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बातचीत- ‘टॉप’ के लिए खिलाड़ियों के चयन में संघ का दखल कम हो: सीमा

मंजिल उसी को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौसले से उड़ान होती है।’

Author December 14, 2017 2:18 AM
एशियाई चैंपियनशिप की तैयारी में जुटीं सीमा तोमर

मंजिल उसी को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौसले से उड़ान होती है।’  ये पंक्तियां बागपत के छोटे से गांव जोहड़ी की गलियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल ट्रैप शूटर के रूप में उभरने वाली सीमा तोमर पर सटीक बैठती हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेलों में लगभग साठ पदक जीत चुकीं सीमा ने समाज की रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़कर यह मुकाम हासिल किया है। उन्होंने ब्रिटेन के डोरसेट में आयोजित आइएफएफएस विश्व कप में रजत पदक जीतकर शॉटगन प्रतियोगिता में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला का गौरव हासिल किया। कर्णी सिंह शूटिंग रेंज पर आगामी राष्ट्रमंडल खेल और उसके बाद होने वाली एशियाई चैंपियनशिप की तैयारी में जुटीं सीमा तोमर ने खास बातचीत में देश में खेल के वर्तमान हालात पर बेबाकी से अपनी बात रखी…

संदीप भूषण
सवाल : राष्ट्रमंडल खेलों के लिए होने वाले ट्रायल से पहले आप की तैयारी कैसी है? 2018 के लिए आपने क्या लक्ष्य तय किए हैं?
’राष्ट्रमंडल खेलों के लिए मैं लगातार मेहनत कर रही हूं। 12 जनवरी से इसके लिए ट्रायल होने हैं। कॉमनवेल्थ में मेरा एकमात्र लक्ष्य सोने पर निशाना लगाना होगा। जहां तक 2018 के कार्यक्रम की बात है तो उस समय एशियाई खेल होने हैं और उसमें भी मैं बेहतर करना चाहूंगी। सवाल : 2020 में अगला ओलंपिक होने वाला है और सरकार ‘ओलंपिक टारगेट पोडियम’ (टॉप) योजना के तहत कई खिलाड़ियों को तैयार कर रही है। आपकी इस पर क्या राय है?

’ओलंपिक में भारत के लिए खेलना किसी भी खिलाड़ी का सपना होता है। रियो में खिलाड़ियों के प्रदर्शन के बाद सरकार इस योजना पर काम कर रही है, यह अच्छी पहल है। लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहूंगी कि सिर्फ कुछ नामी खिलाड़ियों को ही इसमें मौका देना सही नहीं है। खिलाड़ियों के चुनाव में संघ से ज्यादा प्रशिक्षक की भूमिका होनी चाहिए। कोच ही एकमात्र जरिया है जिसे खिलाड़ियों की कमजोरी और मजबूत पहलू का बखूबी अंदाजा होता है। टारगेट पोडियम योजना में संघ की भूमिका को ज्यादा तवज्जो देना सही नहीं है।
सवाल : बीते तीन-चार साल में खेल को लेकर देश में क्या माहौल है और यह विदेशी खेल संस्कृति के मुकाबले कैसी है?

’इसमें कोई दो राय नहीं कि नई सरकार ने खेल को बढ़ावा देने के लिए काफी प्रयास किए हैं। अब कई तरह के आयोजन देश में हो रहे हैं जिससे सिर्फ नामी ही नहीं बल्कि छोटे खिलाड़ियों को भी हुनर दिखाने का मौका मिल रहा है। हां, विदेशों के मुकाबले हम अभी भी काफी पीछे हैं। ओलंपिक की ही बात करें तो अक्सर विदेशों में दो टीम तैयार की जाती हैं। एक टीम जिसमें देश के सबसे मजबूत खिलाड़ियों को जगह मिलती है और दूसरी जिसमें उनसे निचले स्तर के खिलाड़ियों को रखा जाता है। दोनों टीमों को समान रूप से प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि मुख्य टीम का कोई भी खिलाड़ी ऐन मौके पर न खेल पाए तो एक मजबूत प्रतिभागी को वे उतार सकें। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। कुछ खिलाड़ियों पर ही हम भरोसा करते हैं। दूसरी टीम तैयार करने की परंपरा के बगैर हम ओलंपिक में मजबूत देश नहीं बन सकते।

सवाल : निशानेबाजी महंगा खेल है। सरकार को इसे विकसित करने और गांव तक पहुंचाने के लिए क्या करना चाहिए। ’हां यह महंगे से ज्यादा ‘एक खास वर्ग के खेल’ की उपमा के कारण लोगों की पहुंच से दूर है। यह पहले से ही विकसित है। सरकार को बस इसे लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है। इसके लिए जिला स्तर पर एक शूटिंग रेंज होनी चाहिए। मैंने जब निशानेबाजी शुरू की थी तो गांव के रेंज में ज्यादा बंदूकें नहीं होती थीं। एक से ही दस-दस लोग अभ्यास करते थे। इसके विकास में निजी क्षेत्र के लोगों को भी शामिल किया जाना चाहिए। बड़ी-बड़ी निजी कंपनियां वित्तीय सहायता दें तो सरकार के लिए काम और भी आसान हो जाएगा।

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