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2012 के ओलिंपिक में सिल्वर जीतने वाला शूटर मांग रहा नौकरी, घर चलाना भी हो रहा मुश्किल

विजय को रोजाना और आर्मी से बिना किसी सपोर्ट के ठीक तरह से प्रैक्टिस करने के लिए 15 हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

2012 के ओलिंपिक में सिल्वर जीतने वाले शूटर विजय कुमार।

भारत में खेलों और खिलाड़ियों की स्थिति कितनी बदतर है, यह किसी से छिपी नहीं है। खिलाड़ियों के लिए न तो बेहतर सुविधाएं हैं और न ही इन्फ्रास्ट्रक्चर। देश के लिए मेडल लाने वाले खिलाड़ी सड़क पर सामान बेचकर घर चला रहे हैं। लेकिन हैरानी की बात है कि ओलिंपिक मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों की भी कद्र नहीं की जा रही है। साल 2012 के ओलिंपिक में सिल्वर जीतने वाले शूटर विजय कुमार नौकरी ढूंढ रहे हैं। फरवरी में भारतीय सेना के साथ उनका कमीशन खत्म हो गया है। हालांकि ओलिंपिक गोल्ड क्वेस्ट हथियार मुहैया करा रहा है। लेकिन ट्रेनिंग का खर्चा उन्हें खुद उठाना पड़ रहा है और इसमें काफी पैसा खर्च होता है। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, मैंने राज्य सरकार के अलावा कई लोगों से बात की। उन्होंने कहा, मैं फरीदाबाद शिफ्ट हो गया हूं, ताकि शूटिंग सेंटर के करीब रह सकूं। अगर हरियाणा सरकार मुझे नौकरी दे तो मैं उन्हें उनका प्रतिनिधित्व भी करूंगा। विजय ने कहा कि जब तक कोई उन्हें सपोर्ट नहीं करेगा, तब उन्हें नौकरी मिलना मुश्किल है। विजय को रोजाना और आर्मी से बिना किसी सपोर्ट के ठीक तरह से प्रैक्टिस करने के लिए 15 हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं। उन्हें जितनी पेंशन मिलती है, उसमें घर चलाना भी मुश्किल होता है।

गौरतलब है कि पिछले महीने ही खबर आई कि स्पेशल ओलिंपिक में पदक जीतने वाला खिलाड़ी राजस्थान में गोल-गप्पे बेचने को मजबूर है। वहीं यूपी के शहाजहांपुर के रहने वाले कौशलेन्द्र भी बदहाली में जी रहे हैं। एक वक्त पर उन्होंने स्पेशल ओलिंपिक में 3 गोल्ड मेडल जीते थे, लेकिन अब 300 रुपये की पेंशन के सहारे जिंदगी गुजार रहे हैं। साल 1981 में कौशलेन्द्र ने व्हील चेयर रेस की 1500 मीटर और 100 मीटर रेस समेत तीन प्रतियोगिताओं में स्वर्ण जीता था। इसके बाद भी उनकी कामयाबी का सिलसिला नहीं रुका। 1982 में हॉन्गकॉन्ग में हुए पेसिफिक खेलों में उन्होंने एक रजत और एक कांस्य पदक हासिल किया था।

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