह हासिल किया है जो कोई अन्य भारतीय नहीं कर पाया। मैं 2004 से इंतजार कर रहा हूं।’ झाझरिया ने कहा, ‘खेल मंत्रालय के बयान से मैं काफी उत्साहित हूं कि खेल पुरस्कारों और पदम पुरस्कारों के मामले में परा ख्लिाड़ियों को भी सक्षम खिलाड़ियों के समान दर्जा दिया जाएगा। इसलिए मुझे लगता है कि अगले साल खेल रत्न पुरस्कार के लिये मैं प्रबल दावेदार हूं।’

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