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फुटबालः करिश्माई इंग्लैंड

फुटबॉल इंग्लैंडमय हो गया है। अंडर-20 में विश्व चैंपियन, अंडर-19 में यूरोपीय चैंपियन और अब अंडर-17 में विश्व विजेता।

Author November 2, 2017 2:36 AM

सुरेश कौशिक
फुटबॉल इंग्लैंडमय हो गया है। अंडर-20 में विश्व चैंपियन, अंडर-19 में यूरोपीय चैंपियन और अब अंडर-17 में विश्व विजेता। पिछले छह महीने में ‘खिताबों की हैट्रिक’से इंग्लैंड ने फुटबॉल जगत को संदेश दे दिया है कि आने वाला समय उनका होगा। अब बारी है उस सपने को पुन: साकार करने की जो 1966 से अधूरा है- यानी विश्व कप जीतना। इंग्लैंड को परंपरागत रूप से मजबूत टीमों में माना जाता रहा है, लेकिन सीनियर स्तर पर मिली एकमात्र सफलता उसे विश्व कप शुरू होने के 36 साल बाद नसीब हुई थी। अंडर-17 विश्व कप में भी पहली सफलता के लिए उसे 32 साल इंतज़ार करना पड़ा। कोलकाता का साल्टलेक स्टेडियम उसकी सफलता का गवाह बना।

लेकिन अपने पहले फाइनल को इंग्लैंड ने जिस शैली से यादगार बनाया, उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। स्पेन जैसी कलात्मक और सुदृढ़ टीम के खिलाफ दो गोल से पिछड़कर वापसी करना गजब था। इसे इंग्लैंड के प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के जज्बे, उनकी मानसिक दृढ़ता, आक्रामक रणनीति, तकनीक और टैक्टिक्स की जीत माना जाएगा। स्पेन की रक्षा पंक्ति की रेल बना देना सचमुच आश्चर्यजनक था। फुटबाल कौशल का जबर्दस्त प्रदर्शन करते हुए उन्होंने दनादन पांच गोल ठोंक दिए। साथ ही चंद माह पूर्व अंडर-17 यूरोपीय चैंपियनशिप के फाइनल में स्पेन के हाथों पेनल्टी शूटआउट में मिली हार का बदला भी चुकता कर लिया।

अजेय इंग्लैंड की सफलता के हीरो रहे रियान ब्रियुस्तर दो ‘हैट्रिक’ सहित आठ गोल बनाकर गोल्डन बूट के अधिकारी बने। फिल फोदेन को ‘गोल्डन बॉल’ ट्राफी मिल गई। सफलता की राह में अमेरिका, जापान, जर्मर्नी, ब्राजील और स्पेन जैसी टीमों को हराना खास रहा। स्पेनिश लड़कों के खेल में कलात्मकता है। पासिंग की खूबसूरती के कारण हमलों को गोल में बदलना उनकी ताकत है। पर फाइनल में दो गोल की बढ़त के बाद टीम इंग्लैंड के बनाए दबाव में वह चरमरा गई। गैप दिए और मार्किंग कमजोर रही जिसको इंग्लैंड के खिलाड़ियों ने बखूबी बनाया। वैसे अंडर-17 विश्व कप में स्पेन के साथ ‘चोर्कस’ का ठप्पा लग गया है। यह चौथा फाइनल था जिसमें स्पेन का खिताबी सपना चकनाचूर हुआ। बहरहाल यह पहली बार था जब फाइनल दो दिग्गज यूरोपीय टीमों के बीच खेला गया।

सेमीफाइनल में दो यूरोपीय, एक दक्षिण अमेरिकी और एक अफ्रीकी टीमों के पहुंचने का मतलब है महाद्वीपीय टीमों की जंग कड़ी होती जा रही है। पिछली उपविजेता और अफ्रीकी चैंपियन माली के खेल में जोश था, कलात्मकता और आक्रामकता थी पर निशानेबाजी गड़बड़ रही। स्पेन के खिलाफ दमदार खेल दिखाने के कारण उन्हें जीत और फाइनल में जगह बनाने से वंचित होना पड़ा। ब्राजील के खिलाफ तीसरे स्थान के लिए हुए मैच में भी माली ने ब्राजील के खेल को फीका बना दिया था। पर जीत के लिए गोल चाहिए और ब्राजील ने दो गोल बनाकर बाजी मार ली। ब्राजील को दावेदार टीमों में माना जा रहा था लेकिन उनके खिलाड़ी अपनी कलाकारी नहीं दिखा पाए। सेमीफाइनल में इंग्लैंड से हार का मतलब यह हुआ कि ब्राजील का 2003 के बाद से विश्व कप जीतने का सपना अधूरा है। घाना, अमेरिका, जापान, जर्मनी, ईरान ने भी 24 देशों के इस टूर्नामेंट में अपना रंग जमाया। ईरान की जर्मनी पर 4-0 से जीत सबसे चौंकाने वाला परिणाम रहा।

मेजबान के नाते शिरकत करने से भारत को भी यह अहसास हो गया कि इस स्तर पर हम कहां हैं? भारतीय खिलाड़ियों ने जुझारू खेल दिखाया पर ग्रुप की तीनों टीमों अमेरिका, घाना और कोलंबिया से उन्हें हार ही मिली। लेकिन भारत ने क्षमता से बेहतर प्रदर्शन किया। फीफा अंडर-17 विश्व कप में फुटबालप्रेमियों का भरपूर मनोरंजन हुआ। स्तरीय फुटबाल देखने को मिली। खिलाड़ियों ने कौशल, तकनीक, पांव की कलाकारी, बेहतरीन पासिंग, सेट पीस मूव, पोजीशनिंग, टेंपरामेंट, निशानेबाजी कला, ऊर्जा और दमखम का अद्भुत परिचय दिया। गोलकीपरों ने भी शानदार बचावों से खूब तारीफ बटोरी। इनमें भारतीय गोलकीपर धीरज सिंह भी रहे जिन्होंने ढेरों बचाव किए। उनके मणिपुरी साथी जेकसन थाअुनोजेम भी इतिहास के पन्नों में जुड़ गए। वह फीफा द्बारा आयोजित विश्वस्तरीय टूर्नामेंट में भारत की ओर से गोल बनाने वाले पहले खिलाड़ी बने। उम्मीद है कि विभिन्न शैलियों के कौशल से सीख पाकर भारतीय फुटबॉल भी निखरेगी।

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